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ऐ ज़िंदगी …..

ऐ ज़िंदगी, तू इतना भी मत हंसा,
कि कभी रोयें तो कोई आंसू पोछने वाला ना हो।
ऐ ज़िंदगी, तू इतना भी दर्द मत दे,
कि दवा की जरुरत हो और कोई दवा देने वाला ना हो।

ऐ ज़िंदगी, तू इतना भी खेल मत खिला,
कि थक जाएं तो कोई सहारा देने वाला ना हो,
ऐ ज़िंदगी, तू इतना भी स्वार्थी मत बना,
कि किसी निस्वार्थ पर भी शक होने लगे।

ऐ ज़िंदगी, तू इतना भी सत्य का पाठ मत पढ़ा,
कि कोई सत्य सुनकर किनारा करने लगे ।
ऐ ज़िंदगी, कब तक जिलाए रखेगी, दो चेहरों के साथ,
कि कोई अपना ही आईना दिखाने लगे ।

ऐ ज़िंदगी, कब तक झूठ यूँही बुलाती रहेगी,
कि कोई अपना ही हमसे नाराज होने लगे।

ऐ ज़िंदगी, इस रिश्ते की हकीकत यूँ छुपाए ना रख,
कि कोई अपना ही इस रिश्ते की हकीकत सामने ले आए।

ऐ ज़िंदगी, दाम्पत्य जीवन में ऐसा नाटक मत करा,
कि कोई नाटक से पर्दा हटाए तो दाम्पत्य जीवन पर ही आंच आ जाए।



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