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अमृतकाल और युवा भारत की चुनौतियां

हिन्दुस्तान अपनी आजादी के 75वें वर्ष का उत्सव मना रहा है. साल के हिसाब से देखें तो 75वां वर्ष उम्रदराज होने का संदेश देता है लेकिन जब हिन्दुस्तान की बात करते हैं तो यह यौवन का चरम है. यह इसलिये भी कि वर्तमान हिन्दुस्तान युवाओं का है और आज अमृतकाल में युवा भारत चौतरफा चुनौतियों से घिरा हुआ है. चुनौतियों के साथ संभावनाओं के दरवाजे हमेशा से खुले रहे हैं और यह भारतीयता की पूंजी है. जब दुनिया चुनौतियोंं से टूटकर बिखर जाती है तब भारत अपने नवनिर्माण में जुट जाता है. आज की काल परिस्थिति भी इसी बात का संदेश देती है. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि भारत का युवा समाज आज बेरोजगारी, अशिक्षा, महंगाई के साथ दिशाभ्रम में अपना भविष्य तय कर रहा है. उसके पास अनेक विकल्प हैं लेकिन उसे भ्रमित किया जा रहा है. ऐसे में चुनौतियां हमेशा पहाड़ की तरह खड़ी हो रही है. आखिर कौन सी चुनौती है जो युवाओं को दिग्गभ्रमित कर रही है? इस पर खुलेमन से चर्चा करने की जरूरत है.

जब हम युवा भारत की चर्चा करते हैं तो हमारे समक्ष करीब करीब साल 2000 में इस दुनिया में आये उन बच्चों को सामने रखते हैं जो इस समय 20-22 वर्ष के हैं. इनके जन्म के आरंभिक पांच वर्ष छोड़ दिया जाए तो जो इनके पास करीब 15 वर्ष बचते हैं, वह अज्ञानता के वर्ष हैं. यह कोरी बात नहीं है बल्कि इस दौर में मोबाइल ने उनकी गहरे ज्ञान की दुनिया को अंधकार में बदल दिया है. देश और समाज को लेकर अपनी अपनी तरह से परिभाषा मोबाइल पर गढ़ी जा रही है.

एक सुनियोजित ढंग से युवाओं को इतिहास से परे कर दिया गया. कुछ सच और कुछ झूठ को ऐसे बताया और दिखाया जा रहा है कि बीते दशकों में एक शून्य था. उम्र का यह दौर नाजुक होने के साथ-साथ समझ का कच्चा भी होता है. यह दौर इसलिये भी खतरनाक है कि समाज में सामूहिक परिवार का तेजी से विघटन हुआ और एकल परिवार ने स्थान बनाया है. राष्ट्र, इतिहास, संस्कृति, धर्म, समाज और जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाने वाले दादा-दादी और नाना-नानी किसी वृद्धाश्रम में जीवन बीता रहे हैं. मां-बाप पैसे कमाने की मशीन हो गये हैं और एक या दो बच्चे वाले परिवार का ज्ञानालय मोबाइल बन चुका है. अधकचरा ज्ञान और दिशाभ्रम ने युवाओं का आत्मविश्वास को धक्का पहुंचाया है.

अमृतकाल में जब इस विषय पर चर्चा करें तो बेहद सावधानी बरतने की जरूरत होती है. बुर्जुगों के वृद्धाश्रम जाने के बाद स्कूलों से नैतिक शिक्षा का पाठ विलोपित कर दिया गया है. इधर की सत्ता-शासन हो या उधर की सत्ता-शासन किसी ने इस बात की चिंता नहीं की है. सिनेमा एक पाठशाला हुआ करती थी तो वह भी अब वैसा जिम्मेदार नहीं रहा. सामाजिक सरोकार की फिल्में कब से उतर चुकी हैं. पत्रकारिता की चर्चा करें तो खुद में अफसोस होता है कि क्या यह वही पत्रकारिता है जिसने अंग्रेजों को भारत छोडऩे के लिए मजबूर कर दिया था या स्वतंत्र भारत में आपातकाल जैसे कलंक के सामने पहाड़ बनकर खड़ा हो गया था?

आज क्या हो गया है? दरअसल, मिशनरी पत्रकारिता ने व्यवसाय को ध्येय बना लिया है और जब अखबारों में यह सूचना दी जाती है कि उसके प्रकाशन का लाभ-हानि का आंकड़ा यह रहा तो बची-खुची उम्मीद भी तिरोहित हो जाती है. यह अमृतकाल के हिन्दुस्तान का सच है. यह सच एक चुनौती बनकर हमारे सामने खड़ा है.

15 अगस्त 1947 से लेकर अमृतकाल तक राजनीति में गिरावट को मापने का पैमाना नहीं बचा लेकिन यह भारत की मिट्टी की ताकत है कि वह हर बार पूरी ताकत के साथ खड़ा हो जाता है. बहुत पीछे ना भी जायें तो पिछले तीन दशकों में चुनावी राजनीति ने मुफ्तखोरी का ऐसा मीठा जहर समाज में बोया है कि आज खुद राजनीतिक दलोंं को मुफ्तखोरी के खिलाफ खड़े होना पड़ रहा है. मुफ्तखोरी से युवा समाज निष्क्रिय हुआ है और जो जितना ज्यादा मुफ्त में देता है, वह सरकार, वह नेता उनका आइडियल बन जाता है. दुर्भाग्य है कि जब स्वयं प्रधानमंत्री मुफ्तखोरी के खिलाफ बोलते हैं तो कुतर्क के साथ उनका विरोध शुरू हो जाता है. इस मोबाइल ने विरोध करना तो सीखा दिया है लेकिन उसके पास तर्क नहीं है. वह केवल विरोध के लिए विरोध करना जानता है. कोई भी सत्ता और शासन इस देश की जनता का विश्वास जीते बिना नहीं रह सकती है. तब ऐसे में यह कहना या कल्पना करना कि सरकार जनविरोधी है, खुद का विरोध करना है.

शिक्षा के स्तर को लेकर हम बेखबर हैं. ऐसा क्या हो गया है कि उच्च शिक्षा पा रहे विद्यार्थी कभी हताशा में तो कभी डर में तो कभी किसी अन्य कारण से आत्महत्या कर रहे हैं. आत्महत्या का यह ग्राफ निरंतर बढ़ रहा है जो डरावना है और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाता है कि आखिर उस विद्यार्थी की हताशा, डर को शिक्षक क्यों नहीं समझ पा रहे हैं? क्यों उसका समय पर निदान कर उसके भीतर आत्मविश्वास नहीं जगा पा रहे हैं. सच तो यह है कि हम सब जवाबदारी लेने के बजाय नौकरी कर रहे हैं. एक समय था जब बच्चा गलती करता तो मास्साब से स्कूल मेें पिटाई खाता और घर पर शिकायत करता तो पिता से. तब बच्चों में कोई हताशा-निराशा या डर नहीं था क्योंकि उसे बेहतर करने के लिए प्रेरित किया जाता था.

एक समय था जब मास्साब के कुटने पर कोई शिकायत नहीं होती थी लेकिन आज मामूली सजा पर मां-बाप खड़े हो जाते हैं. यहीं से बुनियाद कमजोर होती है. कुछ अपवादस्वरूप घटनाओं को छोड़ दें जिनका समर्थन नहीं किया जा सकता है लेकिन हमें पुराने दौर में लौटने की जरूरत होगी. एक बड़ा रोग पब्लिक शिक्षण संस्थाओं का है. यहां आर्थिक रूप से सम्पन्न बच्चों और स्टेटस मेंटेन करने के लिए अपने खर्चो में कटौती कर भेजे गये मध्यमवर्गीय बच्चों के बीच एक प्रतिस्पर्धा होती है. ऐसे में मन में कुंठा और हताशा स्वाभाविक है. यहीं से आत्मविश्वास कमजोर होता है और कुछ बच्चे आत्महत्या जैसे भीरू रास्ता अपना लेते हैं तो कुछ बच्चे अपराधिक प्रवृत्तियों की ओर उन्मुख हो जाते हैं. क्या कारण है कि अनेक कोशिशों के बाद भी शासकीय शिक्षण संस्थाओं में सीटें रिक्त रह जाती हैं और निजी शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश मिलना मुश्किल हो जाता है. इस बात को समझने की जरूरत है. अमृतकाल के इस सच से मुंह मोडऩा मुश्किल है और जरूरी यह हो गया है कि हम सरकारी संस्थाओं को अपना बनायें, उन पर विश्वास करें और यही हमारी नींव को मजबूत करेंगे.

परिवर्तन प्रकृति का नियम है और दो-तीन दशक बाद शिक्षा नीति में परिवर्तन किया जाता है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए. एनईपी में स्वरोजगार के अवसर और मातृभाषा का समावेश किया गया है जो वर्तमान समय की जरूरत है. और भी जो प्रावधान किया गया है, उसमें अनेक पक्ष स्वागत के योग्य है किन्तु राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के पैरोकार इस बात से आत्ममुग्ध हैं कि यही सबकुछ है. शायद यह सच हो लेकिन एक सच यह भी है कि हम आप उसी शिक्षानीति से आये हैं जिसमें संशोधन-परिमार्जन करने लायक बनाया है. पाठ्यक्रम में जो परिमार्जन किया जाना चाहिए, वह हो लेकिन जरूरी है कि युवा भारत में यह दृष्टिसम्पन्न हो. शिक्षा विकास की बुनियाद है. हम इस बात को वर्षों से पढ़ते आ रहे हैं कि मैकाले ने कहा था कि भारत को गुलाम बनाये रखना है तो उसकी शिक्षा व्यवस्था को नष्ट कर दो. आज इस स्थिति को बदला जा रहा है तो स्वागत है. समाज की बुनियादी जरूरतें यथा शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, पानी, सुरक्षा आदि-इत्यादि राज्य की जवाबदारी होती है और यही जवाबदारी निजी हाथों में जाती हैंं तो यह जवाबदारी ना होकर नफा-नुकसान के तराजू में तौला जाता है जो समाज के विकास में बाधक बनता है. इसलिये अमृतकाल में इस बात का संकल्प लेना होगा कि राज्य अपनी जवाबदारी अपने कंधों पर लेगी.

अमृतकाल में युवा भारत की चुनौतियां अपार हैं. लोक और नैतिक शिक्षा की नींव को मजबूत कर ही हम इसे सार्थक बना सकते हैं. आत्मनिर्भर भारत की कल्पना तब साकार होगी जब हर युवा के पास रोजगार होगा ना कि मुफ्त की सुविधायें. शहर गांव तक ना पहुंचे बल्कि गांव शहर तक आये तो आत्मनिर्भर भारत की मजबूत तस्वीर नुमाया होगी. मुलतानी मिट्टी शहर तक आये लेकिन शहर का एक रुपये वाला पाउच गांवों तक पहुंच कर उनकी आर्थिक क्षमता को प्रभावित करे, इसे रोकना होगा. मितव्ययिता का सबसे अहम सूत्र है संतोष और खादी इसका संदेश है. हालांकि आज महंगी होती खादी के मायने बदल गये हैं लेकिन आज भी एक आस, एक उम्मीद बाकि है कि हम हथकरघा उद्योग को जिंदा करें और बाजार के पहले समाज उसे पहने और आगे बढ़ाये. अमृतकाल केवल उत्सव का विषय नहीं है बल्कि यह संकल्प का विषय है कि भारत कैसे विश्व गुरु बने, कैसे आर्थिक रूप से महाशक्ति बने और कैसे युवा भारत दुनिया के सामने नजीर बने.

(लेखक विभिन्न सामाजिक विषयों पर लिखते हैं)

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