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एड्स पर नियंत्रण एक बड़ी चुनौती

एड्स एक ऐसी जानलेवा एवं विषाणु जनित रोग है ,जो मानव के प्रतिरक्षा तंत्र को क्षरण कर देती है। यह बीमारी मानव प्रतिरक्षा विषाणु(HIV) के द्वारा होता है। एचआईवी संक्रमण के पश्चात मानव शरीर की प्रतिरोधक क्षमता घटने लगती है ;जिससे मानव शरीर ‘ बीमारियों का घर’ हो जाता है ।एचआईवी संक्रमण के बाद शरीर में एड्स के लक्षण दिखाई देने लगते हैं, एचआईवी संक्रमण के 10 वर्षों पश्चात एड्स के दुष्प्रभाव दिखाई देते हैं ।एड्स को “अवसरवादी बीमारी” भी कहा जाता है ;क्योंकि यह अवसर पाकर कमजोर प्रतिरक्षा तंत्र पर प्रहार करते हैं ,जिससे मानव शरीर पूर्णतः रूग्ण हो जाता है। एचआईवी संक्रमण मानव के शरीर को इस स्तर तक कमजोर कर देते हैं कि वह प्रतिरक्षा बीमारियों से लड़ने में अक्षम हो जाता है और मानव गंभीर त्रासदी का शिकार हो जाता है ।यह बीमारी संक्रमित रक्त से दूषित सुई या चिकित्सक उपकरणों से फैलता है ।संक्रमण संक्रमित योनि स्राव ,वीर्य और खुले घावों के संपर्क में आने से भी यह बीमारी फैलता है ।संक्रमित महिला के शिशु को स्तनपान कराने से भी यह फैलता है, बिना परहेज लिए किसी के साथ शारीरिक संपर्क स्थापित करने से भी फैलता है।

वैश्विक स्तर पर 3.53 करोड लोग एचआईवी से संक्रमित है ।भारत पूरे वैश्विक परिदृश्य में एड्स से प्रभावित तीसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है ।भारत में 2300000 (23लाख)लोग एचआईवी से संक्रमित हैं ,भारत में प्रत्येक साल 87000 एचआईवी संक्रमित मामले दर्ज किए जाते हैं ,साथ ही देश में एड्स के कारण 69000 लोगों की मृत्यु होती है. एचआईवी से प्रभावित कुल मरीजों में तकरीबन 8.79 लाख महिलाएं हैं

एड्स के रोकथाम के लिए भारत सरकार ने राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम(NACP) की स्थापना की है ,जो अब स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत एड्स विभाग बन गया है ।वैश्विक स्तर UNAIDS एचआईवी (HIV)संक्रमण को रोकने, प्रसार को कम करने में कार्य कर रहा है ।UNAIDS यह सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रहा है कि वर्ष 2030 तक लगभग 30 मिलियन लोगों को इलाज की सुविधा प्राप्त हो सके। वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र(UN )के सदस्य देशों द्वारा अपनाए गए सतत विकास लक्ष्यों(SDGs)में भी वर्ष 2030 तक एड्स, तपेदिक और मलेरिया महामारी को समाप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया हैं।

सितंबर ,2018 से रोकथाम एवं नियंत्रण अधिनियम ,2017 लागू है, इस अधिनियम की उपादेयता यह है कि यह एचआईवी/ एड्स को रोकने और नियंत्रित करने में सहयोग करता है; इसके साथ ही यह एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों और एड्स मरीजों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को समाप्त करने का कार्य कर रहा है। इस अधिनियम में ऐसे व्यक्तियों के उपचार /इलाज के संबंध में गोपनीयता प्रदान करने का भी प्रावधान करता है, इसमें एचआईवी और एड्स से संबंधित शिकायतों के निवारण तंत्र का भी प्रावधान है । एड्स खिलाफ वैश्विक लड़ाई में काफी अच्छी सफलता प्राप्त हुई है। आंकड़ों के आधार पर 2018 के अंत तक एचआईवी से संक्रमित सभी व्यक्तियों में से 79 % को ही इस तथ्य के बारे में पता था, 62 % संक्रमित लोगों तक ही उपचार सेवाएं पहुंच पाई थी और केवल 53 %संक्रमित लोगों के वायरस के दबाव को कम किया जा सका था ।आंकड़ों के आधार पर विश्व में केवल 19 देश ऐसे हैं जो वर्ष 2030 तक एड्स, तपेदिक और मलेरिया के पूर्णतः उन्मूलन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। भारत में आज भी एचआईवी/ एड्स संक्रमित व्यक्तियों के साथ भेदभाव होता है।

एचआईवी/ एड्स से जुड़ी बीमार मानसिकता को बदलना भारतीय समाज एवं व्यवस्था के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है। मजबूत इच्छा शक्ति, चातुर्य नेतृत्व एवं राजनैतिक संकल्पना से ही इस बीमार मानसिकता को दूर किया जा सकता है । संक्रमण के रोकथाम और नियंत्रण के साथ एचआईवी/ एड्स पीड़ित को मानसिक मजबूती और अभिप्रेरित करना भी आवश्यक है, जिससे वह समाज में अपना सामाजिक संतुलन स्थापित कर सकें और गरिमामय जीवन जी सकें।

(डॉक्टर सुधाकर कुमार मिश्रा राजनीतिक विश्लेषक एवं सहायक आचार्य है।)

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