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78 वर्षीय व्यक्ति ने कोटा जनजाति की भाषा को ऐसे बचाया

चेन्नई। भारत के बारे में कहा जाता है कि यहां कोस-कोस में पानी बदले, चार कोस में वाणी। यानी करीब तीन किलोमीटर में पानी का स्वाद बदल जाता है और 12 किमी में भाषा बदल जाती है। यह विविधता जहां भारत की पहचान है, वहीं सैकड़ों देशज भाषाएं होने के कारण उनके खत्म होने का खतरा भी रहता है। कुछ ऐसा ही हो रहा है कोटा भाषा के साथ, जिसके खत्म होने का खतरा है।

मगर, 78 साल के कोटा पुजारी पोसारी कनगराजन ने इस भाषा को जीवित रखने का बीड़ा उठा रखा है। द न्यूज मिन्ट साइट के अनुसार, उन्होंने आठवीं कक्षा के बाद पारंपरिक शिक्षा हासिल नहीं की है। मगर, कोटा जनजाति की भाषा को बचाने के लिए कोवमोझी में दो किताबें लिखकर प्रकाशित करा चुके हैं। उनकी सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि कोवमोझी लिपि का विकास है क्योंकि इस भाषा में अपनी कोई औपचारिक लिपि नहीं थी। इस भाषा का इस्तेमाल केवल कोटा जनजाति के लोग बोलचाल में करते थे।

तमिलनाडु के नीलगिरी की प्रमुख जनजातियों में ईरुलस, टोडस, कोटा और कुरुम्बा हैं। कोटा आमतौर पर ऊपरी ऊंचाई पर टोडस के साथ रहते हैं और मैदानों पर कभी नहीं जाते। कनगराजन याद करते हैं कि 1910 में पूरी जनजाति को अंग्रेजों ने कोटागिरि में वर्तमान नेहरू पार्क क्षेत्र से विस्थापित कर दिया था।

कनगराजन ने द न्यूज मिनट को बताया कि हमें एक निचले इलाके में भेज दिया गया था। साल 1960 में भारी बारिश के बाद जमीन दो हिस्सों में बंट गई और एक विशाल दरार उनके बीच आ गई थी। यह बात मुझे अब भी यह याद है। यदि आप इसमें एक पत्थर का टुकड़ा डालेंगे, तो यह अंतहीन कुएं में गिरता चला जाएगा। इसके बाद कोटा को फिर से सात गांवों में फैले भूमि आवंटित की गईं। हर गांव में जिस जो कोटा भाषा की बोली जाती है, वह अलग तरह की है। कोटागिरी को उसका नाम भी कोटा जनजाति से ही मिला है। जब तमिल यहां आए, तो उन्होंने इस जगह का नाम कोटा-गिरी रखा, जिसका अर्थ है कोटा का पहाड़।

खत्म होने की कगार पर है भाषा

नीलगिरी की अधिकांश जनजातीय भाषाओं की लिपि नहीं है। कनगराजन को अपनी भाषा और संस्कृति से विशेष लगाव है। उन्हें डर है कि उनकी भाषा कहीं खत्म न हो जाए और इसे बचाने के लिए उन्होंने भाषा को किताबों में रिकॉर्ड करने का फैसला लिया। इस तरह वह इस भाषा का संरक्षण करने और उसे फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। कनगराजन की पहली किताब साल 1985 में कई ट्रायल एंड एरर के बाद प्रकाशित हुई थी। इसमें बुनियादी कोवमाझी भाषा का इस्तेमाल किया गया है। कोवमाझी डिक्शनरी के रूप में उनकी दूसरी किताब साल 2016 में प्रकाशित हुई थी।



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