आप यहाँ है :

अमृत बरसा कर चले गए अमृतलाल वेगड़

अमृत लाल वेगड़ अब नहीं रहे। सुनकर यकीन नहीं होता। जानते थे कि नब्बे साल के हैं। पके आम हैं। कभी भी टपक जाएंगे। खुद भी कहते थे, मैं तो प्लेटफॉर्म पर हूं। ट्रेन का इंतजार है। आएगी तो बैठ जाऊंगा। लेकिन मन था कि मानता नहीं। शायद इसलिए कि जो व्यक्तित्व जिंदगी भर समाज को देता है, उसकी छवि ईश्वर जैसी बन जाती है। ईश्वर याने जो सबको देता है, किसी से लेता कुछ नहीं। वह तो अमर होता है। जो अमर हो उसे मौत कैसे ले जा सकती है। इसीलिए तो वेगड़ जी अमर हैं। उनके बरसाए अमृत का पान कर हम सबके अंदर एक अमृत लाल वेगड़ धड़कता है। हम उसे महसूस करें या न करें। आज भयावह पर्यावरण हत्या के दौर में हमें वेगड़ जी के होने का अर्थ बताने की जरूरत नहीं है।

चालीस के दशक में गुरुदेव के शांति निकेतन में बरसों तक अध्ययन के बाद वेगड़ जी ने अपने महान चित्रकार गुरु नन्द लाल बोस से अपने भविष्य को लेकर संशय प्रकट किया। गुरु जी ने कहा, जिंदगी में सफल तो बहुत लोग होते हैं। सार्थक नहीं। जिंदगी की सार्थकता सिद्ध करो। वेगड़ इस मन्त्र को लेकर चले आए। वैसे तो गुजरात से थे, लेकिन पूर्वज आकर जबलपुर बस गए थे। इस नाते गंगा से भी ज्यादा पवित्र मानी जाने वाली नर्मदा को पूजने लगे। जो लोग जबलपुर जाते रहते हैं, वो जानते हैं कि वहां लोगों की नस-नस में नर्मदा समाई हुई है। नर्मदा सूखती है तो लोगों के दिल बैठ जाते हैं। आपस में बातचीत की शुरुआत नमस्कार या जय श्रीराम या सलाम से नहीं होती। वे कहते हैं- नर्मदे हर। उत्तर भी मिलता है- नर्मदे हर। जिंदगी का आधा सफर तय किया था कि नर्मदा की परिक्रमा की सूझी। निकल पड़े। अंटी में पैसे नहीं थे। पत्नी कांता से जिक्र किया। उन्होंने तुरंत हाथ से शादी की अंगूठी उतार कर दे दी। वेगड़ जी की आंखें छल छला गईं। सुनार को अंगूठी बेची और यात्रा पर निकल पड़े। अमरकंटक से लेकर गुजरात में समंदर में समाने के छोर तक।

उन दिनों घना जंगल, शेरों के झुण्ड के झुण्ड घूमते। अपने घर में दाखिल होने वाले राहगीरों को मार कर खा जाते। नर्मदा की परिक्रमा कर रहे दो श्रद्धालुओं को शेरों ने मार डाला। घर में कोहराम। ससुर ने वेगड़ जी की पत्नी याने कांता को डांटा- क्यों जाने दिया? कांता का भरोसा देखिए। बोलीं- उनका इरादा नेक है। चिंता मत करिए। उन्हें कुछ नहीं होगा। कुछ नहीं हुआ। लौटे तो नर्मदा के विराट संस्मरणों के साथ। नर्मदा और उसके इर्द गिर्द जैव विविधता, जंगल, संस्कृति और तमाम रीति रिवाजों का खजाना लेकर। एक पुस्तक की शक्ल में यह खजाना हम सब पर लुटा दिया। यह ग्रन्थ भारत की पर्यावरण पत्रकारिता में मील का पत्थर बन गया।

अभी भी चैन नहीं मिला था। पच्चीस बरस बाद 82 की उमर में एक बार फिर नर्मदा की परिक्रमा पर निकल पड़े। यह जांचने कि पर्यावरण और नर्मदा संस्कृति में कितनी गिरावट आई है? लौटे तो तनिक क्षोभ के साथ। नर्मदा के आस पास प्रदूषण, जंगलों की कटाई, वन्य जीवों का नाश और लुप्त होती नर्मदा संस्कृति ने उनका दिल दुखाया था। नर्मदा से बोले- माँ! मुझे माफ कर दो। ग्यारह साल में दस यात्राएं। कुल चार हजार किलोमीटर की पदयात्रा। सर्वाधिक प्रामाणिक पत्रकारिता के अद्भुत नमूने। भारत के किसी पर्यावरण पत्रकार ने उनसे पहले कोई काम किया हो तो बताइए? दूसरा काम भी उसी जबलपुर के सपूत अनुपम मिश्र ने किया। ‘आज भी खरे हैं तालाब’ और ‘हमारा पर्यावरण’ जैसे अनुपम ग्रन्थ देकर।

लोग अमृत लाल वेगड़ को पर्यावरण प्रेमी, नर्मदा भक्त, शिक्षक, चित्रकार और अथक मुसाफिर मानते हैं। मेरी नजर में वे यात्रा संस्मरण और पर्यावरण पर लिखने वाले भारत के पहले पत्रकार हैं। जिन लोगों ने उनकी पुस्तकें- सौंदर्य की नदी नर्मदा, अमृतस्य नर्मदा और तीरे तीरे नर्मदा पढ़ीं हैं, वे इसे अनमोल धरोहर मानते हैं। वो कहते थे, नर्मदा मेरे लिए एक ऐसी किताब है, जिसे बार बार पढ़ने को मन करता है। जब वेगड़ ने नर्मदा यात्राएं शुरू कीं, तो बांध नहीं बने थे। याने हर वो गांव उन्होंने देखा, जो अब अस्तित्व में नहीं है और डूब चुका है। भारत के पत्रकार कभी इसका महत्त्व समझेंगे? सौंदर्य की नदी नर्मदा पुस्तक से सिर्फ एक पैराग्राफ यहां उद्धृत है-
‘सूरज धधक रहा है। धूप लावा की तरह फैल रही है। न कोई आदमी दिखाई देता है न गांव। चिड़िया तक नहीं दिखती। लगता है इस नीरव, निर्जन संसार में एकदम अकेले हैं। इस वीरानी और सूनेपन में नर्मदा ही इकलौता सहारा है। …एक रात नर्मदा किनारे गांव में एक मकान की छत पर सोए। सवेरे देखा दूर से पनिहारिनें नर्मदा का पानी ला रही थीं। मैंने पूछा, क्या तुम्हारे गांव में कुआं नहीं है? कुआं तो है पर हमने हमेशा नर्मदा का जल पिया है। इसलिए कुएं का पानी फीका लगता है। नर्मदा तो बस नर्मदा है। …भरूच में बड़ी गंदगी है। लेकिन यही भरूच कभी भारत का सबसे व्यस्त बंदरगाह था। तब इसका नाम भृगुकच्छ था। देश विदेश के जहाज यहां आते थे। …मैंने नर्मदा को प्रकट होते देखा और समुद्र में लुप्त होते देखा। नर्मदा को किनारों से बतियाते देखा, चट्टानों पर लिखते देखा और रेत पर बेलबूटे काढ़ते देखा। मां नर्मदे! बार बार तुम्हारे तट पर आता रहूंगा। लेकिन एक बार ऐसा आऊंगा कि वापस नहीं जाऊंगा। हमेशा के लिए मीठी नींद में सो जाऊंगा। तब थपकी देकर सुला देना मां। बस यही एक इच्छा है। इसे पूरी करना मां!

अमृत लाल वेगड़ की बात बिना कांता जी के पूरी नहीं होती। कहती हैं- झारखंड के चाईबासा से ब्याह कर लाए थे। शादी के अगले दिन सुबह से ही गेंती, फावड़ा और तसला लेकर नाली खोदने लगे …अगले दिन देखा सुबह सुबह मेरी सास के साथ बैठकर चक्की पीस रहे हैं। फिर मैंने उठाया और खुद चक्की पीसी। एक बार बोले- अगर मैं पहले जाऊं तो तुम बिलकुल वैसे ही रहना, जैसे आज रहती हो। बिंदी, चूड़ी, मंगलसूत्र सब कुछ ज्यों का त्यों। अगर तुम इनमें से एक भी चीज छोड़ दोगी तो मेरी आत्मा को अपार कष्ट होगा और अगर तुम पहले जाती हो तो मुझे तो कुछ छोड़ना है नहीं। कांता जी कहती हैं- राइट टाउन के इस घर में वेगड़ जी की तीन पीढ़ियां एक साथ निवास करती हैं। तीन भाई, उनका परिवार, उनके बच्चे और उन सबके बच्चों के बच्चे। एक छत के नीचे, एक चूल्हे पर आज भी खाना। आपस में भरपूर प्यार, स्नेह और एक दूसरे पर जान छिड़कते हैं सब।

मुझसे कुछ मुलाकातें हुईं। अंतिम मुलाकात बीस बरस पहले भोपाल के किसी कार्यक्रम में। छूटते ही बोले- आपकी नर्मदा में प्रदूषण वाली रिपोर्ट अच्छी थी। नर्मदा पर टीवी में काम नहीं हुआ है। आप करते रहिए। बीते दिनों माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्व विद्यालय के दीक्षांत समारोह में गया था। उस दिन यूनिवर्सिटी ने वेगड़ जी को सम्मानार्थ डी-लिट् उपाधि देने का फैसला किया था। इसीलिए गया था। वेगड़ जी को सुनना एक सदी के सफर से गुजरने जैसा अनुभव होता रहा है। अफसोस! यह अवसर नहीं आ सका। तबियत खराब होने के कारण नहीं आ सके। चंद रोज पहले कुलपति जगदीश उपासने और कुलाधिसचिव लाजपत आहूजा जबलपुर गए। उन्हें घर पर यह सम्मान प्रदान किया और देखिए घर पर जो कार्यक्रम यूनिवर्सिटी ने आयोजित किया था, उसका खर्च खुद वेगड़ जी ने उठाया। कहा- यह कार्यक्रम मेरे घर में है। आप मेरे मेहमान हैं। भला मेहमान खर्च करते हैं कभी?

टीस उठती है। देश से सदी के ये दस्तावेज अपने साथ बेजोड़ अनुभव-संपत्ति का खजाना लेकर जा रहे हैं। हम इनको नई नस्लों तक सुरक्षित पहुंचाने का कोई प्रयास नहीं करते। वेगड़ जी पत्रकारिता के किसी भी पाठ्यक्रम में नहीं पढ़ाए जाते और शायद ही पढ़ाए जाएंगे। कहावत है एक बुजुर्ग आदमी जब जाता है तो अपने साथ एक विशाल लाइब्रेरी भी ले जाता है। क्या कभी हम इसे समझ पाएंगे?

(लेखक राज्य सभा टीवी के पूर्व कार्यकारी निदेशक व वरिष्ठ पत्रकार हैं)

साभार- http://samachar4media.com/ से



सम्बंधित लेख
 

Back to Top