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ओड़िशा की धरती पर जन्मा एक देवदूत

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर स्थित विश्व के सबसे बड़े आदिवासी आवासीय विश्वविद्यालय ;कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ सोसल साइंसेज,‘‘कीस’’ तथा कलिंग इंस्टीट्यूट आॅफ इण्डस्ट्रीयल टेक्नालॉजी ‘‘कीट’’ के प्राणप्रतिष्ठा तथा कंधमाल लोकसभा के माननीय सांसद प्रोफेसर अच्युत सामंत एक आलोक पुरुष हैं। मेरा उनसे मिलना ही अपने मानव जीवन को सार्थक बनाने जैसा है। मुझे ऐसा लगा जैसे मैं किसी सरल, सहज,आत्मीय लगाव वाले संत से मिल रहा हूं। उनके द्वारा विकसित उनके गांव स्मार्ट विलेज कलराबंक गया। आयोजित अखण्ड यज्ञ तथा धर्मसभा आदि में हिस्सा लिया। उनकी स्वर्गीया मां नीलिमारानी सामंत से मिला। एक सच्ची तथा आदर्श माँ क्या होती है, ये जाना। उनकी छोटी बहन डॉ. इति सामंत से मिला। प्रोफेसर अच्युत सामंत मुझे श्रेष्ठता के आदर्श लगे। विनम्रता और सादगी के प्रतीक लगे।

डॉ. अच्युत सामंताः एक ऐसा तीर्थ जहाँ शब्द मौन हो जाते हैं और भावनाएँ हिलोरें लेती है

डॉ. अच्युत सामंताः हजार हाथों वाला आधुनिक देवता

यह एक सहज मानव स्वभाव है कि उसके अपने कटु अनुभव सदैव याद रहते हैं लेकिन वह अपने जीवन के सभी सुखद अनुभवों को भूल जाता हैं। मैं उनके सानिध्य में रहता हूँ। उनके साथ व्यतीत किया गया एक-एक क्षण मेरे लिए प्रेरणादायक है। प्रत्येक व्यक्ति सबसे पहले अपना जीवन संवारता है ,अधिक से अधिक भौतिक सुखों का उपभोग करना चाहता है लेकिन प्रो अच्युत सामंतजी मुझे राजा जनक की तरह विदेह लगे जो आज भी दो कमरों वाले किराये के मकान में रहते हैं तथा साग-भात खाकर लाखों युवाओं तथा लोगों के आदर्श बनकर स्वावलंबी बनाते हैं। उनका जीवन संवारते हैं।

प्रो अच्युत सामंत जी; मेरे दिव्य पुरुष तथा दुनिया के आलोक पुरुष हैं। उनकी विनम्रता ,सहजता,चेहरे पर सदैव छाई रहनेवाली भगवान बुद्ध-सी शांति उनके पारदर्शी व्यक्तित्व को एक नई ऊंचाई प्रदान करती है। जिस बालक के धरती पर आगमन के मात्र चार साल के भीतर ही उसके सिर से उसके पिता का साया उठ जाय,वह बालक आज विश्व का महान शिक्षाविद् बन जाये; ये सबकुछ एक दैवीय संयोग ही है।

उनके जीवन के आरंभ के 25 साल उनको अपने आपको स्वावलंबी बनाने में व्यतीत हुए तथा शेष 25 साल आदिवासी समाज तथा लोकसेवा में व्यतीत हुए हैं। यह तो केवल कल्पना ही की जा सकती है कि कीट-कीस का इतना विशालतम सामा्रज्य खड़ा करने में उनको पग-पग पर कितनी मुशीबतों, समस्याओं, अपमानों, आलोचनाओं, बेवजह के विवादों से गुजराना पड़़ा होगा लेकिन उन्होंने अपने कर्तव्य पथ पर अबाध गति से चलना कदापि नहीं छोड़ा। भगवान भोलेनाथ की तरह आपके जीवन में आनेवाले सभी हलाहल को पी लिया। मुझे ऐसा लगा कि जिस व्यक्ति पर उसकी ममतामयी मां का दिव्य आशीर्वाद हो और स्वर्गीया मां के संकल्पों तथा सपनों को साकार करने का जिसने प्रण कर लिया हो उसके निःस्वार्थ समाजसेवा के मार्ग तो परमात्मा भी नहीं रोक सकता है। 15नवंबर,2019 को मैंने कर्मवीर अच्युत सामंत के रुप में उनको ‘कौन बनेगा करोड़पति’’के हाॅट शीट पर बैठा देखा। मुझे आत्मगौरव-सा अनुभव हुआ।

वे जब मुम्बई से भुवनेश्वर लौटे तो उनका मानपत्र पढ़ा जिसमें लिखा हुआ था- ‘‘समर्पण के प्रतीक,मानवता की बेहतरीन मिसाल,कर्म ही जिसका धर्म है, सेवा ही जिसकी निष्ठा है, उनके जैसे कर्मवीर को सम्मानित करके ‘केबीसी’स्वयं को सम्मानित महसूस किया है। बहुत अच्छा लगा। मेरी समझ से प्रो अच्युत सामंत अत्यंत अत्यंत सरल और सहज स्वभाव के एक मिलनसार व मृदुल व्यक्ति हैं जो सबसे प्यार करते हैं। 2020 की वैश्विक महामारी कोरोना के संक्रमण काल में एक तरफ जहां सभी अपने-अपने घरों में एकांतवास कर रहे थे वहीं प्रो अच्युत सामंत ने ओडिशा सरकार तथा ओडिशा के माननीय मुख्यमंत्री श्री नवीन पटनायकजी की प्रेरणा तथा सहयोग से ओडिशा में चार-चार कोविद-19 अस्पताल खोले। कोरोना योद्धाओं आदि की हर प्रकार के सेवा तथा सहायता की। साधु-महात्माओं से लेकर बौद्ध भिक्षुओं तक उन्होंने अपनी ओर से अनवरत भोजन आदि उपलब्ध कराया। 2020 होली से लेकर जुलाई 2020 तक अपने द्वारा स्थापित कीस के कुल तीस हजार से भी अधिक आदिवासी बच्चों को उनके गृहगांव में सूखा राशन से लेकर से चूड़ा-चीनी,दाल आदि के साथ आदिवासी बच्चों की पाठ्य-पुस्तकें तथा अन्यान्य शैक्षिक संसाधान आदि उपलब्ध कराया।

वे मेरे लिए आदर्श ही नहीं अपितु मेरे लिए प्रेरणापुरुष हैं। अगर कोई उनसे सीखे तो आर्ट आॉफ गिविंग तथा आर्ट आॉफ ऐप्रिसिएशन की कला सीखे। 1992-93 में मात्र पांच हजार रुपये से ‘‘कीट-कीस’’ की उन्होंने स्थापना की । ‘‘कीस’’ आज भारत का प्रथम आदिवासी आवासीय विश्वविद्यालय बन चुका है जबकि कीट पहले से ही डीम्ड विश्वविद्यालय है जहां पर लगभग तीस हजार से भी अधिक बच्चे उच्च तथा तकनीकी आदि शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। कीस वास्तविक तीर्थस्थल है जहां पर आदिवासी बच्चे समस्त आवासीय सुविधाओं का निःशुल्क उपभोग करते हुए केजी कक्षा से लेकर पीजी कक्षा तक फ्री पढ़़ते हैं तथा प्रो अच्युत सामंत को अपना आदर्श मानकर अपने व्यक्तित्व का सम्यक विकास करते हैं।

मुझे समालोचना बहुत अच्छा लगता है। हिन्दी साहित्य जगत के समालोचक स्वर्गीय रामचन्द्र शुक्ल ने अपने ’श्रद्धा‘ प्रकरण की समालोचना में यह बताया है कि किसी के प्रति श्रद्धा के आधार तीन हैं। पहली श्रद्धा व्यक्ति की असाधारण प्रतिभा, दूसरी श्रद्धा व्यक्ति का शील अथवा पारदर्शी चरित्र तथा तीसरे प्रकार की श्ऱद्धा व्यक्ति विशेष की साधन-संपन्नता होती है। ये तीनों प्रकार की श्रद्धा प्रो. अच्युत सामंत के उज्ज्वल तथा पारदर्शी व्यक्तित्व में मुझे मिली।

प्रो. अच्युत सामंत ने मुझसे यह कहा कि जो भी मेरे साथ जो भी रहना चाहता है वह अपनी व्यक्तिगत अच्छाई के साथ रहता है,मैं किसी को अपने से अलग नहीं करता हूं। पाण्डेयजी, आपको मेरे साथ अगर रहना है तो अवश्य रहिये। मुझे ऐसा लगता है कि भगवान जगन्नाथ ने प्रो अच्युत सामंत को मेरे आध्यात्मिक जीवन की उन्नति के लिए ही उनसे मिलाया है।उनकी निःस्वार्थ समाजसेवा की सतत जिज्ञासा,आत्मविश्वास तथा सत्यनिष्ठा आदि मुझे बहुत पसंद है।

हिन्दी समाचार देखते समय जिन शब्दों को वे नहीं समझते हैं उनका अर्थ मुझसे पूछते हैं और उसको प्रयोग में लाते हैं। प्रो अच्युत सामंत को हिन्दी फिल्म का एक गाना बहुत पसंद है-‘‘गरीबों की सेनो,वो तुम्हारी सुनेगा,तुम एक पैसा दोगे वह दस लाख देगा। इसीलिए जब कभी भी वे थोड़ा बहुत दुखी होते हैं अथवा प्रति प्रसन्न होते हैं तो उनको यह गाना अपने मोबाइल से सुनाया करता हूँ। वह गाना मुझे भी अच्छा लगने लगा है। प्रो अच्युत सामंतजी प्रतिदिन स्वयं तीन-तीन घण्टे पूजा-पाठ करते हैं। उनसे मिलनेवालों में साधु-महात्माओं की संख्या अधिक नजर आती है जो उनको आशीर्वाद देने के लिए भारत के विभिन्न स्थलों के साथ-साथ ,विदेशों से भी आते हैं।

प्रो. अच्युत सामंत का प्रतिमाह पहली तारीख को श्रीजगन्नाथ धाम पुरी जाकर भगवान जगन्नाथ के चरणों में अपना प्रणाम निवेदित करना,सिरुली हनुमान मंदिर में प्रतिमाह के अंतिम शनिवार को जाकर पवनपुत्र हनुमानजी की पूजा करना,अपने गांव स्मार्ट विजेल कलराबंक जाकर अपने द्वारा निर्मित रामदरबार में पूजा करना तथा अपने भुवनेश्वर नयापली स्थित किराये के मकान में प्रत्येक महीने की संक्रांति के दिन श्रीरामचरितमानस के सुंदरकाण्ड का अखण्ड संगीतमय पाठ कराना मुझे बहुत अच्छा लगता है। मुझे ऐसा लगा कि प्रो. अच्युत सामंत का सानिध्य मुझे दैव संयोग से ही प्राप्त है। उनके द्वारा स्थापित कीट -कीस का पूरा परिवेश मुझे अध्यात्ममय लगता है। उन्हें देखकर मुझे अलौकिक अनुभूति होती है। मैं उनकी तस्वीर को अपने मोबाइल में सदा रखता हूं जिससे प्रतिपल उनकी हंसती हुई तस्वीर मैं देख सकूं और अपने आपको भी उन्हीं की तरह हंसमुख बना सकूं। प्रो अच्युत सामंत जब अपने समाजसेवा के कार्य के लिए ओडिशा से बाहर जाते हैं तो मैं सुबह ठीक 7.30 बजे उनको फोन करता हूं और जैसे ही वे फोन उठाते हैं उनको मैं कहता हूं- ‘‘जय जगन्नाथ! जय जगन्नाथ!! जगन्नाथ!!! प्रातःस्मरणीय-वंदनीय दिव्य पुरुष की सदा जय हो!’’उनका हंसता हुआ जवाब आता है कि ‘पाण्डेयजी, प्रणाम,नमस्ते! आप कैसे हैं? आपने चाय पिया या नहीं? मुझे ऐसा अहसास होता है जैसे मुझे दुनिया की तमाम खुशियां मुझे उस वक्त मिल गई हों। सच कहूँ तो प्रो अच्युत सामंत के विचार,व्यवहार और आचरण में एक अलौकिक दिव्यता मुझे मिलती है जिसका मैं कायल हूं। उनके साथ मुझे श्रीजगन्नाथपुरी के गोवर्द्धन मठ के 145वें पीठाधीश्वर और पुरी के जगतगुरु परमपाद स्वामी निश्चलानन्दजी सरस्वती महाराज के पावन दर्शन का भी सौभाग्य मिला है। मुझे ऐसा लगाता है कि एक तरफ जहां जगतगुरु शंकराचार्यजी स्वयं साक्षात चन्द्रमौलीश्वर के रुप में प्रो अच्युत सामंतजी को आशीष प्रदान कर रहे हैं वहीं प्रो अच्युत सामंत जी का जगतगुरु को षष्टांग प्रणाम निवेदन करना भी उनकी दिव्यता को स्पष्ट कर देता है।

उनके दिव्य सद्गुरु संत बाबा रामनारायण दास जी महाराज हैं। वे अबतक कुल लगभग 25 हिन्दू देवालयों का निर्माण अपनी ओर से कर चुके हैं तथा सैकड़ों देवालयों के निर्माण आदि में आर्थिक सहयोग प्रदान कर चुके हैं। प्रो. अच्युत सामंत को भगवान जगन्नाथ और पवनपुत्र हनुमान से विशेष लगाव है जबकि वे सभी धर्मों का आदर करते हैं तथा सभी देवी-देवताओं में विश्वास रखते हैं। सच कहूँ तो प्रो. अच्युत सामंतसच्चे ईश्वरभक्त हैं, गुरुभक्त हैं, ब्राह्मणभक्त हैं तथा पूरी तरह से आध्यात्मिक जीवन यापन करनेवाले नेक व्यक्ति हैं। वे समाज के उपेक्षित और वंचित आदिवासी समुदाय के बच्चों के लिए देवदूत हैं। उनकी सकारात्मक सोच को मैं सदा अपने दिल से लगाये रखता हूँ और अपनी भी सोच को उनके जैसा सकारात्मक बनाने का भरपूर प्रयास करता हूँ। उनके जीवन दर्शन: आर्ट आफ गिविंग’ को मैं अक्षरशः अपनाता हूँ । प्रो. अच्युत सामंत की सोच बड़ी अनोखी है। वे यही कहा करते हैं कि हमसब को दूसरों की अच्छाइयों को देखना चाहिए ;उनका यह दिव्य विचार मुझे बहुत पसंद है। सच कहूँ तो मैं कोई साहित्यकार अथवा विद्वान नहीं हूँ। मैं कोई पत्रकार अथवा लेखक भी नहीं हूं । यह प्रो. अच्युत सामंत का परम सानिध्य ही है जो मुझे सब-कुछ बना दिया है।

(लेखक राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हैं व उड़ीसा के जगन्नाथ पुरी में होने वाली रथ यात्रा के लिए दूरदर्शन व आकाशवाणी पर आँखों देखा हाल विगत कई वर्षों से सुना रहे हैं)

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