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सिकंदर और फकीर डायोजिनीस

भारत आने से पूर्व सिकंदर डायोजिनीस नामक एक फकीर से मिलने गया। उसने डायोजिनीस के बारे में बहुत-सी बातें सुन रखी थी। डायोजिनीस अद्वितीय फकीर थे, यहाँ तक कि वे अपने पास कटोरा भी नहीं रखते थे। शुरुआत में जब वे फकीर बने थे, तो अपने पास एक कटोरा रखते थे, लेकिन एक दिन उन्होंने एक कुत्ते को नदी से पानी पीते हुए देखा, तो उन्होंने सोचा कि जब एक कुत्ता बगैर कटोरे के पानी पी सकता है, तो मैं अपने साथ कटोरा लिए क्यों घूमता हूँ ? जब एक कुत्ता बगैर कटोरे के गुजारा कर सकता है, तो मैं क्यों नहीं ? यह सोचते ही उन्होंने कटोरा फेंक दिया।

सिकंदर ने सुना था कि डायोजिनीस हमेशा परमानंद की अवस्था में रहते हैं। इसलिए वह डायोजिनीस से मिलना चाहता था।

सिकंदर को देखते ही डायोजिनीस ने पूछा – तुम कहाँ जा रहे हो ?
सिकंदर ने उत्तर दिया – मुझे पूरा एशिया महाद्वीप जीतना है, इसके लिए एक बड़ी जंग लड़ने जा रहा हूँ।

डायोजिनीस ने पूछा – उसके बाद क्या करोगे ?
सिकंदर ने कहा – उसके बाद वह शेष बची दुनिया को जीतेगा।

डायोजिनीस ने फिर पूछा – और उसके बाद ?
सिकंदर ने खिसियाते हुए उत्तर दिया – उसके बाद मैं आराम करूँगा।

डायोजिनीस हँसने लगे और बोले – जो आराम तुम इतने दिनों बाद करोगे, वह तो मैं अभी कर रहा हूँ। यदि तुम आखिरकार आराम ही करना चाहते हों, तो उसके लिए इतना कष्ट उठाने की क्या आवश्यकता है ? मैं इस समय नदी के तट पर आराम कर रहा हूँ, यहाँ बहुत जगह खाली है, इसके लिए तुम्हें कहीं और जाने की क्या आवश्यकता है, तुम चाहों तो इसी वक्त आराम कर सकते हो।

डायोजिनीस की सच्ची बात सुनकर सिकंदर एक पल के लिए तो बहुत शर्मिंदा हुआ और वह सोचने लगा कि यदि उसे अंततः आराम ही करना है, तो अभी क्यों नहीं ? वह आराम तो डायोजिनीस अभी कर रहा है और मुझसे ज्यादा संतुष्ट है। मेरे पास सब कुछ है, पर मेरे मन को चैन नहीं और डायोजिनीस के पास कुछ भी नहीं है, पर इसका मन शांत है।

यह सोच कर सिकंदर ने डायोजिनीस से कहा – मैं ऊपर वाले से यही माँगूगा कि वह अगले जन्म में मुझे सिकंदर की जगह डायोजिनीस बनाये।
डायोजिनीस ने उत्तर दिया – तुम फिर अपने आप को धोखा दे रहे हो। इस बात के लिए तुम ऊपर वाले को क्यों बीच में ला रहे हो। यदि तुम्हें डायोजिनीस ही बनना है, तो इसमें कौन सी कठिन बात है ? मेरे लिए सिकंदर बनना बहुत कठिन है क्योंकि मैं शायद किसी भी जन्म में पूरी दुनिया को नहीं जीत पाऊंगा। लेकिन तुम्हारे लिए डायोजिनीस बनना सरल है। इसी समय अपनी इच्छाओं का परित्याग करो और आराम करो । सिकंदर डायोजिनीस की यह बात सुनकर अवाक् ( बिना कुछ बोले ) रह गया।

सिकंदर जब भारत से जीतकर वापिस जा रहा था तो एक नदी के किनारे सिकंदर को इतना तेज बुखार चढ़ गया कि सिकंदर को अपनी पूरी सेना सहित उसी नदी के किनारे पड़ाव डालना पड़ा और एक वैद्य को बुलाकर दिखाना पड़ा।

वैद्य ने सिकंदर का परीक्षण करने के बाद कहा कि इनकी अंतिम साँसें चल रही हैं और मेरे ख्याल से इनसे इनकी अंतिम इच्छा पूछ लेनी चाहिए।

सिकंदर ने कहा – मेरी माँ को यहाँ मेरे पास बुला दो।
सेनापति ने कहा – इस समय और इतनी जल्दी ऐसा होना संभव नहीं है।

सिकंदर ने कहा – मेरा पूरा राज्य ले लो, लेकिन एक बार मेरी माँ को मुझसे मिला दो ।
लेकिन सेनापति ने दोबारा मना कर दिया।

अन्त में सिकंदर ने मरने से पहले कहा कि मरने के बाद जब मुझे कब्र में दफन करने ले जाया जाए, तो मेरे दोनों हाथ कपड़े से बाहर रखे जाएं।

सेनापति ने सिकंदर की बात पर ध्यान नहीं दिया और वह चुप ही रहा।

सिकंदर ने अपनी बात को फिर दोहराया कि मरने के बाद जब मुझे दफन करने ले जाया जाए, तो मेरे हाथ कपड़े से बाहर रखे जाएं।

सेनापति ने कहा कि हे बादशाह ! आपके दिमाग पर बुखार का असर हो गया है, इसलिए आप कुछ भी कहे जा रहे हैं।

अन्त में सिकंदर ने कहा कि मेरी अंतिम इच्छा है कि मेरे हाथ इसलिए कपड़े से बाहर रखे जाएं ताकि सारी दुनिया को यह संदेश मिले कि पूरी दुनिया को जीतने वाला विश्वविजेता सिकंदर भी अन्त में इस दुनिया से खाली हाथ ही गया है।

वास्तव में यही सच्चाई है, हम जीवन भर मेरी-मेरी करते रहते हैं और अपने मन को बेचैन किए रखते हैं। हम सोचते रहते हैं कि मैं यह प्राप्त कर लूँ, मैं वह प्राप्त कर लूँ और हमारी इच्छाएं कम होने के स्थान पर बढ़ती ही जाती हैं। डायोजिनीस के कथनानुसार इच्छाओं का सम्पूर्ण परित्याग करके ही हम आराम कर सकते हैं या दूसरे शब्दों में कहा जाए तो इच्छाओं का सम्पूर्ण परित्याग करके ही हमारे मन को आराम मिल सकता है।

।। राम राम ।।जय जिनेंद्र ।।



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