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Hindi Media - धर्मयुग की याद में एक अनूठा आयोजन
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धर्मयुग की याद में एक अनूठा आयोजन

धर्मयुग की याद में एक अनूठा आयोजन

मुंबई में जहाँ किसी को अपने आपक लिए समय नहीं है ऐसे में कोई एक ‘दिवंगत’ लेकिन पाठकों ह्रदय में उसी शिद्दत से मौजूद पत्रिका और उससे जुड़े लोगों को उसके सहायक संपादक के जन्म दिन पर कोई सफल आयोजन हो तो उस आयोजन को इस साल के बेहतर आयोजनों में शुमार किया जाना चाहिए। मुंबई से लेकर देश भर में हिन्दी से नाम और करोड़ों कमाने वाले हिन्दी के साहित्य से जुड़े किसी आयोजन में जाने में अपनी शान के खिलाफ समझते हैं, लेकिन इस आयोजन में धर्मयुग से जुड़ी रही पूरी पूढ़ी मौजूद थी।

कार्यक्रम का आयोजन धर्मयुग से जुड़े रहे श्री ओम प्रकाश सिंह ने �किया था, जो इन दिनों मुंबई में एब्सोल्यूट इंडिया के नाम से हिन्दीऔर अंग्रेजी में समाचार पत्र का प्रकाशन कर रहे हैं।

इस अवसर पर हिन्दी की जानी मानी लेखिका और धर्मयुग से अपने लेखन की शुरुआत करने वाली श्रीमती सूर्यबाला ने कहा कि वह हिन्दी साहित्य का एक ऐसा स्वर्णिम दौर था जब हर लेखक का सपना होता था कि उसका नाम धर्मयुग में छपे। धर्मयुग के संपादक श्री भारती लेखकों से लेकर पाठकों केहर पत्र का जवाब ही नहीं देते थे बल्कि उनकी कमियों पर भी एक दो लाईन लिखते हुए सुझाव देते थे। श्री भारती ने धर्मयुग के माध्यम से लेखकों की एक ऐसी पौध तैयार की, जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल है।

धर्मयुग के संपादकीय �विभाग से जुड़ी रही श्रीमती सुदर्शना ने कहा कि भारतीजी एक ऐसे संपादक थे जो लेखकों में से कोयले से हीरे तारशते थे। ऐसे संपादक हिन्दी पत्रकारिता में एक दुर्लभ घटना है।
धर्मयुग के संपादक स्व. धर्मवीर भारती की अर्धांगिनी श्रीमती पुष्पा भारती ने स्व. भारतीजी की अरम रचना कनुप्रिया का पाठ कर पूरे आयोजन को एक नई ऊँचाई प्रदान की।
इन्दौर से आए विश्वविख्यात चित्रकार एवँ कहानी लेखक श्री प्रभु जोशी ने कहा कि ये आयोजन तो उस टाईम्स ऑफ इंडिया को करना था जिसने धर्मयुग का प्रकाशन किया था, लेकिन ये हमारे दौर का एक नया चलन है से स्वीकार कर लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद धर्मयुग ने सांस्कृतिक पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया। उन्होंने कहा कि धर्मयुग ने ये दिखा दिया कि मनुष्य जब संवेदनहीन हो जाता है और बंदूक उठाने लगता है तब सौंदर्य और संस्कृति रुपू मोहिनी ही उस भस्सुर को खत्म कर सकती है।
डोगरी और हिन्दी की प्रख्यात लेखिका श्रीमती पद्म सचदेव ने कहा कि भारतीजी न धर्मयगु के माध्यम से पत्रकारिता, पत्रिका, संपादन, लेखन, विचार और राजनीतिक चिंतन के ऐसे प्रतिमान गढ़ दिए हैं कि आज के दौर की पत्रकारिता उसके न्यूनतम स्वरूप को भी नहीं छू सकती।

लेखिका सुधा अरोड़ा ने कहा कि धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारतीजी को लेकर पिछले दिनों एक आयोजन फिल्मी दुनिया के लोगों ने जिस फूहड़ता से किया उससे हर हिन्दी पाठक को बेहद शर्मिंदगी हुई। ऐसे आयोजन हम अपने लोगों के बीच हों और शाल श्रीफल हार फूल जैसी औपचारिकता से हटकर चौपाल की तर्ज पर हों तो ज्याद गरिमामयी लगेंगे।

श्री मनमोहन सरल ने अपने सम्मान के प्रत्युत्तर में कहा कि जब धर्मयुग बंद हुआ उस समय उसकी 1.70 लाख प्रतियाँ छपती थी, लेकिन उसे जानबूझकर धीमी मौत मारा गया। उन्होंने कहा कि इस देश का सैनिक सीमा पर अकेले कड़कड़ाती ठंड में मोमबत्ती जलाकर धर्यमुग पढ़ता था और देश की धड़कनों से अपने आपको जुडा हुआ महसूस करता था। विदेशों में भारतीय दूतावासों में विदेशी छात्र हिन्दी सीखने के लिए धर्मयुग पढ़ते थे। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश बंगाल के लोग धर्मयुग पढ़ने �के लिए हिन्दी सीखते थे।

लेखिका अचला नागर ने ने कहा कि धर्यमुग का दौर वह दौर था जब लोगों के हीरो अमिताभ बच्चन या शाहरूख खान जैसे फिल्मी सितारे नहीं बल्कि भारती जीऔर धर्मयुग में प्रकाशित होने वाले लेखक-लेखिकाएँ होते थे।

मुंबई मारवाड़ी समाज के अध्यक्ष श्री सुशील व्यास ने कहा कि मुंबई का पूरा मारवाड़ी समाज धर्मयुग का दीवाना था और जिसके घर में धर्मयुग आता था लोग उसे इज्जत की नजरों से देखते थे।

इस अवसर पर संन्यास आश्रम के महामंडलेश्वर स्वामी श्री विश्वेश्वरानंदजी ने कहा कि आज से तीस साल पहले हम जब देहरादून जते थे तो स्टेशन पर पहुँचते ही धर्मयुग की तलाश करते थे क्योंकि देहरादून एक्सप्रेस तब 30 घंटे में देहरादून पहुँचाती थी और सफर के लिए धर्मयुग से अच्छा कोई साथी नहीं होता।

वरिष्ठ पत्रकार श्री नंदकिशो नौटियाल ने कहा कि हमने ब्लिट्ज़ के माध्यम से भले ही पत्रकार तैयार किए हों लेकिन भारती जी ने धर्मयुग के माध्यम से पत्रकार ही नहीं बल्कि सशक्त व संवेदनशील साहित्यकार की पौध तैयार की जो आज भी दुनिया भर में विश्वविद्यालयों और प्रकाशन संस्थानों में लहलहा रही है।

कार्यक्रम का संचालन श्री ओम प्रकाश सिंह ने किया, पूरे संचालन में बार बार वही बातें दोहराने की वजह से संचालन अतिशयोक्तिपूर्ण हो गया बार बार हार शाल और श्रीफल देने का सिलसिला भी वक्ताओं व श्रोताओं के बीच बार बार बाधा बनता रहा। लेकिन उनके इस अभिनव प्रयास की सभी वक्ताओं व श्रोताओं ने दिल खोलकर प्रशंसा की। धर्मयुग से के अंतिम संपादक �श्री विश्वनाथ सचदेव ने भी संबोधित किया। इस कार्यक्रम में �धर्मयुग की संपादकीय टीम में कार्यरत कई लोग उपस्थित थे।


श्री प्रभु जोशी ने श्री मनमोहन सरल का शानदार पोट्रेट उन्हें भेंट किया।

कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार श्री अनुराग चतुर्वेदी के पिता व देश के जाने माने कवि और जेपी आंदोलन से जुड़े �श्री नंद चतुर्वेदी को �और धर्मयुग की संपादकीय टीम से जुड़ी रुमा भादुड़ी सेनगुप्ता को श्रध्दांजलि भी अर्पित की गई।

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