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आप टैक्स बचा रहे हैं कि अपनी कमाई लुटा रहे हैं…?

अगर आप टैक्स सेविंग के तरीकों पर विचार कर रहे हैं तो ऐसा प्लान आपके लिए कैसा रहेगा, जिससे टैक्स सेविंग्स भी हों, नियमित अंतराल पर टैक्स फ्री इनकम मिले और मैच्योरिटी पर एकमुश्त रकम भी हासिल हो? साथ ही, लाइफ कवर भी मिल जाए। अगर 35 साल का कोई व्यक्ति हर साल 65000 रुपये का निवेश 20 साल तक करता रहे तो उसे चौथे, आठवें, बारहवें और सोलहवें साल के अंत में 1.5 लाख रुपये की चार किस्तें मिलेंगी। साथ ही, उसे 20 साल पूरे होने पर करीब 5 लाख रुपये भी हासिल होंगे। इन गारंटीड पेमेंट्स के अलावा उसे करीब 3.8 लाख रुपये का एक बोनस भी मिलेगा। अगर इस प्लान की अवधि में उसका निधन हो जाए तो उसके नॉमिनी को 10 लाख रुपये दिए जाएंगे।

कैसा लगा? शानदार? पहली नजर में किसी भी बड़ी बीमा कंपनी के मनी बैक प्लान लुभावने दिखते ही हैं। हालांकि इन आंकड़ों की हकीकत खंगालने पर असल पिक्चर सामने आती है। हमने पाया कि इस प्लान में इंटरनल रेट ऑफ रिटर्न महज 2.23 प्रतिशत है। यह तो सेविंग्स बैंक एकाउंट पर मिलने वाले रिटर्न से भी कम है।

बीमा कंपनियां दलील देती हैं कि इंश्योरेंस प्लान के साथ लाइफ कवर भी तो होता है, लिहाजा रिटर्न पर असर पड़ना लाजमी है। यह दलील ठीक है। लिहाजा हमने दिए जाने वाले प्रीमियम को घटाकर लाइफ कवर की कॉस्ट निकाली। 10 लाख रुपये के टर्म कवर की लागत करीब 3000 रुपये है। अगर हम लाइफ इंश्योरेंस कवर की कॉस्ट शामिल कर लें तो भी इस पॉलिसी से रिटर्न 2.79 प्रतिशत ही रहता है।

क्या आप ऐसे प्लान में निवेश करेंगे, जिससे 3 प्रतिशत से भी कम रिटर्न मिलने वाला हो? कम रिटर्न के बावजूद हर साल टैक्स प्लानिंग सीजन में लाखों मनी-बैक पॉलिसी और एंडोमेंट प्लान बेच ही दिए जाते हैं। इसकी वजह यह है कि सामान्य निवेशक के पास न तो पॉलिसी की डीटेल्स समझने का समय है और न ही उसका इसमें मन लगता है। इसका नतीजा यह होता है कि बाद में बीमा कंपनी के खिलाफ शिकायतें की जाती है। इंश्योरेंस ऑम्बड्समैन के पास आने वाली शिकायतों में अधिकतर यही होती हैं कि निवेशक को गुमराह कर पॉलिसी बेच दी गई।

आइए हम वेल्थ मैनेजरों और बैंक अधिकारियों की उन चालबाजियों पर एक नजर डालें, जिनके जरिए वे टैक्सपेयर्स को अनपयुक्त निवेश में फंसा देते हैं।

यूलिप बनाम ELSS
अगर आप बैंक एग्जिक्यूटिव्स से टैक्स सेविंग का तरीका पूछें तो यूलिप के बारे में उनमें से कई बताएंगे कि ‘यह तो ईएलएसएस फंड की ही तरह होता है, लेकिन इसमें लाइफ इंश्योरेंस कवर भी मिलता है।’ हालांकि वे यह बात छिपा ले जाते हैं कि लाइफ कवर मुफ्त नहीं है और इसके लिए आपसे चार्ज लिया जाएगा।

हाल के वर्षों में इक्विटी इन्वेस्टमेंट के बारे में निवेशकों की समझ बढ़ी है, लेकिन अगर आप कोई ईएलएसएस फंड खरीदेंगे तो बैंक को बहुत कम कमीशन मिलेगा। लिहाजा वे आपको म्यूचुअल फंड के साथ फ्री इंश्योरेंस कवर का लालच देते हैं। हालांकि यूलिप से भी बहुत ज्यादा कमीशन नहीं मिल सकता क्योंकि चार्जेज की हदबंदी कर दी गई है, लेकिन इस प्लान में कई साल का कमिटमेंट होता है। आप चाहें या न चाहें, आपको लंबी अवधि के लिए इसमें निवेश बनाए ही रखना होगा। कुछ साल बाद अगर आप एग्जिट करें तो आपको सरेंडर चार्ज देना होगा। यूलिप के साथ दूसरी प्रॉब्लम यह है कि आपको किसी टैक्स सेविंग म्यूचुअल फंड जैसी फ्लेक्सिबिलिटी और चॉइस इसमें नहीं मिलेगी। ईएलएसएस फंड के निवेशक को मजबूरन लंबी अवधि तक निवेश नहीं बनाए रखना होता है और स्कीम मैच्योर होने पर जरूरी नहीं होता कि वह रकम निकाल लें।

सबसे ज्यादा इनकम टैक्स देनेवाले राज्यों की लिस्ट में महाराष्ट्र टॉप पर है। अकेले इस राज्य का योगदान लिस्ट में शामिल अगले चार राज्यों के कुल योगदान से ज्यादा है। वहीं, महाराष्ट्र के साथ दिल्ली मिलकर देश का आधा इनकम टैक्स देते हैं। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) की ओर से जारी इनकम टैक्स के आंकड़ों से इसका खुलासा हुआ है।

इस खुलासे से इस बात के भी संकेत मिलते हैं कि जिस राज्य में जितनी ज्यादा कंपनियां हैं, वहां से सबसे ज्यादा टैक्स कलेक्शन होता है। सीबीडीटी के आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2017-18 में इनकम टैक्स कलेक्शन में वृद्धि के लिहाज से पूर्वोत्तर के राज्यों ने शेष भारत पर बाजी मारी है। इन सबके अलावा, इनकम टैक्स को लेकर अन्य कई दिलचस्प तथ्य भी सामने आए हैं। आइए इनपर डालते हैं एक नजर…

सबसे ज्यादा रिटर्न में ₹5 लाख तक की आय घोषित की जाती है और इसी वर्ग से सबसे ज्यादा टैक्स कलेक्शन भी होता है। 2 करोड़ इंडिविजुअल्स रिटर्न फाइल करते हैं, लेकिन एक रुपया भी टैक्स नहीं देते। 2 करोड़ लोग टैक्स देते हैं, लेकिन रिटर्न नहीं भरते।

सिर्फ 4 भारतीय ही सालभर में ₹100 करोड़ से ज्यादा का इनकम टैक्स भरते हैं। 93% इंडिविजुअल टैक्सपेयर्स सालाना ₹1.5 लाख से कम इनकम टैक्स देते हैं। वित्त वर्ष 2013-14 से 2017-18 तक के चार सालों में फाइल किए गए इनकम टैक्स रिटर्न्स की संख्या 3.31 करोड़ से 80% बढ़कर 6.85 करोड़ हो गई।

2014-15 से 2017-18 के बीच ₹1 करोड़ से ज्यादा की आय घोषित करने वाले कुल करदाताओं की संख्या 60% बढ़ गई है। इनमें कंपनियां, छोटे-छोटे फर्म्स, हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) सभी प्रकार के करदाता शामिल हैं। ₹1 करोड़ से ज्यादा की आय घोषित करने वाले इंडिविजुअल टैक्सपेयर्स की संख्या चार साल में 68% बढ़ी है।

महाराष्ट्र और दिल्ली का योगदान पहले के मुकाबले घट रहा है जबकि कर्नाटक, तमिलनाडु और गुजरात की हिस्सेदारी बढ़ रही है।

बड़े राज्यों में राजस्थान ऐसा प्रदेश है जहां टैक्स कलेक्शन सात वर्षों में तीन गुना से ज्यादा बढ़ा है।

सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश इनकम टैक्स कलेक्शन में सिर्फ 2.3% का योगदान करता है।

दरअसल यूलिप ईएलएसएस फंड की तरह फ्लेक्सिबल नहीं होते। इनमें पांच साल का लॉक-इन होता है। सरेंडर चार्ज की एक लिमिट तय की गई है, इसके बावजूद इन प्लान को तय वक्त से पहले बंद करने पर आपको काफी पेमेंट करना पड़ जाता है।

प्रॉडक्ट कंपनी का या बैंक का?
बैंक, खासतौर से सरकारी कंपनियों पर निवेशक काफी भरोसा करते हैं। इस भरोसे का फायदा उठाना इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूटर्स से बेहतर और कौन जानता है? साल के इसी समय के आसपास कस्टमर्स पर ऐसे आकर्षक सेविंग्स प्लान की जानकारी देने वाले एसएमएस की बमबारी होती है, जिनसे टैक्स सेविंग की जा सकती हो। इन मेसेज से ऐस लगता है कि संबंधित प्लान को किसी बैंक ने लॉन्च किया है, भले ही यह एक इंश्योरेंस पॉलिसी हो, जिसमें बैंक प्रमोटर के रोल में हो। वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि कुछ कस्टमर इंश्योरेंस प्लान का नाम सुनकर सतर्क हो जो हैं, लेकिन अपने बैंक की किसी स्कीम में खुशी-खुशी निवेश कर देते हैं। खासतौर से छोटे शहरों और कस्बाई इलाकों में ऐसे प्लान को यही कहकर पुश किया जाता है कि ‘इसे तो बैंक ने लॉन्च किया है, लिहाजा यह सुरक्षित और भरोसेमंद है।’

हालांकि यह बात छिपा ली जाती है कि यह किसी कंपनी की लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी है, जिसे बैंक प्रमोट कर रहा है। ईटी मनी के सीईओ मुकेश कालरा ने कहा, ‘यह बायर को गुमराह करने वाली हरकत है। यह बैंकों पर उनके भरोसे का बेजा फायदा उठाने वाली बात है।’ अधिकतर मामलों में बायर को अपने फंस चुकने का पता तब चलता है, जब पॉलिसी चालू हो जाती है और फिर बड़ा नुकसान उठाए बिना उसे बंद नहीं किया जा सकता।

FD बनाम एंडोमेंट पॉलिसी
अधिकतर टैक्सपेयर्स, खासतौर से सीनियर सिटीजन अपना पैसा लॉन्ग टर्म के लिए लॉक नहीं करना चाहते। वे टैक्स सेविंग फिक्स्ड डिपॉजिट्स पसंद करते हैं क्योंकि ये सेफ होते हैं और लॉक-इन पीरियड भी पांच साल का ही होता है। हालांकि टैक्स सेविंग डिपॉजिट्स से मिलने वाला इंटरेस्ट संबंधित निवेशक पर लागू होने वाले मार्जिनल रेट के हिसाब से पूरी तरह टैक्सेबल होता है। 30 प्रतिशत टैक्स ब्रैकेट वालों के लिए तो टैक्स काटकर रिटर्न करीब 5 प्रतिशत ही बचता है। रिलेशनशिप मैनेजर फिक्स्ड डिपॉजिट्स की इस खामी को देखते हुए टैक्सपेयर्स के सामने ‘टैक्स फ्री रिटर्न’ वाला इन्वेस्टमेंट ऑप्शन पेश करते हैं। यह दरअसल एक एंडोमेंट इंश्योरेंस प्लान होता है।

टैक्सपेयर को बताया जाता है कि वह फिक्स्ड डिपॉजिट में निवेश कर रहा है, जबकि वह फंस जाता है कि मल्टी-इयर प्रीमियम कमिटमेंट में। सबसे बुरी मार पड़ती है उम्रदराज टैक्सपेयर्स पर, जिनके पास हर साल प्रीमियम चुकाने लायक कैश नहीं होता। एक समय तो यह सीनियर सिटीजंस के लिए बहुत बड़ी समस्या बन गई थी। बाद में इंश्योरेंस रेगुलेटर ने नियम बदले। अब कई एंडोमेंट पॉलिसी के लिए निवेशक की अपर एज लिमिट 50 साल कर दी गई है। दरअसल एंडोमेंट पॉलिसी से बहुत कम रिटर्न मिलता है, इसमें कई साल तक प्रीमियम देना होता है और इसमें सरेंडर चार्ज काफी ज्यादा होता है।

पेंशन प्लान बनाम NPS
अगर आप किसी बैंक एग्जिक्यूटिव से एनपीएस के बारे में पूछें तो वह कह सकता है कि ‘एनपीएस में निवेश करने में कई झमेले हैं। इससे बेहतर तो पेंशन प्लान है।’ दरअसल वह इस बात को छिपा ले जाता है कि बीमा कंपनियों के पेंशन प्लान में एनपीएस के मुकाबले कहीं ज्यादा चार्ज देना पड़ता है। एनपीएस को आम लोगों के लिए पेश किए हुए दस साल हो गए हैं, लेकिन वेल्थ मैनेजरों और बैंकों के रिलेशनशिप मैनेजरों को अब भी बहुत कम जानकारी है कि एनपीएस काम कैसे करता है और इसमें किस तरह निवेश शुरू किया जाता है। अगर उन्हें प्रोसेस पता हो तो भी वे कम लागत वाले एनपीएस को प्रमोट नहीं करना चाहते।

इसके बजाय अधिकतर बैंक एग्जिक्यूटिव्स बीमा कंपनियों के पेंशन प्लान पर जोर देते हैं। इन रेगुलर पेंशन प्लान की कॉस्ट एनपीएस में आपके निवेश की कॉस्ट से काफी ज्यादा होती है। इनके ऑनलाइन वर्जन के चार्ज भी एनपीएस फंड्स से ज्यादा होते हैं। पेंशन प्लान से एग्जिट करना आसान नहीं होता। लॉक-इन पीरियड होता है। आपको सरेंडर चार्ज देना पड़ सकता है।

ELSS में SIP बनाम एकमुश्त निवेश
ईएलएसएस फंड्स निश्चित रूप से टैक्स बचाने का एक बेहतरीन जरिया हैं। सेक्शन 80सी के तहत टैक्स सेविंग के अलावा टैक्सपेयर इन इक्विटी फंड में निवेश कर वेल्थ भी बनाता है। ईएलएसएस कैटेगरी ने पिछले पांच वर्षों में 16.5 प्रतिशत का सालाना रिटर्न दिया है। दस साल का एनुअलाइज्ड रिटर्न तो 17.5 प्रतिशत पर है। हालांकि डिस्ट्रीब्यूटर्स आपको यह तो बताते हैं कि ‘ईएलएसएस में निवेश कर टैक्स बचाएं और शेयर बाजार में तेजी का फायदा भी उठाएं’ लेकिन वे यह नहीं बताते कि ‘ईएलएसएस फंड्स मार्केट लिंक्ड होते हैं, लिहाजा एक बार में बड़ी रकम का निवेश नहीं किया जाना चाहिए।’ इसके साथ ही यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि इक्विटी फंड्स में एक बार में बड़ी रकम का निवेश नहीं करना चाहिए।

सबसे अच्छा तरीका यह है कि फाइनैंशल इयर की शुरुआत में 5000-10000 रुपये का एसआईपी शुरू करें ताकि बाजार में उतार-चढ़ाव का अच्छा फायदा मिल सके। मायमनीमंत्रा के एमडी राज खोसला ने कहा, ‘एसआईपी डायवर्सिफिकेशन का एक तरीका है। इसमें निवेश एक अवधि में बंट जाता है, जिससे रिस्क घटता है।’ लेकिन अगर आप टैक्स सेविंग ऑप्शन के बारे में पूछे तो वेल्थ मैनेजर आपको यह बात नहीं बताएंगे। इसके बजाय वे कोशिश करेंगे कि आप एक बार में ही निवेश कर दें ताकि बाद में आप निवेश रोक न सकें या 3-4 एसआईपी के बाद फंड न बदल सकें।

साभार- इकॉनामिक्स टाईम्स से



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