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आधी सदी 'अँधेरे में' ; सवाल-दर-सवाल, ज़वाब-दर-ज़वाब

एक लोकतांत्रिक समाज का नागरिक होने के नाते हम नागरिक चेतना, सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों और लेखकीय दायित्व के भव्य सवालों के समक्ष खुद को पाते हैं। इसमें नागरिक कहां खड़ा है? लेखन क्या है? नागरिक चेतना और लेखन के आपसी सम्बंध क्या हैं? 

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मुक्तिबोध पर अशोक वाजपेयी का यादगार संस्मरण

हिन्दी की नई कविता के सर्वमान्य कवि गजानन माधव मुक्तिबोध के रचना संसार के प्रखर प्रवक्ता तथा उनके अभिन्न रहे प्रख्यात समालोचक व संस्कृति विश्लेषक श्री अशोक वाजपेयी का यह यादगार संस्मरण हम यहां साभार प्रस्तुत कर रहे हैं।

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सर्वे भवंतु सुखिनः को साकार करेगा पं. दीनदयालजी एकात्म मानवदर्शन

परमपावन भारत भूमि अजन्मा है यह देव निर्मित है और देवताओं के द्वारा इस धरा पर  विभिन्न अवसरों पर अलग अलग प्रकार की शक्तियां अवतरित होती रहती हैं।  जो देव निर्मित भू -भाग को अपनी ऊर्जा से  समाज का मार्गदर्शन करते हैं।

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विस्मरण से स्मरण के सचेतक बाबा नागार्जुन

'जनपथ' के नागार्जुन विशेषांक के अतिथि सम्पादक सुधीर सुमन ने बाबा नागार्जुन के रचना संसार को बड़ी मर्म भरी वाणी दी है। यह अंक एकबारगी एक ही बैठक में पढ़ने के बाद मुझे लगता है कि इसका रसास्वादन करने अपने पाठकों को भी आमंत्रित करूँ। तो लीजिये ये रहीं बाबा पर एकाग्र अंक की ख़ास बातें। 

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मानवतावादी रचनाकार विष्णु प्रभाकर

कालजयी जीवनी आवारा मसीहा के रचियता सुप्रसिद्ध साहित्यकार विष्णु प्रभाकर कहते थे कि एक साहित्यकार को केवल यह नहीं सोचना चाहिए कि उसे क्या लिखना है, बल्कि इस पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए कि क्या नहीं लिखना है.

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बलिदानी योद्धाओं की याद

भारतीय सेना, प्रथम विश्‍व युद्ध में भाग लेने वाले 15 लाख भारतीय सिपाहियों और अपने प्राणों की आहूति देने वाले 74 हजार से भी अधिक सिपाहियों की स्‍मृ‍ति में 10 से 14 मार्च 2015 तक नई दिल्‍ली में शताब्‍दी समारोह का आयोजन कर रही है। 

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भाजपा नेताओं के 'पितृपुरुष' बलराज मधोक ने गुमनामी में मनाया 96वां जन्म दिन

२५ फरवरी, २०१५ को प्रो. बलराज मधोक का ९६ वाँ जन्मदिन गुमनामी में मनयाय। जीवन के अन्तिम पडाव पर खडे प्रो. मधोक की बुढी आँखों में एक ही चिन्ता है कि भारतमाता की अखण्डता को खण्डित कर सकने वाले तेजी से ऊमङते सा प्रदायिक एवं जातिय तुष्टीकरण के काले बादलों को कौन रोकेगा?�

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स्वामी स्वतंत्रानन्द सरस्वती

स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी के जन्मतिथि का निश्चित ज्ञान नहीं है किन्तु यह निश्चित है की आप के पूर्वज उदयपुर के पास गाँव 

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भारत की पहली पार्श्वगायिकाः गौहर जान

गहन प्रशिक्षण और अभ्यास की कठिन तपस्या के पश्चात गौहर जान हिंदुस्तानी संगीत के पर्याय के रूप में उभरीं। एक प्रतिभाशाली नर्तकी ओर गायिका होने के साथ साथ वहअपनी कविताओं और हाजिरजवाबी के लिए भी मशहूर थीं। 

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इस कब्र में सोई है दक्षिण एशिया की भुला दी गई बेगम

काठमांडू घाटी में एक ऐसा ‘आइकन’ मौजूद है,  जिसका इस उपमहाद्वीप के वे तमाम देश इस्तेमाल कर सकते हैं,  जो कभी ब्रिटिश साम्राज्य के उपनिवेश थे,  क्योंकि इस आइकन का रिश्ता उनके साझा अतीत से है।

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अदम्य जीवट के अनोखे शायर अदम गोंडवी

अदम गोंडवी शायरी के उस मिजाज़ की पहचान थे जिसने सत्‍ता का कभी मुँह कभी नहींताका। जीवन में कभी समझौते नहीं किए। दुष्‍यंत कुमार के बाद ग़ज़लों की दुनिया में ऐसी कोई शख्‍सियत नही थी जो उनकी जगह ले सके। इसीलिए बरसों बाद जब ग़ज़ल की दुनिया में अदम का आगमन हुआ तो उन्‍हें दुष्‍यंत की परंपरा का शायर मानने की वजह यह थी कि वे गजलों में उसी साफगोई के साथ अवाम के नाम एक नया पैगाम लिख रहे थे।

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मुक्तिबोध अमीरी के भाव बिके नहीं, कभी झुके नहीं !

यह महज़ संयोग नहीं है कि 13 नवम्बर 1917 को तत्कालीन ग्वालियर स्टेट के श्योपुर ( जिला मुरैना ) में जन्में हिन्दी की नई कविता के सर्वाधिक समर्थ कवि गजानन माधव मुक्तिबोध ने दुनिया को अलविदा कहते तक,अपने सृजन-कर्म का सबसे अधिक ऊर्जावान समय राजनांदगांव में व्यतीत किया। इसी तरह यह भी सच है कि दैनिक सबेरा संकेत के प्रधान संपादक और मुक्तिबोध जी के अभिन्न मित्र स्मृति शेष श्रद्धेय शरद कोठारी जी (बाबूजी) ने मुक्तिबोध को संस्कारधानी में आमंत्रित कर हिन्दी कविता की बीती सदी के अवदान में अपने शहर का नाम स्थायी रूप से दर्ज़ करवा दिया। 

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