यज्ञशेष से शक्ति ओर शान्ति की प्राप्ति

हम जिन पदार्थों को भी पोषण के लिए अत्यधिक प्रयत्न करके प्राप्त करते हैं, वह सब प्रभु आदेश से ही पाते हैं। यह एक प्रकार से यज्ञशेष है जिसे हम शान्ति तथा शक्ति स्थापना के लिए ग्रहण करते हैं। इस बात की और यह मन्त्र इस प्रकार संकेत कर रहा है:-

देवस्य त्वा सवितु: प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्।
अग्नये जुष्टं गृह्णाम्यग्नीषोमाभ्यां जुष्टं गृह्णामि॥ यजुर्वेद १.१० ॥

१ सर्वज्ञ प्रभु दयालु भी हैं:
परम पिता पामात्मा जो सर्वज्ञ हैं, सब से ऊपर हैं तथा जो कुछ भी हम देखते हैं वह सब उस प्रभु के कारण ही सम्भव है। वह प्रभु दयालु भी हैं। हम सब पर दया करते हैं। उस प्रभु की दया के कारण ही हमें सूर्य व चांद से प्रकाश मिलता हमें शक्ति वर्धक व आनन्द देने वाले वनस्पतियां, फ़ल व फ़ूल मिलते हैं। उस प्रभु ने हम पर दया करते हुए हमें कर्म करने में स्वतन्त्र बनाया है किन्तु किये हुए कर्मों का फ़ल उस प्रभु ने हम पर दया करते हुए अपने पास रख लिया है ताकि हम किसी पर भी अत्याचार न करें, निरंकुश हो कर दूसरों को परेशान न करें।

२ प्रभु पूर्ण के सब कार्य भी पूर्ण:

प्रभु के इन गुणों के कारण इस में कुछ भी अपूर्णता नहीं है तथा न ही इस कारण कुछ भी दु:खद है। इस का स्पष्ट कारण है कि वह प्रभु पूर्ण है। पूर्ण प्रभु जो भी काम करता है, वह सब भी पूर्ण ही होते है।

३ प्रभु की कृति दू:ख कारक नहीं:

इतना ही नहीं प्रभु की बनाई कोई भी वस्तु दु:ख का कारण नहीं होती। पिता जो कुछ भी बनाता है, वह सब हमारी सुख सुविधाओं को बढाने के लिए होता है। इस कारण उस पिता की बनाई कोई भी वस्तु हमारे लिए दु:खकारी नहीं होती। यदि कुछ दु:ख कारक है भी तो उस का कारण हम स्वयं ही होते हैं। हम उस के प्रयोग में अथवा रख रखाव में कुछ भूल कर देते हैं।

४ जीव अल्पज्ञ:

दूसरे शब्दों में जीव अल्पज्ञ है और अपनी इस अल्पज्ञता के कारण अथवा व्यस्नों के आधीन हम वस्तुओं का ठीक से प्रयोग नहीं कर पाते। इस कारण अनेक बार यह वस्तुएं हमारे लिए दु:ख का कारण बनती हैं। इस कारण प्रभु-भक्त पांच प्रकार के निर्णयों के आधार पर यह निश्चय करता है कि:-

क ). मैं मध्य मार्गी बनूं:-
प्रभु कहते हैं कि हे जीव! मैंने संसार के प्रत्येक पदार्थ को, प्रत्येक वस्तु को तेरे ग्रहण करने के लिए पैदा किया है। प्रभु उत्पादक है किन्तु उसने जो कुछ भी पैदा किया है, वह प्रभु स्वयं उसमें से कुछ भी उपभोग नहीं करता। जो कुछ भी पैदा करता है वह हम जीवों के उपभोग के लिए ही पैदा करता है। परमपिता यह आदेश करते हैं कि हे जीव! मैंने जो कुछ भी बनाया है वह तेरे लिए ही बनाया है किन्तु इस के लिए यह आवश्यक है कि इन सब का प्रयोग करते हुए इस बात का ध्यान रहे कि इनका प्रयोग अत्यधिक न हो, अकारण इन का प्रयोग न करें या दूसरों की हानि के लिए न हो अर्थात् ठीक आवश्यकता के अनुसार हो। न तो अति हो तथा न ही अयोग, बस सब का प्रयोग यथायोग्य ही, संतुलित ही करना होगा। गीता ने भी पिता के इस आदेश पर ही अपने विचार दिये हैं कि हम युक्त आहार, विहार वाले रहते हुए सदा मध्य मार्ग पर ही चलें।

मानव जीवन के आधार दो साधन हैं। इन में से एक को प्राण कहते हैं तथा दूसरे को अपान कहते हैं। जब हम वायु को श्वास द्वारा अन्दर को लेते हैं तो यह प्राण है तथा जब इसे बाहर को छोडते हैं तो इस क्रम को अपान कहते हैं। मन्त्र कहता है कि प्राणापान द्वारा अर्थात् मेहनत के द्वारा, पुरुषार्थ के द्वारा अपने बाहुओं से यत्न पूर्वक प्राप्त पदार्थ को ही हम ग्रहण करते हैं। प्रभु इस के माध्यम से स्पष्ट आदेश दे रहे हैं कि हम प्रतिदिन, सदा अत्यधिक मेहनत करें तथा उस वस्तु का ही हम अपने लिए उपभोग करें, जो इस पुरुषार्थ के परिणाम स्वरुप हमें प्राप्त होती है। यह मन्त्र पुरुषार्थी जीवन पर ही बल देता है।

ग ) पौषण के लिए वस्तु ग्रहण करो: –
मन्त्र यहां कह रहा है कि हम किसी भी वस्तु को जीभ के स्वाद मात्र के लिए प्रयोग न करें। इस के साथ ही मन्त्र यह भी सन्देश, उपदेश व आदेश दे रहा है कि हम किसी भी वस्तु का अपने सौन्दर्य के लिए ही प्रयोग न करें। इस सब से अलग करते हुए यहां प्रभु आदेश दे रहे हैं कि हम जिस वस्तु का भी प्रयोग करें, उपभोग करें, उस का उपयोग अपने पौषण को बढाने के लिए होना चाहिये। इससे स्पष्ट होता है कि प्रभु न तो सौन्दर्य तथा न ही स्वाद को पसन्द करते हैं। इन सब से उतम पौषण , शक्ति ही होती है। इसलिए प्रभु हमें केवल उस वस्तु का ही प्रयोग करने को कहते हैं, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए उतम हो, जो हमारी जीवनीय शक्ति को बढाने वाली हो अथवा पौषक हो।

घ ) . यज्ञ शेष रुपी अमृत को प्राप्त करें:-

परमपिता परमात्मा मन्त्र के इस अन्तिम भाग में इस प्रकार उपदेश कर रहे हैं कि हे जीव! तेरे अन्दर जो शक्ति है, उसे मैं अग्नि के नाम से जानता हूं, वह अग्नि ही है। अग्नि से युक्त वस्तु ही हमारी शक्ति को बढाने वाली होती है। अग्नि गर्मी देती है। जब मानव शरीर से गर्मी समाप्त हो जाती है तो उसका जीवन समाप्ति को ही ग्रहण करता है| इसलिए कहा है कि हे प्रभु! हमारे अन्दर वह शक्ति दो, जो अग्नि को बढाने वाली हो।

ङ ). यज्ञशेष का ही सेवन करें:
अग्नि ही यज्ञ का रुप है। परोपकार का ही नाम यज्ञ है, दूसरों की सहायता का नाम ही यज्ञ है। इसलिए प्रभु कहते हैं कि अपनी प्रत्येक क्रिया को यज्ञ की भावना के अनुरुप बना कर ही करें। दूसरों के हित के लिए ही करें। इस प्रकार यज्ञ करने के पश्चात् जो कुछ शेष बचता है, उसे यज्ञ शेष कहते हैं। प्रभु उपदेश कर रहे हैं कि हम हम केवल यज्ञ शेष का ही सेवन करें। दूसरों को खिलाने के बाद ही हम कुछ खावें , ग्रहण करें।

५. यज्ञ शेष का सेवन करें:
प्रभु बताते हैं कि दूसरों को खिलाने के पश्चात् जो शेष बच जाता है, उसे ही यज्ञ शेष कहते हैं। हवन करने के पश्चात् जो बचता है, उस घी व सामग्री को ही यज्ञ शेष कहते हैं। इस प्रकार का आहार हमारी पुष्टि का कारण होता है क्योंकि यह ही यज्ञ शेष होता है। यह ही यज्ञ का प्रसाद होता है। इस कारण यह अमृत है ।

६. अग्नि व सोम के लिए सेवित वस्तु ग्रहण करें :-
प्रभु उपदेश करते हैं कि हम उस वस्तु को ही ग्रहण करें जो अग्नि से अर्थात् तेज से, पुरुषार्थ से सेवित हो या यूं कहें कि जो अग्नि तथा सोम के लिए सेवित हों। अग्नि तेज को कहते हैं तथा सोम शरीर की विभिन्न शक्तियों को कहते हैं। जो वस्तु इन को बढाने वाली हों, उनको ही ग्रहण करना उतम होता है। इस लिए पिता उपदेश करते हैं कि हम अग्नि और सोम को बढाने वाली वस्तुओं का ही सेवन करें, उपभोग करें।

मन्त्र बता रहा है कि हमारे जीवन के तत्वों में दो मुख्य तत्व हैं:-
(अ) अग्नि
(आ) सोम
आयुर्वेद हमारे सब भोज्य पदार्थों को अर्थात् हमारे भोजन को दो भागों में बांटता है
(य) आग्नेय
हमारे भोजन के जिस अंश को आग्नेय कहते हैं, यह हमें शक्ति देने वाला होता है।
(र) सौम्य
भोजन के जिस भाग को सॊम्य कहते हैं, यह भाग न केवल हमें शान्ति ही देता है बल्कि दीर्घायु अर्थात् लम्बी आयु भी देने वाला होता है।

स्पष्ट है कि लम्बी आयु उसको ही मिलती है जो शक्ति देने वाले अर्थात् आग्नेय पदार्थों से युक्त भोजन को करता है तथा शान्त रहता है। इसलिए प्रभु उपदेश करते हैं कि हे जीव! तूं एसा भोजन कर जिस में आग्नेय तथा सॊम्य, यह दोनों तत्व ही उपयुक्त मात्रा में विद्यमान हों। जब तूं एसा भोजन करेगा तो तेरा जीवन अनेक प्रकार के रसों से आनन्दों से भर जावेगा।

डॉ.अशोक आर्य
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