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एक संपादक की आपबीतीः मुजफ्फरपुर कांड में कई सफेदपोश जेल जाने से बच गए

मुजफ्फरपुर शेल्टर होम कांड : कैसे लड़ी ‘जिसका कोई नहीं था’ उसकी लड़ाई, कैसे परत-दर-परत पापकांड का करते रहे पर्दाफाश, प्रलोभन से लेकर धमकाने तक का चला खेल

मुज़फ़्फ़रपुर बालिकागृह मामले में कोर्ट का फैसला आ गया, लेकिन इस मामले में कई ऐसे लोग हैं जिनका गुनाह ब्रजेश ठाकुर से भी बड़ा है और वे बच गए। फिर भी मेरा मानना है कि जिस स्तर से इस मामले में आरोपी को बचाने की कोशिश चल रही थी वैसे में सजा हो गयी, यह समझिए कि उपर वाले की ही कृपा है।

खैर, जो भी हो, लेकिन मुजफ्फरपुर बालिकागृह मामले ने मुझे अपराधी जरुर बना दिया है। जी हां, जब से मुज़फ़्फ़रपुर बालिकागृह मामले में हाथ डाला, पहले मॉर्निंग वाक छूटी, फिर दूध और सब्जी बाजार छूटा, फिर बच्चों का स्कूल छोड़ना पड़ा। इससे भी बात नहीं बनी तो बच्चों का स्कूल बदलना पड़ा। पिता की पहचान ना हो, इसके लिए सभी जगह मां के नाम से ही काम चलाने की कोशिश शुरू हुई। हाल ऐसा हुआ कि जहां मेरी बच्ची कोचिंग पढ़ने जाती है, आज तक मैं वहां नहीं गया हूं। सब कुछ मां के नाम के सहारे ही चल रहा है। मॉल जाना है, फिल्म देखना हो, कहीं घूमना हो, पापा साथ नहीं रहते हैं। बच्चों को हिदायत है कि पापा के बारे में बात करने से परहेज करना है। बात चल भी जाए तो पापा पत्रकार हैं, ये तो कभी बोलना ही नहीं है। सुबह ऑफिस किसी रास्ते से जाना है और फिर ऑफिस से किस रास्ते से लौटना है, किसी को पता नहीं रहता था। कोई टाइम-टेबल आने-जाना का नहीं रहा। हालांकि इसका काम पर बुरा प्रभाव पड़ा।

इतना ही नहीं, एक समय ऐसा भी आया जब खबर रोकने को लेकर लगातार धमकी दी जाने लगी। उस दौर में घर से ऑफिस के रास्ते दो-दो तीन-तीन बार गाड़ी बदलनी पड़ रही थी। हमेशा गाड़ी में दो-तीन लोग साथ रहते थे। गाड़ी से चैनल का स्टिकर भी हटा दिया। जैसे ही कोई बाइक सवार ओवरटेक करता था, धड़कन तेज हो जाती थी। हमेशा चेहरा छिपा कर चलते थे कि कहीं कोई पहचान ना ले।

मुजफ्फरपुर में ब्रजेश ठाकुर के ठिकाने पर लगातार छापेमारी चल रही थी, लेकिन एक समय ऐसा भी आया कि मुजफ्फरपुर के हमारे रिपोर्टर ने खबर बालिकागृह मामले को कवर करने से हाथ खड़े कर दिये, क्योंकि उन्हें लगातार ठाकुर के गुर्गे धमकी दे रहे थे। कई बार हमला भी कर दिया। ऐसे में अपनी टीम का मनोबल बनाए रखने के लिए मैंने खुद मुज़फ़्फ़रपुर जाने का निर्णय लिया। पत्नी सहित पूरा ऑफिस मेरे इस निर्णय के खिलाफ था। आप मत जाइए, कुछ भी हो सकता है। लेकिन, मैं ब्रजेश ठाकुर के घर पहुंच गया और तब तक कवर करता रहा जबतक पुलिस की कारवाई चलती रही। उस दौरान मुझे टारगेट करने की कोशिश हुई, लेकिन सादी वर्दी में मौजूद पुलिस वालों ने मुझे तबतक पूरी सुरक्षा दी जबतक मैं वहां से निकल नहीं गया। दो वर्षों तक कभी किसी सार्वजनिक समारोह में शामिल नहीं हुआ। कहीं भी बाहर निकलते थे तो लौटने के बाद ऑफिस में साथ काम करने वाले को पता चलता था कि मैं कहां गया था। सबकुछ छुपछुपा कर चलता रहता था।

ऐसा नहीं है कि इस दौरान कभी मैंने अकेला महसूस किया। ये अलग बात है कि जब एक दिन हमारे बॉस जब मुझसे ये सवाल किये कि संतोषजी आप मुजफ्फरपुर बालिकागृह मामले को लेकर लगातार खबर चला रहे हैं, कहीं कोई चैनल खबर नहीं चला रहा है। देखिए सामने में पांच-पांच अखबार है। कहीं एक लाइन भी खबर नहीं छपी है। आपके पास साक्ष्य है ना। मैं दस सेकेंड तक चुप रहा और फिर कहा- सर, जिसकी लड़ाई हमलोग लड़ रहे हैं उसका इस दुनिया में कोई नहीं है। जीवन में मैं और आप कहीं कोई पाप किए होंगे तो इस लड़ाई से इतना पुण्य अर्जित हो जाएगा कि सात जन्म तक खत्म नहीं होगा।

उस सवाल के बाद फिर कभी हमारे बॉस ने इस खबर को लेकर कभी कोई सवाल नहीं किया। फिर भी कई ऐसे मौंके आए जब खबर रोकने के लिए बड़े-बड़े लोगों का फोन आया। कभी प्यार से तो कभी धमकी भरे लहज़े में खबर रोकने को कहते थे। फिर भी मैं चलता रहा। अभी मेरे उपर इसी खबर को लेकर तीन-तीन मुकदमें चल रहे हैं। खैर, यह सब काम के दौरान चलता रहता है। लेकिन, यह लड़ाई अंजाम तक पहुंचे, इसके लिए ऐसे ऐसे लोगों का साथ मिला कि आप सोच नहीं सकते हैं। कोई हाथ देखने वाले ज्योतिष को लेकर चले आते थे, देखिए इनका सबकुछ ठीक चल रहा है। मुबंई में मेरा एक मित्र रहता है। वो मुझे इतना कहा कि अगर आपको कुछ हो गया तो आपके परिवार का क्या होगा। एक करोड़ का जीवनबीमा कर दिया, लेकिन किसी ने ये नहीं कहा कि छोड़ दीजिए, किस लफड़े में पड़े हुए हैं। मेरी मां कभी-कभी घबड़ा भी जाती थी, लेकिन रंजू हमेशा साथ खड़ी रही, जो होगा देखा जाएगा।

आप गलत नहीं हैं। हां, ऐसा कभी नहीं लगे कि आप सामने वाले के पीछे हाथ धोकर पड़े हुए हैं। बस अपना काम करना है। इसके अलावे हमारे साथ काम करने वाले तमाम सहयोगी इस खबर को लेकर मेरे साथ खड़े रहे। इस खबर को लेकर कोई भी अपडेट आता तो पूरी टीम हरकत में आ जाती थी। इस लड़ाई में रवीश जी, पटना हाईकोर्ट की अधिवक्ता समा सिन्हा और सुप्रीम कोर्ट की वकील फौजिया शकील के योगदान को भी भुला नहीं जा सकता। रवीश जी ने जब खबर दिखानी शुरू की तो राष्ट्रीय मीडिया भी हरकत में आयी।

समा सिन्हा बिना किसी फीस के पटना हाईकोर्ट में बच्चियों के साथ खड़ी रहीं। वहीं, फौजिया शकील सुप्रीम कोर्ट में मोर्चा संभाले रहीं। इस दौरान उन्हें काफी नुकसान उठाना पड़ा। फौजिया के पति बिहार सरकार के सुप्रीम कोर्ट में वकील थे। जब इस केस से हटने के लिए फौजिया शकील पर दबाव डाला जाने लगा तो इनके पति ने त्यागपत्र दे दिया। एक दौर ऐसा भी आया जब लगा कि कोर्ट ही सरकार और अभियुक्त के साथ खड़ी है। उस वक्त समा सिन्हा के योगदान को कैसे भुला जा सकता था। कोर्ट में कोई आवेदन करने को तैयार नहीं था। एक को मैं तैयार भी किया तो बीच में ही छोड़ कर भागने लगा। फिर समा सिन्हा ने अपने जूनियर को आवेदक बना दिया।

इतना ख़ौफ़ था ब्रजेश ठाकुर को लेकर कि जिसने भी सहयोग के लिए हाथ बढ़ाया, तीसरे दिन से उसका मोबाइल ही स्वीच ऑफ आने लगता था। फिर भी बहुत सारे अनाम लोगों का साथ मिला, जो सिर्फ एक सूचना देने के लिए कभी चिट्ठी का सहारा लेते थे तो कभी किसी के मोबाइल फोन का। बस ये जानकारी आपको दे रहे हैं सर। मेरा नाम नहीं आना चाहिए। इसी तरह एक बड़ी सूचना किसी रिक्शेवाले ने मुझे मोकामा स्टेशन से फोन करके आधी रात को दी थी। सर, बालिकागृह वाली लड़की को भगा दिया सब मिलकर।

गुरु तेगबहादूर अस्पताल की उस नर्स और उस महिला डॉक्टर को मैं कैसे भूल सकता हूं जो रिपोर्ट दिखा दी कि देखिए, लड़की गर्भवती है। आप खबर चलाइए। इन बच्चियों के साथ दरींदो ने बहुत बुरा किया है। मुज़फ़्फ़रपुर पुलिस की उस महिला अधिकारी को कैसे भूल सकते हैं, जिन्होंने रात के दस बजे गार्डिनर अस्पताल से फोनकर बताया था कि-संतोषजी, चार घंटे से हमलोग यहां आए हुए हैं। बच्चियों की जांच डॉक्टर नहीं कर रहे हैं। फिर मैं कैसे रात में अकेले अस्पताल पहुंच गया था। अभी भी सोचता हूं तो कांप उठता हूं। अस्पताल के चारों ओर ब्रजेश ठाकुर के गुर्गे खड़े थे। कुछ तो लड़कियों को प्रलोभन भी दे रहे थे। उसी दौरान इस पूरे मामले की सबसे मजबूत गवाह और पीड़िता घोष से मेरी आमने-सामने मुलाकात हो गयी जो ब्रजेश ठाकुर के सारे खेल को परत-दर-परत खोलकर रख दी।

मिलते ही वो लड़की कहती है- आप ही वो पत्रकार हैं। कुछ नहीं होगा, ब्रजेशवा बहुत उंची चीज है। मैंने पूछा, तुम इसके पास कैसे आ गयी। अरे ये मुझे सोनागाछी से खरीद कर लाया था। मेरी दो सहेली को ये सालों ने मार दिया। वो सामने रोड पर देख रहे हैं, सब उसके गुर्गे हैं। बस चले तो मुझे भी खत्म कर देगा, क्योंकि उसे पता है मैं छोड़ने वाली नहीं हूं।

हाल में जब मैं दिल्ली गया था तो उस दिन किसी वजह से सुनवाई नहीं हो पायी थी। कोर्ट में ही इस केस से जुड़े वकील से भेंट हो गयी। उनका पहला सवाल था, आप हो संतोष सिंह। आप से कुछ बाते करनी है। कोर्ट के बाद आइए, साथ खाना खाते हैं। मिलने तो गए थे एक घंटे के लिए, लेकिन चार घंटे साथ रह गए।

उन वकील साहब का कहना था कि संतोष जी, आपको लगता है कि ब्रजेश ठाकुर बालिकागृह में रहने वाली गूंगी, बहरी, पगली लड़की के साथ रेप करता होगा। देखने में भी ऐसी है कि किसी के यहां इन लड़कियों को भेजा जाए। मैंने कहा- आप सही कह रहे हैं। मेरा भी मानना है कि ऐसा ब्रजेश ठाकुर खुद नहीं करता हो, लेकिन घोष से आप मिले हैं। जैसे ही मैंने घोष का नाम लिया, वकील साहब का चेहरा ही उड़ गया। कहा आपका निशाना एकदम सही जगह लगा है। वो हमलोगों से बात ही नहीं करती है। एक वही है जिसे कहीं भेजा भी जा सकता है या फिर उसके साथ कोई रिश्ता भी बना सकता है। वकील साहब उससे बात करिए, पूरा खेल समझ में आ जाएगा।

खैर, अब तो सजा हो गयी है। फिर भी बहुत सारे ऐसे रसूखदार लोग हैं जिन्हें सिस्टम ने बचा लिया। लेकिन, अभी भी उम्मीद खत्म नहीं हुई है क्योंकि खेल अभी बाकी है। सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई भले ही क्लोजर रिपोर्ट सौंप दी है, लेकिन फिर भी कुछ संभावनाएं बची हुई है।

साभार- https://www.kashishnews.com/ से

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