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अरबों का प्राचीन धर्म और इस्लाम का आगमन

अरबी लोग भारतीयों जैसे ही विविधतावादी थे. वे अनेक देवी-देवताओं को मानते थे. उनके प्राचीन धर्म और देवी-देवताओ के बारे मे जानने के लिए यह लेख अवश्य पढ़ें।

अल-लाह
अल्लाह कुरैश कबिले का देवता है. काबा में अनेक देवताओं की मूर्ति थी, जिसमे अल-लाह की मूर्ति भी प्रमुख थी. पैगम्बर भी कुरेश कबिले के थे. उनके के दादा (grand father) का नाम अब्द-अल्लाह (अब्दुल्लाह) था. अल्लाह यह अरबो में चर्चित नाम था. (Anwar Shaikh’s book-Islam Arab Imperilism). कुछ मुस्लिमों का यह मानना है कि यहूदी देवता यहोवा का अरबी नाम अल-लाह है. यहोवा को अरबी में इलोहा …इलाह…लाह इसतरह उच्चारण हुआ और उसे अल जोड़कर अल-लाह कहा गया.


हूबल देवता

अरबी लोग हूबल नाम के देवता को मानते थे. काबा में जो काला-पत्थर है वह इसी देवता का है. इस पत्थर को चूमने का रिवाज था. चाँदतारा भी इसी देवता का प्रतिक है. यह देवता अरबों को तिथियों की जानकारी देता था. इस देवता को इंग्लिश लेखक “Moon-God”(अर्थात सोम-देव/चन्द्र-देव) कहते है. अरबी मुर्तिपुजक मक्का के काबा मंदिर को सात फेरे लगाते थे, अपना सिर मुंडवाते थे, पुजारियों जैसे दो वस्त्र पहनते थे, झम-झम कुए का पानी साथ लेके आते थे. यह प्रथा आज भी कायम है.

तीन देवियाँ
अरबी मूर्तिपूजक तीन देविया- अल-उज्जा, अल-मनात और अल-लात को मानते थे. इनका उल्लेख कुरान 53-19 में भी है. इन देवियों के मंदिर मक्का के आसपास के पहाड़ियों पर थे. अरबी लोग इनकी पूजा करते थे. और जिस पहाड़ियों पर जाके इनके दर्शन करते थे, उत्सव मानते थे.

बैल या नंदी बैल
अरबी मूर्तिपूजक बैल की पूजा भी करते थे. उसे कुरान (सूरा 2) में उपहासात्मक ‘गाय का बछडा’ या ‘अल-बकरा’ (Heifer) कहा गया है. जैसे किसान साल में एकबार अपने खेत में काम करनेवाले बैल को धन्यवाद देकर (Thanks giving) उसकी पूजा (सन्मान) करते है.

अरबियों के करीब 256 काबिले थे, आज भी है. वे अनेक देवी-देवताओं को मानते थे. उनकी किताब हदीस (जिसका अर्थ है ‘कही-सुनी बातें’) में भी लिखा है कि अरबी लोग मूर्तिपूजक थे, काबा-मंदिर में 360 मुर्तिया थी. कुरान 8-35 में भी लिखा है की ‘अरबी लोग काबा में तालिया बजाकर आराधना करते थे.’

इथिओपिया के ईसाई बादशाह ने मक्का का मंदिर तोड़ने के लिए हाथियों की फौज भेजी थी. (कुरआन सूरा “हाथी” में घटना वर्णन है, जिसमे कहा गया है कि अल-लाह ने मक्का को हथिवालों से बचाया) वास्तव में मक्का के रेगिस्तान में हाथी चल नहीं सकते इसीवजह से ये हाथीवाले हार गए, इसके साथ ही अरबी मूर्तिपूजको ने ईसाईयों का जोरदार मुकाबला किया था.

इस्लाम का आगमन
मक्का और यात्रिब (मदीना का पुराना नाम) में ईसाई और यहूदी लोग भी रहते थे. ये अरबों की मूर्तिपूजा का विरोध करते थे. इसमें एक यहदी कबीला था जिसका नाम था इश्मायली-कबीला. इस काबिले को यहूदियों ने इस्रायल से बेदखल किया था, तब से वह अरबिया में आकर बसा था. ये इश्मायली लोग जेरुसलेम को क़िबला मानकर उसकी तरफ देखकर नमाज पढ़ते थे. वे अपनेआप को हिब्रू भाषा में मुशलाम कहते थे. उनकी किताब तौराह थी. वे पैगम्बर मोजेस को मानते थे. मूर्ति-पूजा का विरोध करते थे. वे खतना करते थे, सूअर से नफ़रत करते थे, गोल टोपी पहनते थे, बुरखा पहनते थे, हलाका (यहूदी कानून) को मानते थे. वे अरबियों की मूर्ति-पूजा का विरोध करते थे जिसके कारण उनमे और अरबियों में हमेशा झगड़े, फसाद होते थे.

ये लोग मदीना के आसपास से गुजरने वाले अरबी व्यापारियों के काफिलों को लुटते थे. लुट का पैसा आपस में बाँटते थे. इस लालच के कारण बहोत सारे अरबी इनके काबिले में सामिल हुए. अपनी संख्या बढाने के लिए उन्होंने इश्मायली काबिले का अरबीकरण किया. इस्लामी कबिले का नाम अरबी में इस्लाम रखा. मुश्लाम को अरबी में मुस्लिम कहना शुरू किया. यहोवा का नाम सुरुवात में रहमान रखा, लेकिन यह नाम भी यहूदी था इसलिए यहोवा का नाम अल-लाह रखा. अबराम/अब्राहम को इब्राहीम, इश्मायल को इस्माइल, मोजेस का नाम मुसा, जीसस का नाम इसा, इतना ही नहीं तो एक अरबी पैगम्बर की बना दिया. तौराह को अरबी में उतारा गया. इसतरह यहूदी मजहब का इश्मायली कबीला अरबस्थान में इस्लाम बन गया. इनमे और मूर्तिपूजक अरबों में कई लढाई झगड़े हुए, संगठित होने के कारण ये जित गए. और असंगठित होने के कारण मूर्तिपूजक अरबी हार गए. पुरे अरबिया में इस्लाम का कब्ज़ा हो गया. अरबी खलीफाओ ने इस्लाम के साथ कई अरबी प्रथाए जोड़ दी, वे आज तक कायम है.

इसके सौ साल बाद, इ.स. 750 में खलीफाओ ने कुरान लिखी, हदीस लिखी और सिरा (biography of Prophet) लिखी.

Ref:-
clearquran.com
wikiislam.net
simpletoremember.com
faithfreedom.org
islamwatch.org
religiontruths.wordpress.com
साभार – https://hindumuslimmatter.wordpress.com/ से

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