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रोगियों के व्यापक हितों की रक्षा में चिकित्सा व्यवसाय की मुक्ति आज की एक बड़ी आवश्यकता

राष्ट्रीय चिकित्सा परिषद की स्थापना इस उद्देश्य से की गई थी कि वह देखे कि देश में प्रदत्त चिकित्सा शिक्षा का स्तर श्रेष्ठ और ऊंचा हो और चिकित्सा सुविधाएं राष्ट्र के सभी भागों में सहज सुलभ हो। स्वतंत्रता के पूर्व स्थापित इस संस्था को सन 1956 में वैधानिक स्वरूप प्रदान कर उद्देश्यों की पूॢत हेतु इसे पर्याप्त अधिकार भी प्रदान कर दिए गए। किसी भी चिकित्सा महाविद्यालय को शुरू करने के पूर्व राष्ट्रीय चिकित्सा परिषद की पूर्व अनुमति आवश्यक बना दी गई ताकि वह यह देख सके कि चिकित्सा शिक्षा की सुविधाएं देश के सभी भागों में सुलभ हो सकें। किसी भी चिकित्सक द्वारा चिकित्सा कार्य शुरू करने से पहले चिकित्सा परिषद में पंजीकरण आवश्यक बना दिया गया ताकि वह सुनिश्चित कर सके कि अनुमति चाहने वाले चिकित्सक ने समुचित स्तर की शिक्षा प्राप्त की हो।

चिकित्सा परिषद को प्रदत्त इन दायित्वों का वह समुचित रूप पालन कर सके, इस हेतु उसे पर्याप्त अधिकार प्राप्त थे। उसके द्वारा प्रदत्त आदेश को किसी भी आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती, जैसे आदेश प्रदान करते समय परिषद के सभी सदस्य उपस्थित नहीं थे अथवा उसमें रिक्त स्थानों की पूॢत नहीं की गई थी आदि। इस तरह उसे एक निरंकुश अधिकार संपन्न संस्था बना दिया गया। इतिहास इस बात का गवाह है कि जब किसी संगठन या व्यक्ति को निरंकुश सत्ता प्रदान कर दी जाती है, तो वह संगठन या व्यक्ति समय के साथ अनेक विकृतियों और भ्रष्टाचार का माध्यम बन जाता है। राष्ट्रीय चिकित्सा परिषद के साथ भी यही हुआ।

इस पृष्ठभूमि में यह देखना आवश्यक है कि इस वैधानिक संस्था ने अपने दायित्वों और अधिकारों का समुचित रूप से पालन किया या नहीं। उसे चिकित्सा महाविद्यालयों की स्थापना की अनुमति प्रदान करते समय यह देखना था कि वे देश के सभी भागों में स्थापित हो। राष्ट्रीय चिकित्सा परिषद ने इस प्रावधान की उपेक्षा की। इस समय देश में निजी और शासकीय मिलाकर 380 चिकित्सा महाविद्यालय हैं। इनमें से आधे तो सिर्फ चार राज्यों कर्नाटक, तमिलनाड़ु, आंध्र प्रदेश (तेलंगाना सहित) और महाराष्ट्र में स्थित है जबकि इन राज्यों में देश की सिर्फ 30 प्रतिशत जनता ही निवास करती है। चिकित्सा महाविद्यालयों के ऐसे विषम भौगोलिक वितरण का अर्थ है कि देश के अन्य भागों में लोगों को चिकित्सकीय सुविधाओं का अभाव झेलना पड़ रहा है।

आम जनता को समुचित स्तर की चिकित्सा सुविधाएं प्राप्त हों, इस हेतु चिकित्सा पाठ्यक्रमों एवं प्रशिक्षण सुविधाओं का सतत पुनरीक्षण किया जाना आवश्यक होता है। ङ्क्षकतु परिषद ने अपने इस दायित्व की घोर उपेक्षा की। एमबीबीएस के पाठ्यक्रम में पिछले १४ वर्षों में कोई बदलाव नहीं किया गया है, जबकि इन वर्षों में चिकित्सा विज्ञान और तकनीक में क्रांतिकारी सुधार आए हैं। परिणामस्वरूप हमारे प्रशिक्षित और स्नातक एवं स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त चिकित्सक भी चिकित्सा विज्ञान और तकनीक में हुए परिवर्तनों से अनभिज्ञ रह जाते हैं, जिसका खामियाजा अंतत: मरीजों को ही भुगतान पड़ता है।

चिकित्सा व्यवसाय में नैतिकता का स्तर ऊंचा होना आवश्यक होता है क्योंकि रोगी को उसके रोग की किस्म, उसके लिए आवश्यक एवं उपयुक्त दवाओं, एक ही गुणवत्ता वाली दवा की अलग-अलग दवा कंपनियों द्वारा वसूल की जा रही कीमतों आदि के बारे में कोई ज्ञान नहीं होता। ऐसे में यह डॉक्टर का नैतिक दायित्व है कि वह समान गुणवत्ता वाली सबसे कम कीमत की दवा लिखे, केवल आवश्यक जांचें ही कराए और अत्यावश्यक होने पर ही सर्जरी करें। इस पृष्ठभूमि में भारतीय चिकित्सा परिषद को समय-समय पर निरीक्षण के माध्यम से व्यापक जनहित में यह सुनिश्चित करना था कि चिकित्सकों का नैतिक मापदंड उच्चस्तरीय एवं श्रेष्ठ हो, परन्तु ऐसा करने के स्थान पर चिकित्सा परिषद ने सन 2002 में चिकित्सकों के व्यावसायिक संगठनों को परिषद के नैतिकता कानून से मुक्ति प्रदान कर दी। सरकार ने भी इसको चुपचाप स्वीकार कर लिया। संसद की स्थाई समिति के अनुसार, चिकित्सकों के व्यावसायिक संगठनों को नैतिकता के प्रावधान से मुक्त करने का अर्थ डॉक्टरों और उनके संगठनों के अनैतिक एवं भ्रष्ट कार्यों को वैधता प्रदान करना है, वे दवा कंपनियों से महंगी-महंगी भेंट प्राप्त कर मरीजों को ऊंची कीमत वाली दवाएं लिख सकते हैं। संसद की स्थाई समिति का डॉक्टरों और उनके संगठनों के लिए यह कथन अत्यंत अपमानजनक है किंतु आंखों पर लोभ का चश्मा लगाए डॉक्टरों को ऐसे अपमानजनक कथन से भी बिलकुल बुरा नहीं लगा। इसी पृष्ठभमि में उच्च अधिकार प्राप्त संसदीय समिति ने आगे लिखा कि ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय चिकित्सा परिषद अपने लक्ष्यों से भटककर निहित स्वार्थों की पूर्ति का माध्यम बन गई है।

भारतीय चिकित्सा परिषद के सदस्यों के स्वरूप पर भी संसदीय समिति ने अपनी टिप्पणी में यह कहा कि भारतीय चिकित्सा परिषद के सदस्य न तो व्यावसायिक श्रेष्ठता का प्रतिनिधित्व करते है, न ही भारतीय संस्कृति का। इस समय परिषद के सदस्यों में से आधे से अधिक सदस्य तो कार्पोरेट अस्पतालों के या निजी प्रेक्टिस करने वाले डॉक्टर हैं।

भारी पैसा खर्च होने लगा है भारतीय चिकित्सा परिषद के चुनावों में

इसी तरह एक स्वास्थ्य विश्वविद्यालय की सलाहकार समिति ऐसे सदस्यों से भरी पड़ी है जिनका स्वास्थ्य एवं चिकित्सा से कोई लेना-देना नहीं है, वे तो केवल निजी हितों के पोषक हैं। भारतीय चिकित्सा परिषद के चुनावों में आम चुनावों की तरह भारी पैसा खर्च होने लगा है। ऐसे में सामान्य चिकित्सकों के लिए तो चुनाव लडऩा संभव ही नहीं हो पाता है। भारी राशि खर्च करने के पश्चात चुने गए सदस्य ही चिकित्सा महाविद्यालयों का निरीक्षण आदि करते है। ऐसे में चिकित्सा विज्ञान की समुचित समझ से वंचित परन्तु अधिकार संपन्न परिषद के ये सदस्य किस तरह का निरीक्षण करते होंगे, इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। भारत सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय दशकों तक ऐसी व्यवस्था चलने देने का गंभीर दोषी है।

चिकित्सा व्यवसाय की मुक्ति बड़ी आवश्यकता

इस पृष्ठभूमि में कालिख लगे भारतीय चिकित्सा परिषद की निरंकुश सत्ता से रोगियों के व्यापक हितों की रक्षा के लिए चिकित्सा व्यवसाय की मुक्ति आज की एक बड़ी आवश्यकता है। इसीलिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग की स्थापना की चर्चा चल रही है। ऐसे में हमारे चिकित्सकों, विशेषकर निजी चिकित्सकों के चिकित्सकीय व्यवसाय में नैतिक विकृतियों का प्रश्न उठ सकता है और उनके द्वारा मरीजों की चिकित्सा के दौरान अनेक अनैतिक प्रक्रियाओं और लूट पर प्रतिबंध लग सकता है। इसीलिए वे हर शहर, कस्बे में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग की स्थापना का विरोध कर रहे है परन्तु निहित स्वार्थों पर रोक के इस प्रयास की प्रक्रिया में उनके द्वारा महात्मा गांधी की मूॢत स्थल को चुनना बड़ा ही अजीब लगता है।

साभारः http://www.hastakshep.com/ से



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