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आगरा विश्वविद्यालय में सेमीनार

आगरा। डॉ. भीमराव अम्बेडकर यूनिवर्सिटी आगरा के स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज के बायोटेक्नोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी और बायोकेमिस्ट्री विभागों ने सामूहिक रूप से ‘‘मिटिगेशन ऑफ टॉक्सिक इफेक्ट ऑफ जीनोबायोटिक्स बाय फायटोकेमिकल्स ’’ विषय पर सेमीनार का आयोजन कराया। जिसमें मुख्य अथिति के रूप में डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के बायोकेमिस्ट्री विभाग के विभागाध्यक्ष एवं बायोटेक्नोलॉजी प्रोग्राम के समन्वयक प्रोफेसर राम लखन सिंह ने व्याख्यान दिया। कार्यक्रम का शुभारम्भ प्रोफेसर पी.एन. सक्सेना सहित मुख्य अथिति प्रोफेसर राम लखन सिंह ने सरस्वती मां की तस्वीर के सामने दीप प्रज्वलित कर किया।

मुख्य अतिथि प्रोफेसर राम लखन सिंह ने व्याख्यान देते हुये फाइटोकेमिकल्स द्वारा जीनोबायोटिक्स के जहरीले प्रभाव के न्यूनीकरण विषय पर कहा कि फाइटोकेमिकल्स पौधों द्वारा उत्पादित रासायनिक यौगिक होते हैं जिनके पास पौधों को अपने प्रतिभागियों और परजीवियों से सुरक्षा प्रदान करने सहित रोग निवारक गुण होता है। कुछ फाइटोकेमिकल्स को विष और पारंपरिक दवा के रूप में भी प्रयोग लाया जाता है। फाइटोकेमिकल्स व फाइन्यूट्रिएंटस जैसे खास पदार्थ हैं, जो पौधों के फलों को रंग देते हैं और यही रंग सेहत के लिए उपयोगी साबित होेते हैं। तभी कहा जाता है कि अच्छी सेहत के लिए साग-सब्जियां खाना जरूरी है। बेरी में एंटीऑक्सीडेंट और फाइटोकेमिकल्स पाया जाता है जो शरीर में कैंसर कोशिका और ऑक्सीडेशन को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

प्याज में मौजूद फाइटोकेमिकल्स शरीर में विटामिन सी के असर को बढ़ाते हैं यानी इस केमिकल कि वजह से विटामिन सी शरीर में अच्छे तरीके से प्रमोट होता है और इससे शरीर कि रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। अगर प्याज को सलाद के रूप में प्रयोग किया जाता है तो सर्दी और फ्लू की सम्भावना भी कम होती है। लेकिन आज जीनोबायोटिक जैसे बाहरी रासायनिक पदार्थ जो की खाने की चाीजों मे भी प्रयोग में लाये जा रहे है, जो कि मानव शरीर पर अपने खतरनाक और जहरीले प्रभाव छोड़ते हैं। जीनोबायोटिक प्राकृतिक वातावरण में प्रदूषण के रूप में पाया जाता है। आजकल कुछ एंटीबायोटिक्स में भी इसकी अत्यधिक मात्रा होती है। जो कि शरीर के लिए खतरनाक होते हैं। इसके लिए आज जरूरत है कि पौधों द्वारा उत्पादित फायटोकेमिकल्स के द्वारा जीनोबायोटिक जैसे प्रदूषक तत्वों के न्यूनीकरण के लिए अनुसंधान होना चाहिए। जीनोबायोटिक जैसे प्रदूषक तत्वों का असर तभी कम हो सकता है जब लोग आज के समय में अपने खाने कि चीजों में हरी सब्जियों सहित सभी तरह की सब्जियां और फल शामिल करें क्योंकि फाइटोकेमिकल्स पौधों द्वारा उत्पादित रायायनिक यौगिक है।

प्रोफेसर अल्का अग्रवाल ने भी बायोएक्टिव कीटनाशक के प्रभावों को समझने की आवश्यकता को महत्वपूर्ण बताया। प्रोफेसर पी.एन. सक्सेना और प्रोफेसर राजेंद्र शर्मा ने भी अपने वयाख्यान प्रस्तुत किये। कार्यक्रम के समापन में माइक्रोबायोलॉजी विभाग की विभागाध्यक्षा डॉ. सुरभि महाजन ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. मोनिका अस्थाना ने किया।

कार्यक्रम में प्रमुख रूप से प्रोफेसर राजेंद्र शर्मा, डीन, प्रोफेसर आशा अग्रवाल, डॉ. बी.एस. शर्मा, डॉ उदिता तिवारी, डॉ. आर.के. अग्निहोत्री, डॉ, जागृति शर्मा, डॉ. दर्शिका निगम, डॉ. अवनीश कुमार, डॉ. अंकुर गुप्ता सहित स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज के सभी विभागों के छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।



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