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Hindi Media - मानवाधिकारों को तरसती जम्मू कश्मीर की लाखों सूनी आँखे..
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मानवाधिकारों को तरसती जम्मू कश्मीर की लाखों सूनी आँखे..

मानवाधिकारों को तरसती जम्मू कश्मीर की लाखों सूनी आँखे..

दो विश्व युद्ध लड़ने के बाद और भीषण नरसंहारों के दौर से गुजरने के बाद विश्व को शांति की याद आई। इस शांति के आवाहन का ही फल था, संयुक्त राष्ट्र संघ का मानव अधिकार घोषणा पत्र 1948। मानव के अधिकारों को बुनियाद मानते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने ये घोषणा पत्र जारी किया और मानवाधिकारों के लिए एक मानद तय किया, संपूर्ण विश्व के लिए। वैसे तो ये सारे सदस्य राष्ट्रों के लिए आवश्यक है कि वे मानवाधिकारों का पालन करें परन्तु दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए तो और भी आवशयक हो जाता है। अपनी मानवाधिकार सम्बन्धी घोषणा की शुरुआत में ही संयुक्त राष्ट्र संघ मानव के सम्मान और स्वाभिमान की बात करता है।

भारतीय संविधान, संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकारों सम्बन्धी घोषणा पत्र पर शब्द दर शब्द हामी भरता है और उसका पालन हो, इसकी व्यवस्था भी करता है। परन्तु संयुक्त राष्ट्र संघ का घोषणा पत्र और भारत के संविधान को जाने क्या हो जाता है?, जब वे जम्मू और काश्मीर राज्य में लागू होते हैं।

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकारों के घोषणा पत्र का अनुच्छेद 2 जो व्यक्ति को आज़ादी का अधिकार देता है और किसी भी तरह के भेद भाव की अनुमति नहीं देता, चाहे वो जाति प्रजाति के आधार पर हो या रंग, लिंग, भाषा, धर्म, राजनैतिक विचारधारा, जन्मस्थान, संपत्ति या अन्य किसी भी बहाने से। सारी दुनिया इस घोषणा पत्र को मानती है और भारत में भी भारतीय संविधान यही बातें दोहराता है। परन्तु जम्मू काश्मीर राज्य में आते ही ठीक इसके विपरीत काम होता हुआ सा दिख जान पड़ता है। जम्मू काश्मीर राज्य में जाने वो कौन से कारण हैं? जिनकी बुनियाद पर व्यक्ति और समुदाय विशेष के साथ भेद भाव किया जाता है।

अब हम लिंग के आधार पर भेद भाव की बात करें तो देखेंगे की स्त्री पुरुष को बराबर का अधिकार नहीं है, राजनैतिक या नौकरियों में आरक्षण तो बाद की बात है, पहले उन्हें अपने पसंद के व्यक्ति के साथ विवाह करने तक की आज़ादी नहीं है। जम्मू काश्मीर की लड़की अगर जम्मू काश्मीर राज्य के बहार के लड़के के साथ विवाह करती है तो उसकी आने वाली पीढ़िया माता की तरफ से मिलने वाली अचल संपत्ति की वारिस नहीं बन सकती। राज्य सरकार माता की संपत्ति को उसके बच्चो को हस्तांतरित नहीं होने देती, ये साफ़ तौर पर मानवाधिकार घोषणा पत्र के अनुच्छेद 16 एवं 17 का हनन है जो व्यक्ति को विवाह और परिवार बसाने का अधिकार देता है।

भाषा की आज़ादी तो जैसे जम्मू काश्मीर राज्य के लिए बनी ही नहीं है। जम्मू काश्मीर राज्य में मुख्यतः डोंगरी, काश्मीरी, लद्दाखी, दर्दी, बाल्टी भाषाए बोली जाती है परन्तु जाने वो कौन से कारण थे कि इन सारी भाषाओँ का गला घोंट कर उर्दू को राज्य की भाषा बना दिया गया और आज सारी जनता अभिशप्त है एक परदेसी भाषा को पढ़ने के लिए और राजकार्य चलाने के लिए।
 
जन्मस्थान के आधार पर भेद भाव नहीं होगा ऐसा मानवाधिकार का घोषणा पत्र कहता है। परन्तु जम्मू काश्मीर में तो जन्मस्थान के नाम पर भेद भाव की वैधानिक इजाजत ही मिली हुई है। सरकार ने ऐसे-ऐसे कानून बना रखे हैं जिस से भेद भाव को खुली छूट मिलती है। "परमानेंट रेजिडेंट सर्टिफिकेट" नाम का एक कानून 50 के दशक में राज्य सरकार द्वारा बनाया गया और उसे लागू किया गया । लाखो लोग जो 1947  के विभाजन के बाद भारत में आये और जम्मू काश्मीर राज्य में बसे, वे इस कानून से बुरी तरह प्रभावित हुए और हो रहे हैं । इस कानून की वजह से लाखों लोग भारत के नागरिक तो हैं लेकिन जम्मू काश्मीर राज्य में कोई हैसियत नहीं रखते। ना ही वो पंचायत में वोट दे सकते हैं, न ही घर बना सकते हैं, ना ही राज्य सरकार की नौकरी कर सकते हैं और ना ही अपने बच्चों को राज्य सरकार के शिक्षण संस्थानों में भेज सकते हैं । ये संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार घोषणा पत्र के अनुच्छेद 17 , 21  व 26 का स्पष्ट हनन है। अब अगर हम देखें तो लाखों लोग जो 50 साल, 60 साल या कुछ तो 170 साल से जम्मू काश्मीर राज्य में रह रहे हैं लेकिन हर दिन अपने मानवाधिकारों का हनन झेल रहे हैं । अगर हम मानवाधिकार अनुच्छेद 23 को देखें तो, वो आज़ादी देता है अपना व्यवसाय चुनने की। परन्तु जम्मू काश्मीर राज्य में इसके विपरीत ही कानून बना हुआ है।

ग़ुलामी की प्रथा 1865  में अमेरिका में समाप्त कर दी गयी थी और 1949  में संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी ग़ुलामी की प्रथा की समाप्ति पर अपनी मुहर लगा दी थी। भारतीय संविधान भी बंधुआ प्रथा को प्रतिबंधित करता है। परन्तु ये सारी चीज़े जम्मू काश्मीर राज्य में बेमानी हो जाती हैं । जम्मू काश्मीर राज्य में बाकायदा कानून बना कर बंधुआ मजदूरी प्रथा को जीवित रखा गया है। सफाई कर्मचारियों के बच्चे चाहे जितना पढ़ लिख ले वे राज्य सरकार के अनुसार सिर्फ सफाई कर्मचारी ही बन सकते है। सफाई कर्मचारी का पुत्र अपनी तमाम योग्यताओ के बावजूद बंधक है सिर्फ सफाई कर्मचारी बनने के लिए, मैला धोने के लिए। समाज के ऊँचे तब्को की ग़ुलामी करने के लिए। अपना स्वाभिमान आत्मसम्मान मिटाने के लिए। गोरखा का पुत्र बंधक है गोरखा बन ने के लिए। श्रीनगर के अमीरों के बंगले के आगे चौकीदारी करने के लिए
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