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अभिव्यक्ति का दुरुपयोग

महोदय

यह कहना गलत नहीं होगा कि हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए “अभिव्यकि की स्वतंत्रता ” का भी दुरुपयोग किया जाता है।हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं का अनादर करना व उनसे घृणा करना अन्य धर्मावलंबियों का एक अटूट लक्ष्य है। इसमें अपवाद हो सकता है लेकिन आक्रान्ताओं के हमारे धर्म को भ्रष्ट करने के लिए हमारी भाषा व संस्कृति पर किये गये आघातों से इतिहास भरा पड़ा है । परतंत्रता काल में लाखों धर्म रक्षको ने इन अत्याचारों को रोकने व धर्म की रक्षा के लिए बलिदान किये थे।
आज हमारी संस्कृति की पहचान “गाय” को ही चर्चा का मुख्य बिंदू बना कर विवादों को भड़काया जा रहा है।लेकिन वर्तमान में इन धार्मिक ठेस पहुँचाने वाले कृत्यों को रोकने का कोई भी प्रयास वामपंथियों, मानवाधिकारियों व सेक्युलरिस्टों के कोप का भाजन बनता जा रहा है।देश के सेक्युलरवादियों व मानवाधिकारवादियों का भारत की पहचान मिटाने में विदेशी षड्यंत्रकारियों का भरपूर सहयोग रहा । जिसके ही परिणामस्वरुप आज देश में भारत भक्ति को साम्प्रदायिक बना दिया गया और आक्रान्ताओं के हितो को धर्मनिरपेक्षता का ओढ़ना उड़ा कर एक आत्मघाती प्रवृति को जन्म दे दिया गया। इन्ही सब परिस्थितियों के कारण देश में वैमनस्य व विंध्वसक वातावरण बनता जा रहा है।

आज भोजन व विचार परोसने की स्वतंत्रता में अगर एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान किया जायें तो घृणा की मशाल अपने आप ही बुझ जायेगी।क्या एक ओर बाहें पसारें खड़ा हुआ समाज सौहार्द की बात करें और दूसरा इस उदारता को कायरता मानलें तो कैसे कोई समाधान निकले ? क्यों कि जब तक कट्टरता से उपजा विशेष साम्प्रदायिक संगठित समूह अपनी अंदर की कालिख को नहीं धोएगा तब तक अन्य धर्मावलंबियों के विरुद्ध उसके अंदर गहरी पैठ बना चूका घृणा का भाव कैसे कम हो सकेंगा ? आज जिस जिहादी जनून ने साम्प्रदायिकता के जहर को समाज में घोल दिया है क्या उस विष को कभी कोई सहिंष्णु समाज अपने सद्भाव या सौहार्द से मिटा पायेगा ? लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है कि वे इसके लिए अपने अस्तित्व को ही संकट में डाले रहें।अतः आज विचारों की अभिव्यक्ति पर कुछ सीमा तक अंकुश लगा कर भाड़े के बुद्धिजीवियों को समाज में एकतरफा घोलने वाले जहर को फैलाने से रोकना होगा।
भवदीय
विनोद कुमार सर्वोदय
नया गंज, गाज़ियाबाद

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