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अग्निहोत्र नवम् क्रिया

विगत अष्टम क्रिया के अंतर्गत दीपप्रज्वालनम् के अंतर्गत बताया गया था कि अग्निहोत्र को आरम्भ करने के लिए ब्राहमण के यहाँ से लाई हुई अग्नि से अग्निहोत्र को आरम्भ करें अथवा दीपक प्रज्वालनम् करने के पश्चात् इस दीपक को ब्राहमण की अग्नि मानाते हुए इससे ही अग्नि को जलाया जावे| यदि दीपक की भी व्यवस्था न हो पावे तो कपूर के प्रयोग से अग्नि आरम्भ की जावे| यदि कपूर की भी व्यवस्था नहीं है तो रुई की बत्ती बनाकर इसे घी में डुबोकर निचोड़ लें और फिर इसे किसी बारीक सी समिधा के ऊपर लपेट कर प्रज्वलित कर इससे ही अग्नि आरम्भ की जावे| कहीं यह अवस्था भी आ जाती है कि रुई की भी व्यवस्था नहीं हो पाती तो आप्तधर्म का प्रयोग करते हुए समिधा के अत्यंत महीन तिनके समान सींखचे सी खींच कर कुछ सींखचे एकत्र कर इनमें घी लगाकर ऊपर हल्की सी सामग्री भी लगाकर इन से ही यज्ञाग्नि का आरम्भ करें|

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अब आरम्भ होती है नवम् क्रिया| इस क्रिया के अंतर्गत यज्ञ कुण्ड की चारों दिशाओं में चार लोग बैठे हैं| इनमें से जिस का मुख सूर्याभिमुख है अर्थात् जो सूर्य की और मुख किये बैठा है, उस व्यक्ति को हम याज्ञमान कहते हैं|( यहाँ एक बात समझ लेने की है कि ऋषि ने यज्ञकुंड की चार दिशाओं में एक एक व्यक्ति के बैठने की व्यवस्था दी है| इन चारों के यज्ञ के समय नामकरण भी किये गए हैं| इससे स्पष्ट होता है कि यह चार लोग आस पास बैठे अन्य लोगों का प्रतिनिधित्व इस प्रकार कर रहे हैं, जिस प्रकार विधान सभा में हमारा चुना हुआ प्रतिनिधि हमारा प्रतिनिधित्व करता है| जब भी विधान सभा में कोई भी विधेयक पारित करना होता है तो उस पर बहस तथा मतदान का कार्य कोई भी मतदाता नहीं करता, केवल विधायक ही उन सबके प्रतिनिधि स्वरूप सब कार्य करता है|

ठीक इस प्रकार ही यह यज्ञ कुंड की चारों दिशाओं में बैठे चारों लोग भी अन्य सब का प्रतिनिधित्व करते हैं| जो भी घी सामग्री आदि की आहुति वह दे रहे होते हैं , वह सब उपस्थित लोगों की और से ही दे रहे होते हैं| इसलिए अन्य किसी को इस समय आहुति नहीं डालनी होती|(यहाँ एक बात बतानी आवश्यक है कि आज कल यज्ञकुंड के एक दिशा में ही तीन तीन लोग बैठने लग गए हैं, इस प्रकार चार दिशाओं में दस बारह व्यक्ति बैठ जाते हैं, ऋषि के आदेश का यह उल्लंघन है| यह ठीक नहीं है| आज इस से भी आगे की अवस्था मैंने कुछ समाजों में देखी है कि कुछ लोग जो यज्ञ कुंड के पास स्थान प्राप्त नहीं कर पाते वह दूर बैठकर ही स्वाहा पर एक आहुति की सामाग्री एक अलग बर्तन में एकत्र करने लगते हैं और यज्ञ के अंत में वह सारी सामग्री यज्ञ कुण्ड में डाल देते हैं| यह भी ऋषि आदेश की अवहेलना है| मैंने एक समाज में इसे रोकने का प्रयास किया किन्तु उस समाज के प्रधान नहीं माने तो मुझे बाधित हो कर उस समाज में जाना ही छोड़ना पडा|) अत: हम केवल चार व्यक्तियों को ही यज्ञकुंड के चारों दिशाओं में क्रमश: एक एक कर बैठावें और फिर ऋषि की बताई विधि का पालन करते हुए यज्ञ करें|

अब हम इस क्रिया को आरम्भ करते हुए अग्न्याधानम् का कार्य आरम्भ करने के लिए पूर्वाभिमुख बैठे यज्ञमान को उसके दायें हाथ में एक छोटी सी कड़छी या कुछ अच्छे आकार का चम्मच देते हैं, जिसे सुवा बोला जाता है| इसमें कपूर की दो तीन टिकियां रख देते हैं| यज्ञमान इस कपूर की टिकिया को दीपक की लपट से जलाते हुए यह मन्त्र गायन करते हैं:-
ओं भूर्भुव: स्वर्द्यौरिव भूम्ना पृथिवीव वरिम्णा | तस्यास्ते
पृथिवि देवयजनि पृष्ठेऽग्निमन्नाद्यायादाधे ||२||
यहाँ मन्त्र समाप्त होने पर दो लिखा गया है| इसका भाव यह है कि एक मंत्र हम इससे पहले बोल चुके हैं जो दीपक जलाते समय बोला गया था| इस कारण अग्निहोत्र का यह दूसरा मन्त्र है| यह मन्त्र समाप्त होने पर हमने कड़छी में जो कपूर की टिकिया को जलाया था, उसे हम हवनकुंड में छोड़ देते हैं ताकि कुण्ड में अग्नि अन्य समिधाओं को, जो हम ने पहले से चिन रखी हैं, पकड़ कर यज्ञाग्नि आरंभ कर देवें|

यह जलते हुए कपूर की टिकियों को यज्ञकुण्ड में डालते समय जो मन्त्र हमने गाया है, इस का अभिप्राय: या भावार्थ इस प्रकार है :-
पृथिवि देव यजनि
जिस पृथिवी पर देवता लोग नित्य यज्ञ करते हैं अथवा जिस पृथिवी पर देवगणों की नित्य पूजा होती है|

यहाँ इस बात को समझ लेना चाहिए कि देवता उसे कहते हैं, जो किसी दूसरे को कुछ देने वाला हो| परमात्मा सब से बड़ा देवता है, जो केवल देता ही देता है, लेता कुछ भी नहीं है| इसलिए नित्य प्रति देवता स्वरूप परमात्मा की हम लोग पूजा करते हैं| उसकी निकटता प्राप्त करने का प्रयास करते हैं और उसके आशीर्वाद लेने का यत्न हम नित्य करते हैं| इस प्रकार ही यज्ञ, जो सब और के पर्यावरण को शुद्ध करने का कार्य करता है, इस यज्ञ को करने वाले यज्ञमान भी तो कुछ न कुछ संसार को दे ही रहे हैं| इसलिए हम उसका भी स्मरण करते हैं|

तस्य ते अन्नाद्याय आ दधे
उस पृथिवी की पीठ पर अर्थात् पृथिवी पर यज्ञकुंड को रखकर हम अग्निहोत्र कर रहे हैं| यह पृथिवी की पीठ ही है, जिस पर किसान हल चला कर भारी मात्रा में अनाज पैदा करता है और फिर इस अनाज को विश्व के लोगों में बाँट देता है ताकि सब लोग अपना भरण पौशण कर सकें| इस प्रकार ही हम लोग भी यज्ञ करते समय इसके कुंड को भी धरती की ही पीठ पर आसीन करते हैं| कितनी दानशील और सहनशील है यह धरती! हम भी धरती के इस गुण को धारण करने का संकल्प लेते हुए यज्ञाग्नि को प्रज्वलित करते हैं| इस भाव को ही लेते हुए हम अग्नि की समिधा पर अग्नि को रखते हैं|

भू: भुव: स्व:
यज्ञाग्नि में अग्नि रखते हुए मेरी यह कामना है कि मैं भी भूलोक, अन्तरिक्ष लोक तथा स्वर्गलोक अर्थात यह जो तीन लोक माने गए हैं, इन तीनों लोकों के रस के समान रूप वाले गुणों को ग्रहण कर सकूँ| तीन लोकों में जितने प्रकार के रस आदि पदार्थ हैं यज्ञामान उन सब को पाने की कामना करता है|
द्यौ: वरिम्ना पृथिवि इव

नक्षत्रादि की अत्यंत महान् महिमा होती है और इस महिमा से ही यह महान् द्युलोक है, इस के ही समान अत्यंत विस्तार में, जिस प्रकार पृथिवी अनेक पदार्थ के अन्न, फल, फूल, मेवे व अन्य पदार्थों का दान प्राणी मात्र के लिए किया करती है,यज्ञमान उस प्रकार का स्वयं को भी दानी बनाने की अभिलाषा अपने मन में संजोये हुए है| उस की भी यज्ञाग्नि प्रज्वलित करते समय यह कामाना है कि वह भी विश्व के अनेक प्राणियों का आश्रय बनने में , उनकी सहायता करते हुखए, उनकी भी आवश्यकताओं को पूर्ण करने का वह कारण बने|

इस प्रकार हमरे अग्निहोत्र का यज्ञमान इस मन्त्र को बोलते हुए ऊपर दी गई कामनाओं का विचार करते हुए विश्व कल्याण के लिए यह यज्ञ आरम्भ करने के लिए यज्ञ कुण्ड में अग्नि आरम्भ कर रहा है| कपूर को यज्ञमान ने यज्ञ कुण्ड में डाल तो दिया किन्तु यह अग्नि एकदम से लकड़ी स्वरूप समिधाओं को नहीं पकड़ पाती| इसलिए आगामी क्रिया को आरम्भ करते हुए एक और मन्त्र बोलते हुए इस अग्नि को प्रदीप्त होने के लिए कुछ समय देता है तथा इसके साथ ही कुछ और संकल्प भी लेता है| :-
ओम् उद्बुध्यस्वाग्ने प्रतिजागृहि त्वमिष्टापुर्त्ते सँ सृजेथामयं
च अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यज्जमानश्च सीदत्||यजु.१५.५४||
यह मन्त्र यजुर्वेद के अध्याय १५ का मन्त्र संख्या ५४ है| इस मन्त्र द्वारा अग्नि को तीव्रता से जलने के लिए, ऊपर उठने के लिए उपदेश करते हुए इस प्रकार कहा गया है कि :-
अग्ने उद्बुध्यस्व
हे अग्नि! इस हवन को, इस अग्निहोत्र को गति देने के लिए आपका तीव्र होना आवश्यक है| इस लिए हे अग्नि! आप शीघ्रता से ऊपर की और उठो| इसके लिए यह जो कपूर की टिकियाँ कुण्ड में डाली गई हैं, इनमें जल रही अग्नि को समिधा की सहायता से पकड़ कर शीघ्रता से ऊपर की और उठो| अग्नि के ऊपर उठने का अभिप्राय: यह ही होता है कि उसके जलने की गति तीव्र हो|

इष्ट पूर्ते सं सृजेथां
जब भी कभी कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार का यज्ञ करता है तो उस यज्ञ को करने का उसका कुछ उद्देश्य होता है| वह अपने मन में कुछ इच्छाएं, कुछ कामनाएं संजोये हुए होता है| इस मन्त्र के इस भाग में परमपिटता परमात्मा से यह प्रार्थना है कि जो इष्ट और पूर्त्त को मिलकर सम्पादन करें| अर्थात् हम सब मिलकर अपनी इष्ट की पूर्ति करें|

अस्मिन् सध-स्थे अधि विश्वे देवा: च सीदत
इस मंत्रांश में उपदेश करते हुए परमपिता परमात्मा कह रहे हैं कि बैठने के इस अति उत्तम स्थान पर विश्व के सब के सब देवता और यज्ञमान लोग आकर विराजें| इससे एक बात तो स्पष्ट होती है कि जहाँ पर यज्ञ हो रहा है, उस स्थान को सर्वोत्तम माना गया है| जो स्थान सर्वोत्तम है, वहाँ पर ही देवता लोग निवास कर सकते हैं| जो स्थान देवताओं के निवास के लिए सर्वोत्तम है, यज्ञ का हमारा यह यज्ञमान उस पवित्र स्थान को ग्रहण करे|

जब हम भौतिक रूप में इस मन्त्र का अर्थ करते हैं तो हम, कह सकते हैं कि यज्ञ करने के लिए आसन लगाकर बैठना और फिर यज्ञकुण्ड में यज्ञाग्नि को आरम्भ करना मात्र ही है किन्तु वेद के मन्त्रों का कभी भी एक अर्थ नहीं होता प्रसंग के अनुसार इनके अर्थ बदलते रहते है| इसलिए जब हम इस मन्त्र का आध्यात्मिक रूप में अर्थ करते है तो इसका अर्थ कुछ इस प्रकार बनता है:-

यहाँ परमपिता परमात्मा उपदेश करते हुए कह रहे हैं कि हे यज्ञमान! तु अविद्या रूपी अँधेरे से निकलकर अपने अन्दर ज्ञान की अग्नि को जला| दूसरे शब्दों में हे साधक! अज्ञान की निद्रा को त्याग दो और ज्ञान के प्रकाश में विचरण करो अर्थात् उत्तम ज्ञान को प्राप्त कर| केवल भौतिक अग्नि को ही नहीं जलाओ अपितु इस भौतिक अग्नि के साथ अपने स्वयं के आत्मिक अनुभवों को भी मिलाओ और इस प्रकार अपने इष्ट की पूर्ति का, जिस इच्छा को ले कर यह यज्ञ आरम्भ करने जा रहे हो उस इच्छा की पूर्ति का भी यत्न करो| यदि तुम इस प्रकार से पुरुशार्थ करोगे तो यह निश्चित है कि इस प्रकार के यत्न जब तुम निरंतर करते रहोगे तो सबसे उत्तम, जिसे सर्वोत्कर्ष कहते हैं, अर्थात् जो सर्वोत्तम जगत् है, उस प्रकाशमान लोक में तुम उत्तम से उत्तम देवताओं के साथ सहवास करोगे अर्थात् बड़े से बड़े देवता भी तुम्हारे साथ होंगे| इसलिए हे साधक! तुम यज्ञ के देवताओं के द्वारा अथवा उनके सहयोग से प्रतिदिन नियम पूर्वक यज्ञ अथवा अग्निहोत्र करो|

इस प्रकार हवनकुण्ड में आग रखते समय जब हम इस प्रकार की उच्च भावनाओं को अपने इष्ट रूप में अपने साथ रखते हैं तो निश्चय ही हमें देवगणों का साथ और उनका आशीर्वाद मिलता है और इस आशीर्वाद से हमारे वह सब उत्तम संकल्प पूर्ण होते हैं, जो हमने यज्ञाग्नि प्रज्वलित करने से पूर्व अपने मन में संजो रखे होते हैं| इसलिए हमें प्रतिदिन समर्पित भाव से यज्ञा अथवा अग्निहोत्र अवश्य ही करना चाहिए|

डॉ. अशोक आर्य
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