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मोबाईल पत्रकारिता से नए रास्ते खुलेंगेः अखिलेश शर्मा

मोबाइल जर्नलिज्म यानी मोजो डिजिटल पत्रकारिता में सफलता की नई सीढ़ियां चढ़ने का माध्यम है। तकनीक ने पत्रकारिता को नए मुकाम पर पहुंचा दिया है। खबरों की रफ्तार तेज होने के साथ ही यह सुगम, सरल और सस्ते ढंग से पाठकों और दर्शकों तक मोजो के माध्यम से पहुंच रही हैं।’ एक कार्यक्रम के दौरान यह बातें एनडीटीवी इंडिया के पॉलिटिकल एडिटर अखिलेश शर्मा ने कहीं।

वे श्रीवैष्णव विद्यापीठ विश्वविद्यालय इंदौर के पत्रकारिता तथा जनसंचार विभाग द्वारा आयोजित प्रवाह 2018 मीडिया कॉन्क्लेव को संबोधित कर रहे थे। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के छात्रों को अभी से मोजो के बारे में विस्तार से बताए जाने की जरूरत है ताकि भविष्य में वे इसके माध्यम से अपने पैरों पर खड़े होने के रास्ते आसानी से तलाश सकें।

अखिलेश शर्मा ने पत्रकारिता के छात्रों के सामने एक विस्तृत और प्रभावी पॉवर पॉइंट प्रजेंटेशन के माध्यम से मोबाइल पत्रकारिता की बारीकियों को रखा। उन्होंने मोजो के तकनीकी, संपादकीय और नैतिक व कानूनी पक्षों के बारे में विस्तार से बताया। शर्मा ने बताया कि किस तरह से टेलिविजन न्यूज के मौजूदा तौर-तरीकों के मुकाबले मोबाइल जर्नलिज्म के साधन सस्ते और अधिक उपयोगी होते हैं।

अगर टेलिविजन न्यूज की किट 12-15 किलोग्राम की है तो वहीं मोजो किट 2-3 किलो की होती है। लागत भी टीवी किट के मुकाबले बेहद कम है। इसका सबसे बड़ा फायदा ब्रेकिंग न्यूज की परिस्थितियों में है। जहां पर सीधे प्रसारण के लिए कैमरे और ओबी वैन ले जाने में दिक्कत होती है वहां मोजो किट आसानी से सबसे पहली तस्वीरें दर्शकों के पास पहुंचा सकती हैं। संवाददाता फील्ड से ही न सिर्फ तस्वीरें बल्कि अपनी स्टोरी एडिट कर न्यूजरूम भेज सकता है। न्यूजरूम भी अब बदल रहे हैं और अब पारंपरिक न्यूजरूम की जगह मल्टीमीडिया न्यूजरूम आ गए हैं।

मोबाइल जर्नलिज्म की अपनी कुछ सीमाएं भी हैं। जिन इलाकों में इंटरनेट स्पीड धीमी है वहां से खबरें भेजने में परेशानी आ सकती है। इसके अपने नैतिक तथा कानूनी पक्ष भी हैं। खबरें करते वक्त दूसरों की निजता का सम्मान करना बेहद जरूरी है। बिना किसी को जानकारी दिए बातचीत रिकॉर्ड करना नैतिकता के दायरे में नहीं आता। इसी तरह जहां टीवी कैमरों को जाने की इजाजत नहीं है, वहां स्मार्ट फोन से शूट करना पत्रकारिता की मर्यादा से बाहर है।

अखिलेश शर्मा ने कहा कि भारत में स्मार्ट फोन की संख्या तेजी से बढ़ रही है। जल्दी ही पचास करोड़ लोगों के हाथों में स्मार्ट फोन होंगे जो कि फीचर फोन के बराबर पहुंचने की संभावना है। इंटरनेट की तकनीक ने स्पीड़ बढ़ाई है और फाइव जी आने के बाद रियल टाइम में 4के क्वॉलिटी की तस्वीरों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया जा सकेगा। ऐसी ऐप्लीकेशन पर लगातार काम चल रहा है जो मोबाइल जर्नलिज्म के लिए बेहद मददगार होंगी। उन्होंने छात्रों के सामने कई ऐप के बारे में भी विस्तार से बताया जो मोजो के लिए आवश्यक हैं। मोजो के लिए बुनियादी किट, उसकी खासियत और उसे इस्तेमाल करने के तरीकों के बारे में भी उन्होंने छात्रों को बताया।

सिटीजन जर्नलिज्म के इस दौर में जहां स्मार्ट फोन हाथ में लिए हर व्यक्ति खबर भेजने की क्षमता रखता है, मोजो का महत्व हर दिन बढ़ता जा रहा है। अरब क्रांति में इसने बड़ी भूमिका निभाई है और न्यू मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर अब सूचनाएं पहले की तुलना में अधिक रफ्तार से आ रही हैं। लेकिन मोजो के लिए जरूरी है कि पत्रकारिता की बुनियादी समझ और ट्रेनिंग हो। वरना इसके कई दुष्परिणाम भी हो सकते हैं। अखिलेश शर्मा ने फेक न्यूज के बढ़ते चलन पर चिंता जताई और कहा कि इस चलन ने न्यू मीडिया की साख को बट्टा लगाया है। इसीलिए पारंपरिक पत्रकारिता के बुनियादी उसूलों को हमेशा याद रखना चाहिए जिसमें सबसे बड़ा सिद्धांत यह है कि हर खबर की पुष्टि कम से कम दो स्त्रोतों से होनी चाहिए। उन्होंने हाल ही में मोबाइल फोन पर शूट की गई ऐसी खबरों का जिक्र किया जो वायरल हो गईं लेकिन बाद में उनकी वास्तविकता को लेकर कई गंभीर प्रश्न उठाए गए।

अंत में उन्होंने कहा कि मोजो पत्रकारिता में रोजगार के नए दरवाजे खोल सकता है। पत्रकार नौकरी मांगने के मोहताज नहीं रहेंगे और रचनात्मक प्रतिभा वालों के लिए कई अवसर होंगे। इसमें स्वयं के यूट्यूब चैनल शुरू करने से लेकर ब्लॉगिंग, डिजिटल चैनल आदि संभावनाएं मौजूद हैं। हालांकि इसका एक नकारात्मक पक्ष यह भी है कि मोबाइल जर्नलिज्म की वजह से कई कैमरामैन और वीटी एडिटर को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है।

साभार- http://samachar4media.com से



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