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35 ए को न सरकारें समझी न अदालतें, फिर भी ये लागू रहा-4

भारत के संविधान के अनुषेद 370 को अकसर विवादों के घेरे में धकेला जाता रहा है. इस में कोई शक नहीं है कि अनुच्दछे -370 को संविधान में डालने की आवश्यकता पर प्रश्न खड़े किए जा सकते हैं और इस के अस्थायी होने के बाबजूद 70 साल बाद भी बने रहने पर चर्चा होनी चाहिए पर फिर भी अनुच्छेद 370 के अस्तित्व पर प्रश्न करना संबिधान की दृष्टि से शायद उतना उचित न हो जब कि अनुच्छेद 35A के अस्तित्व पर प्रश्न मेरी समझ के अनुसार तकनिकी दृष्टि से उच्चित है !

जम्मू कश्मीर से सम्बंधित जिन कुछ विषयों की चर्चा यहाँ की गई है उन के लिए अनुच्छेद 370 को ही अधिकतर लोग दोषी ठहराते हैं जब कि ऐसा कहना पूर्णतया उचित नहीं है. अनुच्छेद 370 के अलावा भारत के संविधान में अगर कोई और अनुषेद है जो भारत के नागरिकों के बीच भेद भाव और मूल अधिकार या मानव अधिकार के हनन के एवं विबादों के लिए दोषी ठहरैया जाना चाहिए वे यही अनुषेद 35A है ! अगर कहा जाए कि इस का होना अनुच्छेद 370 से भी अधिक आमजन एवं भारत के राष्ट्रिय हित के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ है तो यह भी गलत नहीं होगा क्यों कि इस की बजह से कुछ लोग अपना राजनीतिक स्वार्थ ज्यादा पूरा किए हैं और जन हित कम ! यह बात किसी को भी चकित कर सकती है कि जम्मू कश्मीर के कुछ स्थायी निबासी और पुराने स्टेट सब्जेक्ट होल्डर भी इस के रहने का विरोध करते है ! हाँ इतना जरूर है कि विरोध करने वाले अधिकांश लोग जम्मू और लदाख क्षेत्र से हैं !

जम्मू कश्मीर की सरकारें कहती तो रही हैं कि अनुच्छेद की शकल में उन के नेताओं ने भारत से जम्मू कश्मीर के पुराने स्टेट सब्जेक्ट्स के लिए कुछ ख़ास रियायतें देने के अधिकार भारत सरकार / संबिधान से लिए हैं जिन को भारत के अन्य नागरिकों के मूल अधिकारों का हनन करने का संग्रक्ष्ण अनुच्छेद 35A देता है ! पर यह बात किसी को भी हैरान कर देगी कि जम्मू कश्मीर के कुछ स्थायी निबासी और पुराने स्टेट सब्जेक्ट होल्डर भी इस के रहने का विरोध करते है ! कश्मीर घाटी के जो लोग विवादों को सुलझाने का विरोध करने के साथ साथ अनुच्छेद 35A के अर्तित्व पर उठे प्रश्नों से बिचलित हुये हैं वे इस अनुछेद और इस के संग्रक्ष्ण में पनप रहे भेद भाव को ज्यादा तर जम्मू कश्मीर राज्य की एक तरह से अलग राष्ट्रियता , अलग पहचान और यहाँ तक के मुस्लिम बहुल पहचान का ‘निशान’ बना कर दुनियां के सामने रखते हैं ! इसी कारण यह सोचने की जरूरत महसूस हुई कि कैसे इस जाल को काटा जाए और इस राज्य के लोगों को धर्म और क्षत्र के नाम पर बंटने से रोका जाए.

सुधारों के लिए और कोई दूसरा रास्ता दूंदते हुए मैंने पएया की अनुच्छेद 370 की सम्बेधानिक वैधयता पर प्रश्न आसानी से खड़े नहीं किए जा सकते पर अनुषेद 35A की तकनिकी सम्बेधानिक वैधयता पर प्रश्न खड़े किए जा सकते हैं और इस के जनम को ही असम्बेधानिक कहा जा सकता है और इस पर ऊच्तम न्यायालय की संवैधानिक पीठ द्वारा विचार करने की मांग की जा सकती है. जब मैंने इस अनुच्छेद पर नजदीक से नज़र डाली तो पाया कि बहुत से कानूनविद इस अनुच्छेेद के बारे में कुछ नहीं जानते।

भारत के संविधान में अनुछेद 35 A ( 1954) को भारत की रियासत जम्मु कश्मीर के विधान के लिखने से पहले ही डाल दिया गया था. पर जिस बात पर विशेष ध्यान देने की अवश्यकता है बह यह है कि यह अनुच्छेद भारत की संबिधान सभा ने न लिखा था और न ही पारित किया था . न ही यह अनुच्छेद भारत की संसद ने संबिधान में संशोधन कर के डाला था , अपितु यह अनुच्छेद राष्ट्रपति के संबिधान ( जम्मू कश्मीर को लागु होना) आदेश 1954 सी.ओ.४८ मई १४ 1954 द्वारा अनुच्छेद 370 की क्लॉज़ १ का सहारा ले कर एक नए अनुच्छेद के रूप में डाला गया था जब कि अनुच्छेद 370 किसी भी दृष्टि से राष्ट्रपति को संबिधान को बदलने का न कर्तब्य देता है न ही अधिकार देता है जबकि सबिधान में कोई नया अनुच्छेद डालना संबिधान में संशोधन करने जैसा ही है ! अनुच्छेद 35A को संबिधान में डालना एक तरह से संबिधान में संशोधन करने जैसा ही है और इस लिए यह कहना किसी भी दृष्टि से गलत नहीं होना चाहिए कि अनुषेद-370 के अंतरगत राष्ट्रपति को संबिधान में संशोधन करने का इस प्रकार का अधिकार नहीं था.

इतना ही नहीं ,कोई भी अगर अनुच्छेद 35A को ध्यान से पड़ेगा तो उस के लिए यह समझाना कठिन नहीं होना चाहिए की अगर संबिधान सभा को भी ऐसा करने के लिए सुझाब दिया जाता तो बे कभी ऐसा नहीं करती और अगर करती तो सिर्फ उस की सोच पर .ज्याद प्रश्न लगते न कि अधिकार क्षेत्र पर !.

इस लिए 1954 में संबिधान ( जम्मू कश्मीर को लागु होना) आदेश 1954 सी.ओ.48 मई 14 1954 राष्ट्रपति द्वारा संबिधान के अनुच्छेद 370 के खंड -1 में राष्ट्रपति को प्राप्त शक्तिओं का नाम ले कर अनुच्छेद 35 के बाद संबिधान में अनुच्छेद 35A के नाम से एक नया अनुच्छेद डाला जाना जरूर सबालों के घेरे में आता है क्यों कि इस प्रकार की कोई भी शक्ति संबिधान में संशोधन करने की अनुच्छेद 370 के माध्यम से राष्ट्रपति जी को नहीं मिलती है !. कोई भी संशोधन अनुच्छेद 368 के अंतर्गत ही किया जा सकता है और वह भी सिर्फ संसद द्वारा ही.

यह ही नहीं इस नए अनुच्छेद को भारत के संबिधान के मुख्य भाग में न रख कर के परिशिष्ट-1 ( एपेंडिक्स – I ) के रूप में संबिधान के साथ रखा गया !. शायद यही कारण है कि किसी चिन्तक और विधि विश्लेषक का ध्यान इस के सबिधानिक पहलुओ की ओर एक पैनी द्रृष्टि से पिछले 6 दशक तक नहीं गया.था. अनुच्छेद 35A में जो कुछ रखा गया है उस में बहुत सी बातों का प्रतिबिंब / मूल आधार एक तरह से शेख मोहमद अब्दुल्लाह और पंडित जवाहर लाल नेहरुजी के बीच हुए 1952 के दिल्ली एग्रीमेंट में दीखता है !

साल १९४ ६ से लेकर साल 1954 तक भारत के शीर्ष राजनीतिक नेत्रित्व की सोच और व्यव्हार जो भी रहा हो उस पर वाद विवाद से बचना ही अच्छा होगा ! जो कानून उस समय बने होंगे वे उस समय की राजनीतिक सोच , समझ और सिमित राजनीतक एवं प्रशासनिक अनुभव के हिसाब से हो सकता है पूरी दयानतदरी से वनाये गए हों इस लिए उन के सन्दर्व में चर्चा सीमित रहनी चाहिए ! ऐसे ही अनुच्छेद 35A के साथ भी करने की जरूरत है , बजाए इस के कि उस समय कौन नेता थे और उन के आपस में जाति सम्बन्ध क्या थे , अनुछेद 35A को प्रशानिक एवं सम्बेधानिक पहलुओं की कसोटी पर ही परखना चाहिए ! इस लिए अनुच्छेद 35A के अस्तित्व पर जो प्रश्न खड़ा हुआ है उस को उच्चतम न्यायालय पर छोड़ देना ही उचित होगा और जो कुछ लोग इस विषय को रजनीतिक डंग से उठाने की कोशिश कर रहे हैं उन यह समझना चाहिय कि कोर्ट पर राजनीतिक या जनता का प्रभाव नहीं डाला जा सकता है और न हिन् ऐसा करना जनहित में होगा !

हाँ सरकारों को भी संवेदनशीलता से राष्ट्रीय विषयों को लेना चाहिए और जहां तक हो सके ज्यादा देर प्रश्नों को ‘दबा ’ कर नहीं रखना चाहिय इस लिए आज की मोदी सरकार को दिल्ली एग्रीमेंट 1952 की बैध्यता जैसे मुद्दों पर भी कम से कम अब तो अपना मत साफ़ करना चाहिए जैसे इस सरकार ने प्रश्न संख्या 138 के उत्तर में राज्य सभा में 11 मार्च 2015 में साफ़ शब्दों में कह दिया है कि भारत के संबिधान में जम्मू कश्मीर राज्य को अनुच्छेद 370 के माध्यम से कोई विशेष दर्जा नहीं दिया गया है !

(लेखक कश्मीरी पंडित हैं और जम्मू कश्मीर के कानूनी मामलों के विशेष जानकार हैं)

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