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छठा जागरण फिल्म महोत्सव एक जुलाई से 17 शहरों में

फिल्म प्रेमियों के दिलों में विशेष स्थान रखने वाले 'जागरण फिल्म महोत्सव' की शुरुआत इस बार दिल्ली में एक जुलाई से हो रही है। इस महोत्सव का यह छठा साल है। पांच दिनों तक चलने वाले इस समारोह में राजधानी के दर्शकों को कई प्रतिष्ठित भारतीय और विदेशी फिल्में देखने को मिलेंगी।

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महबूब और उनका सिनेमा परंपरा का आदर : डगर आधुनिकता की

किस्सा हिंदी सिनेमा का जब भी बयाँ होगा, महबूब और उनकी 'मदर इंडिया' के जिक्र के बगैर अधूरा रहेगा। छप्पन साल पहले प्रदर्शित हुई 'मदर इंडिया' और आधी सदी पहले इस फानी दुनिया को अलविदा कह गए जनाब महबूब खान आज भी वर्तमान की उपस्थिति हैं।

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नकल से नहीं असल किरदार से फिल्मों को सँवारें - मनु नायक

हमारे नए राज्य के दूसरे दशक के मध्य में छालीवुड की खुशियों में चार चाँद लगाते हुए छत्तीसगढ़ी फिल्मों को 50 बरस पूरे हो गए.14 अप्रैल 1965 में पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘ कहि देबे संदेश’  रिलीज़ हो गई थी.

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नाम बदलकर परदे पर छा गए फिल्मी सितारे, लोग असली नाम भूल गए

हमारे सिनेमा के संसार में तो क्या अं दर और क्या बाहर- शायद ही कोई जानता हो कि भारतीय सिनेमा के शिखर पर विराजमान देश के सबसे सम्मानित अभिनेता, अमिताभ बच्चन का असली नाम इंकलाब है।

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अपने मकसद में कितना कामयाब रहा फिक्की फ्रैम का सालाना जलसा

फिक्की फ्रेम्स फेडरेशन आफ चैम्बर्स आफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज और भारतीय फिल्म जगत की साझा वार्षिक पहल है, यह एक ऐसा प्लेटफार्म है जिस पर फिल्म और मनोरंजन जगत के प्रतिनिधि, फेडरेशन के दिग्गज और सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के प्रमुख एकत्रित हो कर समस्याओं पर चर्चा करते हैं और सरकार को अपनी रीति नीति की दिशा तय करने में मदद मिलती है। 

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कितने फर्जी होते हैं ये फिल्मी अवॉर्ड!

फिल्म और टीवी के अवॉर्डस की असलियत अब सभी जानने लगे हैं। ये अवॉर्डस कै से, किसको, किस पैमाने से, किस कारण, किस तरह से क्यों दिए जाते हैं, और क्यों दिए जाने हैं, इसकी कथाओं और अंतर्कथाओं सहित इन अवॉर्डस के चरितार्थ और निहितार्थ की सच्चाई से भी सभी वाकिफ हैं।

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फ़िल्मकार तिग्मांशु धूलिया ने फिल्म समारोह के पुरस्कार प्रदान किए

दिल्ली में आयोजित तीसरे दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में इस बार पाकिस्तान और बांग्लादेश की फिल्मों की धूम रही।

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खान तिकड़ी फ्लॉप रहेगी नए साल में?

कोई कुछ भी कहे, कोई तीस मार खां ही क्यों न आ जाए, खान तिकड़ी को उनके सिंहासन से कोई नहीं हिला सकता। इनकी फिल्मों के कलेक्शन का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। पिछले कई सालों से तो ऐसा ही होता आ रहा है, लेकिन अब खानों का सिंहासन डोल रहा है। नए हीरो इन्हें तगड़ा कॉम्पिटीशन दे रहे हैं।

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मणि कौल का सिनेमा और हिंदी

मणि कौल की अधिकतर फिल्में हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर ही केंद्रित/आधारित हैं। 'सतह से उठता आदमी' (मुक्तिबोध) 'उसकी रोटी' (मोहन राकेश) और 'नौकर की कमीज' (विनोद कुमार शुक्ल) का ध्यान इस सिलसिले में सहज ही हो आता है।

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हिन्दी समय में इस बार सिनेमा पर खोजपूर्ण सामग्री

सिनेमा एक ऐसी कला है जिसमें सारी कलाएँ आकर गलबहियाँ करती हैं। साहित्य, संगीत, चित्रकला, नृत्य, फोटोग्राफी सभी कलाएँ यहाँ मिल-जुलकर काम करती हैं। यही नहीं, सिनेमा में तकनीकि भी आकर कला के साथ ताल से ताल मिलाती नजर आती है।�

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फिल्मी सितारों के रोमांस की हकीकत बयान करती किताबें

हाल के वर्षों में फिल्मों से जुड़ी कई हस्तियों की जीवनियाँ, आत्मकथा, संस्मरण बाजार में आए। इनमें से कई तो बेहद चर्चित भी हुए। फिल्म साप्ताहिक स्क्रीन की संपादक रह चुकी भावना सोमैया ने ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी की जीवनी लिखी जो रोलीबुक्स ने छापी।

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हम 2500 वर्ष पहले बहुत अधि‍क मानवीय रह चुके हैं : मोहसेन माखमलबाफ

''हम एक दूसरे को मारने के लिए पैदा नहीं हुए हैं।'' यह ईरानी फिल्‍म निर्माता मोहसेन माखमलबाफ का कहना है, जिनकी फिल्‍मों को लेकर अक्सर सवाल उठाए जाते हैं कि वे नफरत को बढ़ावा देती हैं और समाज में हिंसा की संस्‍कृति में इज़ाफा करती हैं।

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