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हिंदुत्व को नई धार देने वाले आचार्य धर्मेंन्द्र पंचतत्व में विलीन

भारत की संत परंपरा के ज्योतिर्मय नक्षत्र पूज्यपाद श्री धर्मेंद्रजी महाराज का अंतिम संस्कार आज विराटनगर में उनके पैतृक स्थान एवं पावनधाम आश्रम के प्रांगण में रामनाम धुन और जय श्री राम के जय घोष के बीच बड़े ही श्रद्धाभाव से संपन्न हुआ।

आज पूरा विराट नगर सुनसान पड़ा था, लोगो ने स्वयं स्फूर्त भाव से आचार्य श्री के सम्मान में अपने अपने प्रतिष्ठान बंद रखे थे, पूरा बाजार विगत दो दिनों से बंद था, विराट नगर के सभी नागरिक केवल महाराज के द्वारा किए गए कार्यों का स्मरण करके उनके प्रति श्रद्धा भाव से नमन कर रहे थे। विराट नगर के अनेक घरों में कल चूल्हा नहीं जला था, सभी आचार्यजी के अंतिम दर्शन के लिए उनके पैतृक निवास स्थान में पंक्तिबद्ध होकर अपनी आदरांजलि देने के लिए आतुर हो रहे थे।
दिनांक 20 सितंबर को प्रातः उनके पैतृक निवास स्थान से उनके पार्थिव शरीर को एक सजे सजाए रथ पर रखा गया, वहां केंद्रीय खेल राज्य मंत्री श्री राजवर्धन सिंह राठौड़ ने सबसे पहले अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की, बाद में स्थानीय संत समाज तथा अनेक सामाजिक तथा धार्मिक संस्थाओं के पदाधिकारियों ने अपनी श्रद्धांजलि दी।

स्वामीजी के पैतृक निवास स्थान से पावनधाम तक के चार किलोमीटर के मार्ग पर दोनो ओर भरी संख्या में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जमा थी, महाराज के पार्थिव शरीर पर जय श्री राम के साथ पुष्प वर्षा की जा रही थी। महाराज जी के भक्त कोलकाता, मुंबई, रायपुर, दिल्ली से बड़ी संख्या में पधारे, जिनमें गोवा के श्री दत्त पद्मनाभ पीठ तपोभूमि के सदगुरू ब्रह्मेशानंदाचार्य, कोलकाता से श्री मुकुंद राठी, श्री मसखराजी, मुंबई से श्री नरेश और श्रीमती पूनम बुधिया, रायपुर से लीलाधर सुल्तानिया ने प्रमुख रूप से उपस्थित होकर अपनी भाव भीनी पुष्पांजलि अर्पित की।

लगभग तीन घंटे की नगर परिक्रमा के बाद अंतिम यात्रा पावनधाम परिसर पहुंची, महाराजश्री के अंतिम संस्कार के स्थल के पास में ही महाराज की गौशाला है, जहां यात्रा जा पहुंची और जब उनके पार्थिव शरीर को चिता पर रखा जा रहा था, उस समय सभी की आखें नम थी, जय श्री राम, जय बजरंग के जय घोष के बीच स्वामीजी के दोनो सुपुत्र प्रणवेंद्र और सोमेंद्र ने मुखाग्नि दी, तो क्या देखते हैं कि गौशाला की सभी गायों की आंखों से अश्रु की धार बह रही है, यह महाराज का गौमाता के प्रति प्रेम और वात्सल्य का अभिनव उदाहरण था, जो प्रत्यक्ष दिख रहा था, चिता की अग्नि में महाराज का शरीर भस्म हो रहा था, लेकिन उन्होंने तो जीवन के बाल्यकाल से ही राष्ट्रयज्ञ की अग्नि में स्वयं को होम कर दिया था, एक विभूति के अवसान के सब साक्षी बन रहे थे, एक महामना अनंत में विलीन हो रहा था और अनंत आकाश से एक ही आह्वान का शब्द गूंज रहा था…
ॐ राष्टाय स्वाहा, इदम राष्ट्राय, इदम न मम…..

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