१९ वीं विधि वैदिक अग्निहोत्र- प्रधान होम भाग १ः आज्याहुतिमंत्रा:अथवा पवामानाहुतय:

विगत १७-१८ वीं क्रिया के अंतर्गत हमने स्विष्टकृत आहुति तथा प्रजापतये आहुति दी थी| अब हम प्रधान होम की और आगे बढते हैं| इस प्रधान होम में पवमान के लिए चार आहुतियाँ केवल घी की ही देते हैं| इस पवमान के इन चार मंत्रों को आज्याहुति भी कहते हैं| विगत में भी बताया गया है कि आज्या घी को कहते हैं| अत: यह चार आहुतियाँ केवल घी से ही देने का यहाँ आदेश है| संभवतया इस अग्निहोत्र की दैनिक क्रियाओं को करते हुए सामग्री कि इतनी मात्रा डाली जा चुकी है कि इससे समिधायें दब गई हैं, इस लिए अब केवल घी की अनेक आहुतियाँ डाली जाती है, ताकि अग्नि बुझने के स्थान पर घी के सहयोग से प्रचंड रूप धारण कर ले| इस क्रिया के चारों मन्त्र, जिनके साथ केफल यज्ञमान ने घी की आहुतियाँ देनी हैं, वह इस प्रकार है:-

ओं भूर्भुव: स्व| अग्न आयूंषि पवस आ सुवोर्जमिषं च न:||
आरे बाधस्व दुच्छुनां स्वाहा||इदमग्नये पवमानाय इदन्न मम||१| ऋग्वेद ४.१.४

शब्दार्थ
हे सर्वाधार, दु:खनाशक, सुखस्वरूप, अग्ने प्रकाशस्वरूप भगवान! आप न: हमारे आयूंषि जीवानीं को पवसे पवित्र करते तथा बढाते हो| हमें, उर्ज बल च और इषं अन्न आ-सुव प्रदान करें| दुच्छुनां राक्षसों को आरे दूर बाधस्व दबाओ| स्वाहा मेरी यह वाणी सत्य हो| इदं यह हवि पवमानाय पवित्र करने वाले अग्निरूप प्रभु के लिए है, मेरा इस में कुछ भी अपना नहीं है|

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व्याख्यान
सर्वाधार

हे परमपिता परमात्मा! आपने ही इस सृष्टि को धारण किया है| इस सृष्टि का सब कुछ आप हि के आधार पर टिका हुआ है| आपके इशारे पर ही आपके इंगित मात्र पर हि इस सृष्टि की गति चल रही है| आप एक पल के लिए भी अपना हाथ हटा लें तो इस सृष्टि और इस पर रहने वाले सब प्राणियों का नाश निश्चत है| इसलिए आप सस्र्वाधार हो|

दु:खनाशक
हे प्रभु! आप ही इस सृष्टि के सब प्राणियों के दू:खों क नाश करने वाले हो| जब आपका आशीर्वाद किसी प्राणी को मिला जाता है, जब आपका वार्ड हस्त किसी प्राणी के सर पर आ जता है तो उसके सब दू:ख काफूर बनाकर उड़ जाते हैं| इस प्रकार आपका आशीर्वाद पाने के लिए सब प्राणी यत्न करास्ते रहते हैं, ताकि उनके दू:खों का नाश हो सके| इस कारण आप दु:खनाशक हैं|

सुखस्वरूप
सर्वाधार और दु:खनाशक होने के साथ ही साथ हे पिता! आप सुख स्वरूप भी हैं| इस जगत् में जितने भी प्राणी हैं, उन सब के लिए सुखों का स्रोत आप ही होते हैं| जहाँ प्रभु आप होते हैं ,वहां सुख न हों, यह तो कभी संभव ही नहीं हो सकता| इस कारण हम सदा आपके आशीर्वाद का हाथ अपने सिरों पर देखने के लिए सदा ही लालायित रहते हैं| अत: परमपिता आप का एक गुण यह भी है कि आप सुख स्वरूप भी हैं| यह परमपिता परमात्मा के इन तीन गुणों को, जिन्हें हम ईश्वर के गौणिक नाम भी कहते हैं| इन तीन गुणों के माध्यम से परमात्मा को स्मरण करते हुए हम मन्त्र को इस रूप में जानने और इसके भावार्थ को आगे बढाने का प्रयास करते हैं क:
अग्निस्वरूप
हे प्रभु! आप अग्निस्वरूप भी है| यह अग्नि स्वरूप उस प्रभु का एक अन्य गुण है, इसे भी पिटा के गुणवाचक नाम के रूप में हम लेते हैं| अग्नि के जो गुण होते हैं, वह सब परमात्मा से ही होते हैं और परमात्मा ने ही अग्नि को यह गुण दिए हैं| जैसे विगत में भी बताया गया था कि अग्नि में तेज होता है तो परमात्मा तेजों का भी तेजस्वी है| अग्नि सदा ऊपर उठती है, परमात्मा भी सदा सब से ऊपर ही होता है और जो उसके सच्चे भक्त HOTEहोते हैं, उनका भी हाथ पकड़ कर उन्हें भी ऊपर उठा लेता है| अग्नि में जो कुछ डाला जाता है, वह सब सूक्ष्म होकर वायु मंडल में फ़ैला देता है| इस डाले गए पदार्थ में जो गुण होते हैं, उन्हें यह अग्नि बढ़ा देता है, हजारों गुणा कर देता है और यदि इन पदार्थों में कोई अवगुण होता है तो यह अग्नि उसे नष्ट कर देता है| परमपिता परमात्मा भी सदा जीव मात्र के पापयुक्त कार्यों का दंड देकर, उन्हें पापमुक्त करता रहता है और उसके गुणों को बढाता रहता है| जिस प्रकार अग्नि से सब और प्रकाश दिखाई देता है, उस प्रकार ही परमपिता परमात्मा भी सब के अन्दर ज्ञान का प्रकाश भी देता है|

पवित्र करते है
भगवान तो सब के पिटा होने के कारण अपने सब बच्चों को सदा पवित्र और आगे बढ़ता हुआ देखना चाहते हैं| इसलिए जीवन के प्रत्येक कशन वह हमारा मार्ग्दार्शंकराते रहते हैं| हमारे बुरे कर्मों का दंड देकर हमें सदा क्षमा करते रहते हैं| इस प्रकार पापों का नाश करते हुए वह अमे पवित्र बनाते हैं| परमात्मा अपनी संतानों को केवल पवित्र हि नहीं बनाता अपितु अपने बच्चों कि उन्नति में भी रूचि रखता है| इस प्रकार वह सदा हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा देता रहता है, जिस प्रेरणा के उपदेशों पर हम चलते हैं तो वह प्रभु हमें आगे बढ़ने में, उन्नति करने में हमारी सहायता करता रहता हियो|

बल और अन्न दें
जीव अपने जीवन में कुछ खाता है, कुछ उपभोग करता है, तब ही वह बलवान् होता है और तब ही वह जीवित रह पाता है| इसलिए मन्त्र में जीव परमपिता से प्रार्थना कर रहा है कि हे प्रभु! मुझे पवित्र अन्न के भंडारों से भर दो| इस पवित्र अन्न का सेवन मैं और मेरा परिवार करे| इस अन्न को खाकर हम लोग बलों के स्वामी बनें क्योंकि जिस के पास बल नहीं, आज उसे कोई भी पसंद नहीं करता| जीवन के प्रत्येक क्षण उसे ठोकरें ही खानी होती है, अपमानित ही होना पड़ता है| इसलिए हम आप से यह प्रार्थना करते है कि हमें वह पवित्र अन्न द्दो , जिसका उपभोग करके हम बलवान् हों|

राक्षसों को दूर करें
इस मन्त्र के माध्यम से परमपिता परमात्मा से हम ने एक और प्रार्थना की है कि वह हमें राक्षसी प्रवृति वाले लोगों से बचावें| हमें इन दुराचारी राक्षसी प्रवृति वालों से बचाने के लिए इन राक्षसों को हमारे से दूर ही रखो| इतना दूर रखो कि यह राक्षस कभी भी हमारे निकट न आ सकें|

इस प्रकार हे पित्त! मैं सदा आप के सत्य स्वरूप में रहूँ और इस स्वरूप को अपने जीवन में भी अपनाऊं| अत: मेरी वाणी से सदा सत्य शब्द ही निकलें| इस प्रकार इस मन्त्र के साथ मैं यह जो आहुति यज्ञकुंड में देने जा रहा हूँ, हे अग्नि स्वरूप प्रभो! इस आहुति की यह हवि हमें और इस वायुमंडल को पवित्र करने वाली हो | सब प्रकार की अपवित्रताओं को दूर कर सब और, सब दिशाओं को पवित्रता प्रदान करो|

मैं अग्निहोत्र करते हुए यह जो आहुति यज्ञ में दे रहा हूँ, इस आहुति का पदार्थ आप ही का दिया हुआ है| आपका दिया हुआ पदार्थ आप ही को अर्पण कर रहा हूँ| यह मैं सर्वमंगल की कमाना से आपको भेंट कर रहा हूँ| इसमें मेरा कुछ भी नहीं है|

इसके साथ ही इस क्रिया के एक मन्त्र की व्याख्या समाप्त हुई| अगले तीन मन्त्रों को हम बाद में लेंगे|
डॉ. अशोक आर्य
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