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रूसा के तहत क्षमता और व्यक्तित्व विकास पर डॉ.चंद्रकुमार जैन के व्याख्यान से युवा अभिभूत

राजनांदगांव। ख्यातिप्राप्त मोटिवेशनल स्पीकर, कलमकार, सामाजिक सचेतक और दिग्विजय कालेज के हिन्दी विभाग के प्रोफ़ेसर डॉ.चंद्रकुमार जैन ने राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान के तहत क्षमता विकास तथा व्यक्तित्व विकास पर दो प्रभावशाली व्याख्यान देकर युवाओं को अभिभूत कर दिया। छुईखदान और गण्डई के शासकीय कालेजों में ये अतिथि व्याख्यान आयोजित किये गए, जिनमें लगभग पाँच सौ छात्र-छात्राएं लाभान्वित हुए। डॉ. जैन को एक अरसे के इंतज़ार के बाद अपने बीच पाकर विद्यार्थी बहुत प्रफुल्लित नज़र आये। इसी कड़ी में दिग्विजय कालेज के प्रोफ़ेसर डॉ.एच.एस.भाटिया ने वाणिज्य विषय में करियर और स्वयं सेवी कार्यों पर महत्वपूर्ण जानकारी दी। प्राचार्य डॉ.गंधेश्वरी सिंह और डॉ. एन.एस.वर्मा के मागदर्शन में राष्ट्रीय युवा दिवस के परिप्रेक्ष्य में यह गरिमामय और यादगार आयोजन संपन्न हुआ। जनभागीदारी समिति और युवा मोर्चा के प्रमुख स्तम्भ नवनीत जैन खास तौर पर उपस्थित थे।

डॉ. जैन ने राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान के अन्तर्गत क्षमता विकास पर गण्डई कालेज में बोलते हुए कहा कि अपनी खासियतों की पहचान और कमजोरियों का ज्ञान आपको आगे बढ़ने का राजमार्ग दिखा सकता है। उन्होंने बड़ी प्रेरक शैली में समझाया कि जिस तरह धागों को जोड़ने से परिधान और ईंटों को जोड़ने से मकान बन जाता है, उसी तरह अपनी क्षमता के बिखतरे कणों को संजोकर एक आदमी अदद इंसान बन जाता है। उन्होंने कहा कि एहसास और सांस से नहीं, ज़िन्दगी कुछ कर गुजरने की प्यास से बनती और संवरती है।

डॉ.जैन ने व्यक्तित्व के बाहरी और भीतरी विशेषताओं की चर्चा करते हुए कहा कि दूसरों की नज़रों में ऊपर उठने की चाहत से भी बड़ी बात है कि आप अपनी ही दृष्टि में सम्मान के योग्य बनें। स्वयं को पसंद करना बहुत बड़ी शक्ति है। अपने मूल्य को जानना बड़ी नेमत है। अपने आप को तराशना सबसे बड़ी कला है। हर दिन कुछ नया सीखना और लगातार ईमानदार प्रयासों के दम पर स्वयं से ही आगे निकल जाने का नाम ही व्यक्तित्व निर्माण है। बाहर की प्रतिस्पर्धा तब आसान हो जाती है जब आप खुद अपने से लड़ने और जीतने के लिए तैयार हो जाते हैं।

दोनों कॉलेजों में प्रोफ़ेसर एच.एस.भाटिया और डॉ.चंद्रकुमार जैन का महाविद्यालय परिवार और जन भागीदारी समिति ने भावभीना सम्मान किया। उत्साही विद्यार्थियों में जिज्ञासा के साथ-साथ उनकी बातों पर अमल की ललक भी साफ़ दिख रही थी। सबने उनसे फिर आने की आशा की और उनका आभार माना।



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