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खेत की उपयोगिता में ट्रैक्टर की जगह लेने में सक्षम हैं पावर टिलर

भारतीय किसानों को ट्रैक्टर के बजाय पावर टिलर (बिजली चालित हल) जो वास्तव में मिनी ट्रैक्टर होते हैं, को प्राथमिकता देनी चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि करीब 85 फीसदी भारतीय किसानों की जोत दो हेक्टेयर से भी छोटे आकार की है। जापान में जहां खेतों का औसत आकार छोटा होता है, वहां बिजली से चलने वाले हल धान की खेती में बहुत बड़ा सहारा हैं। लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। हमारे यहां छोटे और सीमांत किसान भी ट्रैक्टर खरीदना या किराये पर लेना पसंद करते हैं जबकि उनके लिए पावर टिलर कहीं अधिक उपयोगी साबित हो सकते हैं। ट्रैक्टरों का सालाना बाजार जहां करीब 600,000 की संख्या में है वहीं पावर टिलर की बिक्री 60,000 तक सीमित है। इसमें भी देश के दक्षिणी तथा पूर्वोत्तर राज्यों का अच्छा खासा योगदान है। 

पावर टिलर की किसानों के बीच अलोकप्रियता की अहम वजह यह है कि एक व्यक्ति को इसके पीछे खड़े होकर इसे दिशा देनी होती है। एक तो यह काम निहायत नीरस है, दूसरा अगर इस काम के दौरान संबंधित व्यक्ति पावर टिलर के घूमने वाले हिस्सों मसलन ब्लेड आदि के संपर्क में आ जाता है तो उसके लिए जोखिम हो सकता है। बहरहाल इस खामी से निजात पाने का एक नया तरीका खोज निकाला गया है। रोबोटिक्स में विशेषज्ञता रखने वाले मंगलूरु के एक इंजीनियर प्राज्वल वी कुमार ने एक रिमोट कंट्रोल सिस्टम बनाया है जिसकी मदद से इस मशीन को सुरक्षित दूरी से नियंत्रित किया जा सकता है। यहां तक कि खेत के बाहर से भी। इस दौरान मशीन के पीछे-पीछे चलने की जरूरत भी नहीं पड़ती। इलेक्ट्रॉनिक और मैकेनिकल रिमोट कंट्रोल किट को विभिन्न कंपनियों के पावर टिलर से जोड़ा जा सकता है। इससे मशीन का सुरक्षित परिचालन सुनिश्चित होता है और चलाने वाले के किसी भी तरह इसके संपर्क में आने की आशंका समाप्त हो जाती है। इस उपकरण में कुछ अन्य सुरक्षा उपाय भी शामिल हैं। मसलन अगर मशीन रिमोट के दायरे से बाहर जाती है तो वह स्वत: बंद हो जाएगी। या फिर किसी भी इलेक्ट्रिकल अथवा मैकेनिकल खराबी की स्थिति में भी वह बंद हो जाएगी। कुमार ने इस तकनीक का पेटेंट भी हासिल कर लिया है।

बहरहाल, कई पावर टिलर निर्माता कंपनियां इस उपकरण को अपनी मशीन से जोडऩे को लेकर बहुत अधिक उत्सुक नहीं हैं। कुमार कहते हैं, 'अधिकांश कंपनियां छोटे ट्रैक्टर भी बनाती हैं और उनको डर है कि रिमोट कंट्रोल वाले पावर टिलर बाजार में लाने से उनके ट्रैक्टरों की बिक्री पर बुरा असर पड़ेगा।' ऐसे में उन्होंने मंगलूरु रोबोनॉटिक्स प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी की सह-स्थापना की ताकि ऐसे रिमोट किट तैयार किए जा सकें। किसान इनको अलग से खरीद कर पावर टिलर में लगा सकते हैं। गत वर्ष कुमार को टाइफेक (टेक्रॉलाजी इन्फॉर्मेशन फोरकॉस्टिंग ऐंड असेसमेंट काउंसिल) की ओर से बिक्री योग्य पेटेंट तैयार करने के लिए राष्टï्रीय पुरस्कार भी दिया गया। टाइफेक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की ही एक शाखा है। उनको अपने इस अविष्कार के लिए कुछ और पुरस्कार भी मिले हैं।

यह भी मानना होगा कि छोटे खेतों के लिए भी ट्रैक्टर पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हैं क्योंकि कुछ खास परिस्थितियों में उनकी जरूरत पड़ सकती है। लेकिन खेती के रोजमर्रा के कामकाज केलिए पावर टिलर कई मायनों में ट्रैक्टर से बेहतर हैं। कीमत के लिहाज से देखें तो पावर टिलर काफी सस्ता है और वह काम के मुकाबले में भी छोटे ट्रैक्टर से किफायती होता है। ऐसा तब है जब सरकार ने पावर टिलर पर कोई खास सब्सिडी नहीं दे रखी। यह छोटे ट्रैक्टर की तुलना में डीजल की खपत भी कम करता है। यह बात भी किसान की लागत में बहुत अधिक बचत करती है। हालांकि एक समान काम करने के लिए पावर टिलर अधिक वक्त लेता है बजाय कि छोटे ट्रैक्टर के। पावर टिलर में प्रति घंटे औसतन 1.25 से 1.5 लीटर डीजल की खपत होती है जबकि छोटे ट्रैक्टर में यह 2.0 से 2.5 लीटर के करीब बैठती है। इसके अलावा पावर टिलर की मरम्मत का खर्च भी ट्रैक्टर की तुलना में काफी कम है। इतना ही नहीं अन्य इस्तेमाल की बात करें तो उस मामले में भी पावर टिलर अधिक किफायती पड़ता है। इसमें पानी के पंप और थ्रेशर मशीन चलाने जैसे काम शामिल हैं। 

परिचालन किफायत की बात करें तो पावर टिलर यहां कई मायनों में छोटे ट्रैक्टर पर भारी पड़ता है। छोटे और बंटे हुए खेतों में इसका इस्तेमाल करना आसान है जबकि वहां ट्रैक्टर आसानी से नहीं चल सकता। ट्रैक्टर के भार से जहां मिट्टïी के दब जाने की आशंका होती है वहीं इस मामले में भी पावर टिलर अधिक उपयोगी साबित होता है। सबसे अहम बात यह है कि घुमावदार और पहाड़ी इलाकों में जहां सीढ़ीदार खेती का प्रचलन है वहां पावर टिलर ही इकलौती मशीन है जो काम कर सकती है। इन लाभों को रिमोट परिचालन के लाभ के साथ मिलाकर देखा जाए तो उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्दी ही पावर टिलर को देश के कृषि जगत में अपना दर्जा हासिल होगा।

साभार- बिज़़नेस स्टैंडर्ड से 

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