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पुरूष को महापुरूष बनाने में गुरू का ही योगदान: दिनेश मुनि

 श्रमण संघीय सलाहकार दिनेष मुनि ने कहा कि गुरुपूर्णिमा का दिवस गुरुओं को वंदन करने और उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का दिन है। आज के दौर में पुराने गुरुओं की जरुरत महसूस हो रही है, पैसा लेकर मार्ग दिखाने वाला गुरु नहीं हो सकता, गुरु वह है जो सत्य, अहिंसा का मार्ग दिखाता है, आत्मा को परमात्मा से एकाकार करवाता है। 

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'गुरू' ' पूर्णिमा' का चाँद है

ओशो ने हमारी भारतीय परंपराओं और रीति-रिवाजों पर बेहद गहन और सूक्ष्म दृष्टि से अपना विवेचन प्रस्तुत किया है। उन्होंने हमारी परंपराओं में व्याप्त विकृतियों को भी उघाड़ा है तो इन परंपराओं में छुपी गहरी अध्यात्मिकता, वैज्ञानिकता और सामाजिक उपयोगिता को भी स्थापित करने का प्रयास किया है। ओशो ने कई शब्दों और परंपराओं को एकदम नए अर्थों से परिभाषित किया है। 

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वैष्णव जन तो तैने कहिये, जे पीर पराई जाने रे

आप अपनी जिंदगी किस तरह जीना चाहते हैं? यह तय होना जरूरी है, आखिरकार जिंदगी है आपकी! यकीनन, आप जवाब देंगे-जिंदगी तो अच्छी तरह जीने का ही मन है।

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जीवन व्यवहार में निखार के ग्यारह अचूक सूत्र

ओशो की वाणी में से कुछ बहुमूल्य चुनना जितना आसान है,उतना ही मुश्किल भी। उनकी वाणी के अथाह सागर में से कुछ भी कहीं से भी ले लें, हर वाक्य ग्रंथ की तरह है। उनके साहित्य के नियमित व सतत अध्ययन के क्रम में मैंने चुने हैं उनके ये 11 स्वर्णिम सूत्र, जिन्हें अपनाकर बिलकुल सम्भव है आप भी अपने व्यावहारिक जीवन को सफल बना सकते हैं।

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स्वयं से रूबरू होने का लक्ष्य बनाएं?

जीवन में व्यक्ति और समाज दोनांे अपना विशेष अर्थ रखते हैं। व्यक्ति समाज से जुड़कर जीता है, इसलिए समाज की आंखों से वह अपने आप को देखता है। साथ ही उसमें यह विवेक बोध भी जागृत रहता है ‘मैं जो भी हूं, जैसा हूं’ इसका मैं स्वयं जिम्मेदार हूं। 

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अँधेरे में माचिस की तलाश,उजाले की चाह का सबूत

विचित्र है मानव मन.कभी यह मन अपने अदृश्य पंखों से हिमालय की ऊँचाइयों तक पहुँचना चाहता है, कभी उन्हीं पंखों को समेटकर सागर की गहराइयाँ नापना चाहता है. कभी धूमिल आतीत को याद करता है, तो कभी स्वप्निल भविष्य में खो जाता है हमारा मन. 

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तुलसी माला की महिमा

भारतीय संस्कृति विभिन्न मान्यताओं, परम्पराओं, विश्वासों और सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाजों से परिपूर्ण है। इस संस्कृति जैसी कोई अन्य मिसाल सम्पूर्ण विश्व में मिलना मुश्किल है। इसी संस्कृति के बहुत से मांगलिक प्रतीकांे में एक अभिन्न अंग है तुलसी माला।

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शब्दों की फिजूलखर्ची से बिगड़ते माहौल से सावधान

इन दिनों जितना बोला जा रहा है, उतना शायद इतिहास में कभी नहीं बोला गया. कौन बोल रहा है, क्यों बोल रहा है, क्या बोल रहा है, समझ में नहीं आ रहा. बोला जाना एक शौक में, चीख में बदल चुका है.लोग माइक में चिल्ला रहे हैं कि बोला जाना ध्वनि प्रदूषण की श्रेणी में आ गया है.

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हाथ उठते नहीं कि दुआ क़ुबूल हो जाती है

संसार में सब एक-दूसरे से मिलजुल कर ही काम कर सकते हैं। आपकी भावनाएं दूसरों के लिए साफ होनी चाहिए क्योंकि जैसी भावना आप दूसरे के लिए रखते हैं, वैसी ही वह आपके लिए रखता है। आप किसी को प्यार करते हैं तो वह आपको प्यार करता है। 

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मन है अर्जुन और विवेक चेतना श्री कृष्ण

पानी का अपना कोई आकार नहीं होता। उसे जिस पात्र में भी डालते हैं, वह उसी का आकार ले लेता है। इसी तरह चित्त का भी अपना कोई आकार नहीं होता। उसको जिस ख्याल में आप रखेंगे, उसी के मुताबिक हो जाएगा। चिंतन का अर्थ होता है, मन का किसी एक विचार में बार-बार रमण करना।

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चलो फिर अहिंसा के बिरवे उगाएँ

प्रसंगवश भगवान महावीर की जयन्ती पर अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य तुलसी के विचार मननीय प्रतीत हुए कि सभी व्यक्ति अहिंसा की शीतल छाया में विश्राम पाने के लिए उत्सुक रहते हैं, सत्य का साक्षात्कार करना चाहते हैं.

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'सॉफ्टवेयर' इंजीनियर से 'सेल्फ अवेयर' साधिका का नया सफर

संस्कारधानी के संस्कार,सुलझे हुए विचार और आत्मकल्याण को व्यवहार में उतारने का अडिग संकल्प लेकर मुमुक्षु कु.प्रगति कोटडिया दो मार्च को श्री कैवल्यधाम तीर्थ,कुम्हारी में श्री जैन भागवती दीक्षा ग्रहण करेंगी।

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