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ए डॉग्स परपज

२०१० में जाने माने अमरीकी हास्य और व्यंग लेखक डब्लू ब्रूस कैमरान लिखित उपन्यास ए डॉग्स परपज प्रकाशित हुआ लोगों को यह इतना पसंद आया कि न्यू यॉर्क टाइम्स बेस्टसेलर सूचि के शीर्ष पर ४९ सप्ताह तक रहा. मई २०१२ में कैमरान ने इसी कड़ी में अगला उपन्यास ए डॉग्स जर्नी लिखा. इस के फिल्मांकन के अधिकार ड्रीमवर्ल्ड ने खरीद कर ए डॉग्स परपज फिल्म बनायी है जो भारत में रिलायंस एंटरटेनमेंट ३१ मार्च को रिलीज करने जा रही है.

रोचक बात यह है कि फिल्म का नायक एक कुत्ता है जो अपनी जिंदगी का मकसद तलाश कर रहा है. फिल्म में नायक कुत्ता तीन बार कुत्ते के रूप में ही जन्म लेता है. कहानी का घटना क्रम छठे दशक में शुरू होता है और कोई पचास वर्ष तक चलता है।

प्लाट

फिल्म का नायक छठे दशक के अमरीका एक छोटे से कसबे टाउन्सविले में सड़क पर घूमने वाला रिट्रीवर नस्ल का एक आवारा कुत्ता है जिसे म्यूनिसपल्टी वाले पकड़ कर कांजी हौज में बंद कर देते हैं , लेकिन वह तो फिल्म का नायक ठहरा तो कूद फांद के बाहर निकल लेता है, उसकी मुलाकात एक किशोर एथान से होती है जो उसके ऐक्शन पर फ़िदा होकर अपने घर ले जाता है , अपने मां बाप को उसे घर में रखने के लिये मना लेता है , उसका नाम बेले रखा जाता है। बैले स्वगत बोलता भी है, इसे जाने माने कलाकार जोश गाद ने अपनी आवाज दी है. इस परिवार के बहाने फिल्म में अमरीका के छोटे छोटे कस्बों में गरीबी, मारपीट और नशे की तहजीब को बड़े सहज तरीके से दिखाया है. फिल्म में आगे चल कर बेले अपने अगले जन्मों में शिकागो पुलिस का खोजी मादा जर्मन शेफर्ड, फिर कार्गी नस्ल का टिनो और आखिर में बडी नाम का मिश्र बर्नार्ड बनता है. लेखक ने साधारण सी दिखने वाली कहानी में दिलचस्प पेंच डाले हैं जिसका अंदाजा क्लाइमेक्स के आते आते होता है.

फिल्म का सूत्रधार भी हमारा नायक कुत्ता ही है जो हर घटना प्रतिघटना पर अपनी प्रतिक्रिया देता चलता है. लेकिन इस फिल्म में कुछ प्रश्नों को अनुत्तरित ही छोड़ दिया है मसलन बैले के तीन पुनर्जन्म और वो भी कुत्ते के रूप में क्यों होते हैं , आखिर बैले ही क्यों बोल पता है उसके हमउम्र दुसरे कुत्ते क्यों नहीं और यह भी कि फिल्म के क्लाइमेक्स तक वह अपनी अंत्सचेतना को इतना विकसित कैसे कर लेता है कि वह अपने अस्तित्व के बारे में ऋषि मुनियों की तरह तर्क वितर्क करने लगे. कुत्ता अपने मालिक के पिता को खुशबु से पहचान लता है कि वह नशे में है, घर में लगी आग से अपने मालिक एथान को आगाह करता है , आग लाने वाले को दबोच लेता है , पुलिस के कुत्ते के र्रोप में अपने ट्रेनर की भूतपूर्व पत्नी का फोटो अपनी पूंछ से गिरा देता है , यही नहीं अगवा की हुई लड़की को जल की प्रचंड धारा से खींच कर निकाल लाता है। कहीं कहीं तो मुझे ऐसा लगा कि जैसे कैमरान ने अपने उपन्यास को लिखने से पूर्व बालीवुड या फिर टॉलीवुड फ़िल्में देखीं हैं। मुझे ऐसा भी लगा कि इस कथानक को चुनने से पूर्व लासे हाल्सटॉर्म ने यह सोचा होगा कि फिल्म को देख कर पुराने जमाने की फील गुड फिल्मों की याद आ जाय लेकिन अगर कोई इस फिल्म में तर्क ढूंढने लगेंगे तो फिर नींद आने लगेगी.

यह मानना पडेगा कि फिल्म शूट करने से पहले निदेशक ने भिन्न भिन्न नस्लों के कुत्तों की आदतों पर काफी शोध कार्य किया है।

यह फिल्म कौन देखे

गर्मी की छुट्टियां होने को हैं ऐसे में माता पिता अपने बच्चों के लिए स्वच्छ और रोचक फिल्मों की तलाश में रहते हैं, यह फिल्म इस अभाव को पूरा करेगी।

हमारा फैसला

फिल्म में कुत्ते ने एक शाश्वत सत्य का जवाब खोजना चाहा है कि आखिर उसकी जिंदगी का मकसद क्या है, उसने खुद कहा है ,’ इस समय यहां रहो यानि Be here now’. अगर देखा जाय तो यही हमारी जिंदगी का भी मकसद है.

निदेशक : लासे हॉल्स्ट्रॉम
कलाकार : जॉश गाद , डेनिस कुएद , पैगी लिपटन , के.जे. आपा
समय : १२० मिनट
रिलीज : रिलायंस एंटरटेनमेंट द्वारा ३१ मार्च को

(लेखक जाने माने फिल्म एवँ संगीत समीक्षक हैं)

संपर्क
प्रदीप गुप्ता
filmandmusiccritic@gmail.com
+91-9920205614

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