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हमारे पास आज है,कल भी आज ही होगा

सनातन समय से हम याने मनुष्यों को आध्यत्मिक वृत्ति के दार्शनिक चिंतक विचारक समझाते रहे हैं कि हमें वर्तमान में जीना चाहिए।वस्तुत:हम पूरा जीवन वर्तमान में ही जीते हैं।हमारे पूरे जीवन काल में वर्तमान ही होता हैं।याने हमारे पास आज हैं,कल भी आज ही होगा।कल आज और कल।हमारी समझ के लिये काल की सबसे आसान गणना।दो कल के बीच आज।पर आज सनातन रूप से आज ही होता है। कल आता जाता आभासित होता रहता हैं।पर आज न आता हैं न जाता हैं हमेशा बना रहता हैं।जैसे सूरज हैं सदैव हैं पर हमें यह आभास होता हैं कि वह उदित और अस्त हो रहा हैं।जैसे हम रोज जागते हैं और सोते हैं पर सोते और जागते समय हम हमेशा होते तो हैं।कहीं नहीं जाते।हम रोज कहते हैं कल आयेगा पर कल कभी आता नहीं हमेशा आज ही होता हैं।जब हम हमेशा आज में ही जीते हैं तो यह बात या दर्शन क्यों उपजा की वर्तमान में जीना चाहिए।

यह हमारी भाषा, संस्कृति और परंपरा की खूबी है कि हमने कल शब्द को दोनों अर्थों में ग्रहण किया है ,आने वाला कल भी कल है और जो बीत गया वो भी कल था। इसके गहरे निहितार्थ हैं। ये हमें बोेध कराता है कि बीते हुए कल और आने वाले कल के बीच जो आज है या जो वर्तमान क्षण है वही सत्य है, हमें इसी वर्तमान में जीना चाहिए।

आज हमेशा है। पर हम आज का जीवन कल की चिंता में जी ही नहीं पाते।जब तक हम जीते हैं आज साक्षात हमारे साथ होता हैं पर हम आज के साथ हर क्षण जीते रहने के बजाय कल की परिकल्पना या योजना से साक्षात्कार में ही प्राय: लगे होते हैं।हमारी सारी कार्यप्रणाली कामनायें,योजनायें व भविष्य को सुरक्षित करने का सोच व चिन्तन कल को सुरक्षित रखने के संदर्भ में ही होता हैं। यहीं हम सब की जीवन यात्रा का एक तरह से निश्चित क्रम बन गया हैं।ऐसा क्यों क्रम बना यहीं वह सवाल हैं जिसका उत्तर विचारक दार्शनिक आध्यात्मिक संत परम्परा के गुणीजन हम को आज में आनन्द अनुभव करने का सूत्र समझाते हैं।

आज के आनंद का अनुभव हम कल की चाहना में ले ही नहीं पाते।हम जब तक हैं हम सब आज ही हैं,जब हम न होंगे तो कल का खेल शुरू होगा और हम न होंगें।

आज और कल का यह खेल सरल भी हैं और जटिल भी हैं।सहज भी हैं और विकट भी हैं।जैसे जीवन सरल भी हैं और जटिल भी हैं।हम आज को समझ नहीं पाते और कल की चिंता में आज की सहजता के साक्षात स्वरुप को भी समझ या देख नहीं पाते।आज प्रत्यक्ष या साक्षात उपस्थित हैं और कल तो पूरी तरह काल्पनिक हो संभावना का खेल हैं। हमको साक्षात से ज्यादा संभावनाओं की जिज्ञासा हैं।यहीं कारण हैं कि हम सब आज से ज्यादा काल्पनिक कल की कल्पनाओं में ही खोये रहते हैं।आज साक्षात या प्रत्यक्ष अनुभूति हैं और कल साक्षात्कार से परे की विकट परिकल्पना हैं।आज को पूर्णता से महसूस करना ही जीवन की पूर्ण और प्राकृतिक समझ हैं।इसे यों भी समझा जा सकता है की जीवन समझने की नहीं स्वयं स्फूर्त और निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया हैं जिसके रूप रंग अनन्त है पर स्वरूप एक ही हैं।

हम अपने बाल स्वरुप में आजकल के चक्र से परे या अनभिज्ञ होते हैं।बचपन केवल आज में केवल भूख प्यास जैसी ही अन्य प्राकृतिक हलचलों तक ही सीमित होता हैं।रोना,हंसना और किलकारी भरना ही हमारी प्राकृतिक हलचले होती हैं जो हमारे परिजनों के आनन्द या चिन्ता के विषय होते हैं।जैसे जैसे हमारे स्वरूप का विस्तार होता हैं।हमारा आज कल का चक्र प्रारम्भ हो जाता हैं।हमारे प्रत्यक्ष अनुभव हमें चिंतन की अनवरत धारा का राही बना देते हैं।अब हमारे जीवन के काल क्रम में इतने सारे सवाल, जिज्ञासा और संकल्प उभरने लगते हैं जिनके चक्रव्यूह में हम जीवन भर घुमते ही रहते हैं।इस तरह हमारा आज कल के सवालों से निपटने की तैयारी में इतनी तेजी से गुजरने लगता हैं कि आज के आनंद की अनुभूति ही नहीं हो पाती ।हम नींद से जागते हैं और हमारा रोज़ का जीवन जितना शांत और एकाग्रचित्त होता हैं उतना हमारा जीवन वायु की तरह प्राणवान होता है।

हमारी निरन्तर गतिशीलता बनी रहती हैं।पर यदि कल की चिंता मन में आती तो फिर हमारी एकाग्रता निरंतरता और गतिशीलता बार बार रूक सी जाती है और कल की चिंता में आज व्यर्थ गया यह भाव मन को अशांत कर निराशा का भाव आ जाता है। कोई यह कह सकता है कि यह कहना बहुत सरल है कि शांतचित्त और एकाग्र रहो।पर यह प्राय:हो नहीं पाता क्योंकि हमारे अनुभवों के निरन्तर विस्तारित होते रहने से हम शांत और एकाग्रचित्त नहीं रह पाते।हमारे आवेग,हमारे मनोभाव और हमारे अंतहीन विचार हमारे आज के जीवन को तय करते हैं।आज यदि कल की चिंता या चिन्तन में ही लगा रहा तो आज अपने मूल स्वरूप से दूर चला जाता हैं।आज की हमारी संकल्पना क्या है?

क्या जीवन का होना आज माना जा सकता है।जीवन और आज एक ही बात है यह हम समझ सकते हैं।तो बात एकदम सरल हो सकती है,समझने के लिये भी और निरन्तर वर्तमान में आनन्द से जीने के लिए भी।जो गुज़र गया वह अनुभव हैं,जो प्रत्यक्ष है वो ही जीवन हैं।इसे जीवन के संदर्भ में समझे केवल आज ही जीवन है अत:आज और जीवन को कल की सुरक्षा के लिये जीना किसी के लिये संभव ही नहीं हो सकता।तब यह बात एकदम सरलता से समझ सकते है कि प्रत्यक्ष जीवन में कल जैसा कुछ संभव ही नहीं है जो कुछ है वह केवल आज ही है।कल तो जीवन में प्रत्यक्ष आता ही नहीं हैं।कल की कल्पना आभासी है किसी भी जीवन का साक्षात्कार कल से संभव ही नहीं है।इसीसे मनीषियों का चिन्तन जीवन के हर क्षण जीवन्त बने रहने के संदर्भ में है किसी भी क्षण जीवन को स्थगित कर कल जीने या कल के जीवन की सुरक्षा के लिये संसाधनों के संग्रह की प्रयोजनहीनता को स्पष्ट समझाने हेतु कहा हैं।मनुष्य के पास जीवन की क्षणभंगुरता की समझ आदिकाल से हैं।यहीं समझ उसे आज का आनन्द उपलब्ध करवाती है।कल के लिए न तो कुछ योजना बनानी चाहिए और न कल के लिये कुछ लंबित रखना चाहिए।हमारी लोक समझ का दर्शन हैं।

“काल करे सो आज कर,आज करे सो अब
पल में परलय होयगी तो बहुरी करेगा कब”

अनिल त्रिवेदी
अभिभाषक,स्वतंत्र लेखक और किसान

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