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हाशिये की जिंदगी को व्यथा से व्यवस्था देना मानवता का श्रृंगार है – डॉ. चन्द्रकुमार जैन

राजनांदगांव। दिग्विजय कालेज के हिंदी विभाग के प्राध्यापक डॉ. चंद्रकुमार जैन ने कहा है कि इक्कीसवीं सदी विमर्शों की सदी है, जिसका वर्तमान कोरोना विमर्श के दौर से गुजर रहा है। साहित्य के क्षेत्र में भी नए विमर्शों का प्रचलन बढ़ा है। इस कालखंड में स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, जनजाति विमर्श, विकलांग विमर्श, अंबेडकर सौंदर्यशास्त्री विमर्श, मीडिया विमर्श जैसे विमर्शों का सिलसिला चल पड़ा है। किन्नर विमर्श इसी श्रृंखला एक महत्वपूर्ण कड़ी है। मानव, मानवता तथा मानव अधिकार पर विश्वास रखने वाले, इस विमर्श को एक मानवीय दायित्व के रूप में देखते हैं। हमारे नज़रिये की नकारात्मकता का वायरस मानवता के लॉकडाउन की वजह ना बने तो ऐसे विमर्शों में ईमानदारी बनी रहेगी।

राजस्थान के श्रीगंगानगर स्थित टांटिया विश्वविद्यालय द्वारा किन्नर विमर्श – इतिहास, समाज, साहित्य के सन्दर्भ में विषय पर आयोजित बहुअनुशासनिक अंतरराष्ट्रीय सेमीनार में शोधपरक भागीदारी करते हुए डॉ. जैन ने कहा कि अब तक तीसरी दुनिया पर तो बहुत चर्चा हुई किन्तु ट्रांस जेंडर के तीसरे संसार की अक्सर उपेक्षा की गयी है। किन्नरों या वृहन्नलाओं के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण का अभाव रहा है। उनकी ज़िंदगी की उलझनों से समाज प्रायः बेखबर है। मुखौटों वाली समीक्षा उनके दुःख दर्द व वेदना का वास्तविक चेहरा न दिखा सकी। सकारात्मक सोच के आभाव ने किन्नर विमर्श को भी उनकी जिन्दगियों की तरह हाशिए में डाल दिया। लेकिन, गौरतलब है कि आज एलजीबीटी यानी लैसबियन, गे, बॉयसेक्सुअल, थर्ड जेंडर के अधिकारों की चर्चा खूब होने लगी है।

डॉ. जैन ने कहा कि किन्नर जीवन की दशा, व्यथा व दिशा को लेकर दुनिया अब नयी अंगड़ाई ले चुकी है। मुख्य धारा में शामिल होने की इसकी बेचैनी अब पीछे मुड़कर देखने तैयार नहीं है। अनेक शोधग्रन्थों, यात्रा-पुस्तकों, संस्मरणों, आत्मकथाओं, आलेखों, गीतों और कविताओं में किन्नर देश और किन्नौर में रहने वाली किन्नर जनजाति का उल्लेख किया गया है। उनके संघर्षों और उनकी आवाज़ की वाणी दी गयी है। इनमें हिमाचल के विद्वान और देश-विदेश के लेखक भी हैं।

डॉ. जैन ने कहा कि प्रख्यात लेखक भी यह मानते हैं कि मनुष्य के जीवन में रिश्ते नाते बहुत महत्त्व रखते हैं। किन्नर हो या साधारण बच्चा सभी रिश्तों के लिए तड़पते हैं। ऎसी स्थिति में उस बच्चे को घर से बेघर कर दिया जाए और दर-दर भटकने के लिए छोड़ दिया जाए तो वह आतंकित होगा ही और दूसरों को भी आतंकित करेगा। ‘जेनेटिक डिफेक्ट’ के कारण यदि कोई बच्चा किन्नर रूप में पैदा होता है तो इसमें उसका क्या दोष ! उसे भी तो जीने का अधिकार है। आज कुछ किन्नर पढ़-लिखकर अपने पांवों पर खड़े हो रहे हैं, साथ ही दूसरों को भी राह दिखा रहे हैं। वे भी हर क्षेत्र में सक्रिय हो रहे हैं। हाशिया छोड़कर केंद्र में आ रहे हैं। फिर भी इस समाज को उन्हें अपनाने में वक्त लगेगा। डॉ. जैन ने कहा कि वक्त की यही दूरी किन्नरों के प्रति संजीदा होकर सोचने का आह्वान कर रही है।

डॉ. जैन ने कहा कि अपने मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ते इन आनुवंशिक दिव्यांगों की खबर अब लेनी ही होगी। ये तिरस्कार के पात्र हैं, ऐसा तय करने का हक आखिर समाज को किसने दिया है ? इस पर समाज को ही तटस्थ भाव से सोचना होगा। घर के मांगलिक प्रसंगों में जिनकी उपस्थिति और सहभागिता से हम परहेज नहीं करते हैं उनका अपना जीवन अमंगलमय कैसे रह सकता है ? व्यथा के स्थान पर उनकी उनके जीवन को व्यवस्था देने की जिम्मेदारी समाज की है।

डॉ. जैन ने कहा कि किन्नर विमर्श और उनकी जिंदगी को लेकर जवाबदार व्यवहार दरअसल दायित्वबोध का ही सवाल है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि अब समय बदल गया है। ट्रांस जेंडर को अब कानूनी पहचान मिल चुकी है। जो अपने जीवन के आप मालिक बनने के लिए संघर्षरत हैं उनके जीवन को शाप समझने का कोई अधिकार किसी का नहीं हो सकता है। किन्नरों के प्रति संवेदनशील और मानवीय रवैया अपनाने की सख्त जरूरत है।
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