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अजमेर महीषि महारानी सती उर्मिला

ग्यारह्वीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में इस देश पर एक विदेशी ने आक्रमण किया । इस का नाम था महमूद गजनवी । इस आतताई ने देश में सर्वत्र लूट पाट मचा दी । देव मन्दिरों को लूटा , उनकी पवित्रता भंग की तथा उन्हें तोडा । उस के आक्रमण का सब से बदा शिकार हुआ सोमनाथ का मन्दिर । इस मन्दिर में अपार धन – सम्पदा भरी थी । कहने वाले बताते हैं कि इस मन्दिर की अपार धन – सम्पदा को ऊंटों तथा घोडों पर लाद कर कई महीने तक गजनी ले जाया जाता रहा किन्तु खजाना था कि जो समाप्त होने का नाम ही न ले रहा था ।

यह मन्दिर पर देश भर में सर्वत्र श्रद्धा – भाव से देखा जाता था । देश के विभिन्न भागों से आ कर लोग यहां प्रभु वन्दना करते थे । इस कारण पूरे देश के राजाओं ने इस मन्दिर की रक्षा को अपना कर्तव्य मान रखा था । मुहम्मद गजनवी के आक्रमण की सूचना जिस राजा को भी मिली , वह सेना लेकर इस की रक्षा के लिए दौड पडा । एसे ही राजाओं में अजमेर के राजा धर्म्गज देव भी एक थे । देश के राजाओं में इस मन्दिर की रक्षा के लिए समर्पण यह ही सिद्ध करता था कि भारतीय लोग इन मलेच्छों को भारत भू पर कभी भी नहीं टिकने देंगे ।

सोमनाथ का यह मन्दिर देश का मस्तक बना हुआ था किन्तु अन्त में यहां पर हिन्दू पराजित हुआ तथा राजा जयपाल की रानीयों को सतीत्व की रक्षा के लिए आत्म – दाह करना पडा ।

अजमेर के राजा धर्मदेव अपने समय के सुप्रसिद्ध ,न्यायकारी , दयालु व वीर योद्धा के रुप में देश में ही नहीं विदेश में भी सुप्रसिद्ध हो चुके थे । सब लोग उसकी तलवार का लोहा मानते थे । इतना ही नहीं इस राजा की राजमहिषी रानी उर्मिला में भी अटूट देश भक्ति , पतिव्रता तथा सतीत्व की सजीव मूर्ति के रुप में पहचान थी । धर्म व देश की रक्षा के लिए वह भी अपने प्राणों का उत्सर्ग करने में किसी से कम न थी । जहां वह अत्यन्त सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति थी , शीलवती थी, वहां राज्य व्यवस्था में भी अद्वितीय थी । वह सदा राज्य व्यवस्था में राजा धर्मग्जदेव की सहायता किया करती थी ।

सोमनाथ विजय के पश्चात् महमूद गजनवी की आंख में वह सब राजा किरकिरी की भान्ति चुभ रहे थे , जिन्होंने सोमनाथ पर उसके आक्रमण के समय सोमनाथ की रक्षाक्शा का यत्न किया था । वह एक – एक कर इन सब को समाप्त करना चाहता था । इस आश्य से ही उसने अजमेर पर आक्रमण कर दिया ।

इस आक्रमण की सूचना पा कर राजा ने भी इसका प्रतिकार करने का निर्णय लिया तथा सेनाओं को तैयारी का आदेश दे दिया । युद्ध की अवस्था देख वीर रानी उर्मिला ने भी देश रक्षार्थ इस युद्ध में भाग लेने की अनुमती महाराजा धर्म्गज देव से मांगी । रानी की प्रार्थना को सुनकर राजा गद्गद हो उठे तथा बोले कि जिस देश की वीरांगानाएं इस प्रकार बलिदान का मार्ग पकड लेती हैं , उस देश की प्राज्य तो कभी हो ही नहीं सकती । मुझे अपनी रानी को युद्ध भूमि में साथ ले जाने में बडी खुशी होती किन्तु यदि रानी ओर राजा दोनों ही युद्ध क्षेत्र में उतर गये तो पीछे राज व्यवस्था चरमरा जावेगी । इसलिए हे रानी ! तुम अजमेर में ही रहते हुए अजमेर की व्यवस्था देखो ओर मैं मलेच्छ आक्रमणकारी से निपट कर आता हूं | यह सुनकर रानी ने अजमेर की आन्तरिक व्यवस्था तथा रक्षा का कार्य अपने कन्धों पर ले लिया ओर राजा धर्मग्जदेव युद्ध के लिए प्रस्थान कर गये ।

रण भेरी बज उठी , दोनों सेनाएं एक दूसरे पर टूट पडीं । सब दिशाएं नरमुण्डों से भर गयी । लहू से मिट्टी लाल हो गई । सब ओर केसरिया बाना पहिने रणबांकुरों की तलवार शत्रु को गाजर मूली की तरह काट रही थी । म्लेच्छ सेना के छ्क्के छूट रहे थे , वह रणभूमि से भाग जाना चाहते थे किन्तु इस समय नियति को कुछ ओर ही स्वीकार था । अकस्मात् एक शत्रु सैनिक का तीर आ कर राजा धर्म्गज देव के सीने में लगा तथा इस तीर के वार ने अजमेर के राजा की जीवन लीला को समाप्त कर दिया । राजा की मृत्यु का समाचार पाते ही सेना में हाहाकार मच गया ।

डॉ. अशोक आर्य
चलभाष ९३५४८४५४२६
E mail [email protected]

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