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आरुषि तलवार हत्याकांड पर आया ऐतिहासिक फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के साथ ही देश की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री और उलझ गई है. नोएडा के चर्चित आरुषि-हेमराज हत्याकांड में हाईकोर्ट ने आरुषि के माता-पिता राजेश तलवार और नूपुर तलवार को बरी कर दिया है. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दोनों को संदेह का लाभ मिलना चाहिए क्योंकि निचली अदालत का फैसला ठोस सबूतों पर नहीं बल्कि हालात से उपजे सबूतों के आधार पर था. कोर्ट के इस फैसले के बाद राजेश और नूपुर तलवार गाजियाबाद की डासना जेल से रिहा हो जाएंगे. इससे पहले 25 नवंबर 2013 को गाजियाबाद की विशेष सीबीआई कोर्ट ने हालात से जुड़े सबूतों के आधार पर दोनों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी, जिसके खिलाफ जनवरी 2014 में दोनों ने इलाहाबाद हाइकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था.
इस मामले की दस खास बातेंं- जिनसे मामला उलझता रहा

इस मामले की शुरूआती जांच स्थानीय पुलिस ने की और फिर कुछ ही समय बाद यह मामला सीबीआई को सौंप दिया गया. सीबीआई की भी दो अलग-अलग टीमों ने इस मामले की जांच की. जैसे-जैसे इस मामले में जांचकर्ता बदले, वैसे-वैसे शक की सुई भी अलग-अलग लोगों की तरफ घूमती रही.

सीबीआई की पहली टीम मान रही थी कि आरुषि और हेमराज की हत्या डॉक्टर दंपत्ति के कंपाउंडर कृष्णा और उसके दो अन्य साथियों – राजकुमार और विजय मंडल – ने की है. लेकिन सीबीआई की दूसरी और आखिरी टीम ने तलवार दंपत्ति को इन हत्याओं का दोषी माना. इस टीम की रिपोर्ट के आधार पर ही सीबीआई कोर्ट ने तलवार दंपत्ति को उम्रकैद की सजा देने का फैसला सुनाया था जिसे अब उच्च न्यायालय ने पलट दिया है. जो बातें शुरुआत से ही तलवार दंपत्ति के पक्ष में जाती दिख रही थी, वे इस प्रकार हैं:

1. नार्को टेस्ट में डॉक्टर दंपत्ति और उनके पड़ोसियों के नौकरों ने अपराध करना स्वीकार किया था.

2. सीबीआई के कई लोगों ने यह बयान दिया था कि नौकरों ने अपने बयानों में भी अपराध स्वीकार किया है.

3. तलवार दंपति के नार्को में कुछ भी ऐसा नहीं पाया गया था जिससे उसकी अपराध में संलिप्तता स्थापित होती हो.

4. नौकर कृष्णा के तकिये से हेमराज का खून मिला था (हालांकि सीबीआई द्वारा कहा गया कि यह सिर्फ टाइपिंग की गलती के कारण हुआ है).

5. नार्को में नौकरों ने यह भी बताया कि घटना वाली रात वे सभी हेमराज के कमरे में शराब पी रहे थे और टीवी पर एक नेपाली गाना चल रहा था. इस बात की पुष्टि सीबीआई ने उस नेपाली चैनल से भी की थी जिससे यह स्थापित हुआ था कि उस रात वही गाना चैनल पर चलाया गया था.

6. सीबीआई टीम द्वारा तलवार के घर पर एक साउंड टेस्ट किया गया था. इसमें पाया गया कि यदि दोनों कमरों में एसी चल रहे हों तो एक कमरे की आवाज दूसरे में नहीं सुनाई पड़ती. ऐसे में संभव है कि हत्या वाली रात उसी घर में होने के बावजूद भी तलवार दंपत्ति को हत्या का पता न चला हो.

7. आरुषि और हेमराज के पोस्टमार्टम में कुछ भी असामान्य नहीं पाया गया था. लेकिन पोस्टमार्टम करने वाले दोनों डॉक्टरों ने लगभग एक साल बाद उसमें नए तथ्य जोड़ते हुए अपने बयान दिए. सीबीआई के जज एस लाल ने यह तो माना था कि आरुषि का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर दोहरे ने यह भारी चूक की है लेकिन फिर भी उनके बयान को स्वीकार कर लिया गया.

8. इस बात का कोई भी सबूत नहीं है कि हेमराज की हत्या आरुषि के कमरे में हुई थी. जबकि सीबीआई का तर्क था कि दोनों हत्याएं उसी कमरे में हुईं.

9. राजेश और नूपुर तलवार के कपड़ों पर सिर्फ आरुषि का खून मिला था. बचाव पक्ष का कहना था कि यह खून उस वक्त लगा जब सुबह उन्होंने अपनी बेटी की लाश देखी और उससे लिपटकर रोने लगे. हेमराज का खून उनके कपड़ों पर नहीं था. हत्या वाली रात आरुषि ने जो तस्वीरें ली थीं उनसे साफ था कि डॉक्टर दंपत्ति ने अगली सुबह भी रात वाले कपड़े ही पहने हुए थे. जिस बर्बरता से हेमराज को मारा गया था, यदि यह अपराध उन्होंने ही किया होता तो उनके कपड़ों पर हेमराज का खून भी लगा होना चाहिए था.

10. कई डॉक्टरों के पैनल ने यह बताया था कि हत्या खुखरी से किया जाना संभव है. पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर भी इस पैनल का हिस्सा थे. बाद में पोस्टमार्टम करने वाले दोनों डॉक्टरों ने अपने बयान और राय बदल दिए थे.

तलवार दंपति पर आरोप :
सेक्शन 302 आईपीसी : हत्या
सेक्शन 201 आईपीसी : सुबूत मिटाना.
सेक्शन 203 आईपीसी (सिर्फ राजेश तलवार पर) : अपराध के बारे में गलत सूचना देना

लोअर कोर्ट की कार्यवाही

प्रोसीक्यूशन के तर्क
इसमें कोई शक नहीं कि आरुषि और हेमराज जिस्मानी रिश्ते बना रहे थे.
आरुषि और हेमराज जिस्मानी रिश्ते बनाते वक्त मारे गए. और हत्या की वजह यही थी.
आरुषि की वेजाइना में सफेद डिस्चार्ज मिला जो जिस्मानी रिश्ते बनाना की गवाही देता है.
नतीजे में साबित होता है कि हत्या फ्लैट के अंदर हुई, जहां दोनों आरोपी तलवार दंपति मौजूद थे.
घर में किसी बाहरी के आने का कोई सुबूत नहीं.
इसलिए यह साबित करने की जिम्मेदारी तलवार दंपति की है कि यह अचानक गुस्से में हुआ कांड नहीं था.
हेमराज का खून आरुषि के बेडरूम में उसके तकिए पर मिला.
राजेश तलवार की गोल्फ स्टिक हत्या के लिए इस्तेमाल की गई.

बचाव पक्ष के तर्क
केस की बुनियाद सर्कमस्टेंशियल एविडेंस पर खड़ी की गई है, लेकिन इसमें बहुत झोल है.
अचानक गंभीर उत्तेजना और गुस्से के तर्क में दम नहीं है.
पोस्टमॉर्टम में सेक्सुअल असॉल्ट का कोई सुबूत नहीं है.
आरुषि की वेजाइना में सफेद डिस्चार्ज हॉर्मोनल चेंज्स की वजह से था.
आरुषि और हेमराज के जख़्म खुखरी जैसे दोधारी हथियार के हैं.
हेमराज के आरुषि के बेडरूम में मरने के कोई सुबूत नहीं हैं.
सीबीआई की  क्लोजर रिपोर्ट सॉफ कहती है कि आरुषि की बेडशीट और तकिए पर हेमराज का खून कतई नहीं मिला.
प्रॉसीक्यूशन की कहानी का सच्चाई से कोई वास्ता नहीं.

लोअर कोर्ट का ऑर्डर
आरोपियों के गुनाह के बिला शुभा मजबूत सुबूत हैं.
26 पॉइंट आरोपियों के खिलाफ गुनाह की थ्यौरी को सही ठहराते हैं.
किसी बाहरी के घर के अंदर आने का पता नहीं चलता.
इस हालत में लड़की को देख मां-बाप उससे लिपटे नहीं यह बहुत अस्वाभाविक बिहेवियर है.
कत्ल की वजह (मोटिव ऑफ कमीशन ऑफ क्राइम ) साबित होता है.
मां-बाप बच्चों की हमेशा हिफाजत करते हैं, लेकिन मानवता का इतिहास अनहोनियों से भी भरा पड़ा है.
आरुषि के मां-बाप ने बाइबल के “टेन कमेंडमेंट” के नियम – ‘दाउ शैल नॉट किल’ (यानी आप हत्या नहीं कर सकते) का उल्लंघन किया है.

आरुषि केस : कब क्या हुआ?

2008 

  • 16 मई  : 14 साल की आरुषि बेडरूम में मृत मिली
  • हत्या का शक घरेलू नौकर हेमराज पर गया
  • 17 मई : हेमराज का शव घर के टैरेस पर मिला
  • 23 मई : दोहरी हत्या के आरोप में डॉ राजेश तलवार गिरफ़्तार
  • 1 जून : सीबीआई ने जांच अपने हाथ में ली
  • 13 जून  :  डॉ तलवार का कंपाउंडर कृष्णा  गिरफ़्तार
  • बाद में राजकुमार और विजय मंडल भी गिरफ्तार
  • तीनों को दोहरे हत्या का आरोपी बनाया गया
  • 12 जुलाई : राजेश तलवार डासना जेल से ज़मानत पर रिहा
  • 10 सितंबर, 2009-
  • मामले की जांच के लिए नई सीबीआई टीम
  • 12 सितंबर : कृष्णा,राजकुमार और मंडल को ज़मानत,
  • सीबीआई 90 दिन में नहीं दे पाई चार्जशीट

29 दिसंबर, 2010

  • सबूतों के अभाव में सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट
  • रिपोर्ट में तलवार दंपत्ति आरोपी नहीं थे
  • परिस्थितिजन्य सबूतों से क़ातिल होने का इशारा

25 जनवरी, 2011

  • क्लोजर रिपोर्ट के ख़िलाफ राजेश तलवार का प्रोटेस्ट पिटीशन
  • कोर्ट ने भी क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार नहीं किया
  • लेकिन रिपोर्ट के आधार पर आरोप तय किए
  • तलवार दंपत्ति को सुप्रीम कोर्ट तक भी राहत नहीं

2012 

  • 11 जून :  सीबीआई की विशेष अदालत में सुनवाई शुरू

2013 

  • 10 अक्टूबर: आखिरी बहस शुरू
  • 25 नवंबर :  विशेष अदालत ने तलवार दंपत्ति को दोषी करार देते हुए उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई

2014 

  • जनवरी : निचली अदालत के फ़ैसले को  इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती

2017 

  • 8 सितंबर : इलाहाबाद हाइकोर्ट ने अपील पर फैसला सुरक्षित रखा
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