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पूरा जीवन खपा कर अरविंद कुमार ने हिन्दी वालों को गुलामी से मुक्ति दी!

कब तक हमारी पीढ़ियाँ विदेशी दृष्टिकोण से बने इंग्लिश कोशोँ का इस्तेमाल करने के लिए विवश होती रहेँगी?
क्रांतिकारी कोशकार अरविंद कुमार की अजब कहानी

बयालीस साल पहले लगी चिंगारी से भड़की ज्वाला अभी तक शांत नहीँ हुई है

समांतर कोश की रचना से भारतीय कोशकारिता मेँ क्रांति लाने वाले अरविंद कुमार का जन्म 17 जनवरी 1930 को मेरठ शहर मेँ वहाँ के प्रख्यात वंश लालावालोँ मेँ हुआ था। उन के पिता लक्ष्मण स्वरूप स्वाधीनता आंदोलनोँ मेँ सक्रिय रहते थे, और माँ रामकली चौथी पास गृहिणी थीँ। अरविंद की आठवीं कक्षा तक की शिक्षादीक्षा मेरठ की म्यूनिस्पल प्राइमरी पाठशाला और वैश्य तथा देवनागरी हाई स्कूलोँ मेँ हुई। काम की तलाश मेँ पिताजी सपरिवार दिल्ली आ गए। तेरह वर्षीय अरविंद का दाख़िला करोलबाग़ मेँ नए खुले श्री गुरुतेग़ बहादुर ख़ालसा हाई स्कूल मेँ मैट्रिक तक पढ़े। पाँच भाई बहनोँ वाले परिवार की कठिन आर्थिक अवस्था मेँ योगदान करने के लिए अप्रैल 1945 मेँ पंदरह-वर्षीय अरविंद नई दिल्ली के प्रसिद्ध दिल्ली प्रैस मेँ छापेख़ाने का काम सीखने के इरादे से बालश्रमिक के तौर पर दाख़िल हुए। धीरे धीरे तरक़्क़ी करते वह डिस्ट्रीब्यूटर से कंपोज़ीटर, कैशियर, टाइपिस्ट, प्रूफ़ रीडर और उपसंपादक बने। लिखने का शौक़ उन्हेँ बचपन से ही था। उन के आरंभिक लेख 1948-49 मेँ दैनिक पत्रोँ मेँ छपे थे। 1963 तक सायंकालीन शिक्षा संस्थानोँ मेँ पढ़ कर वह इंग्लिश साहित्य मेँ ऐमए कर चुके थे और दिल्ली प्रैस से प्रकाशित होने वाली हिंदी सरिता, इंग्लिश कैरेवान तथा अन्य सभी पत्रिकाओँ के प्रभारी संपादक बन गए थे। हिंदी से इंग्लिश मेँ अनुवाद करने मेँ और इंग्लिश लेखोँ का संपादन करते उन्हेँ अकसर बेहतर शब्दोँ की ज़रूरत पड़ती थी। तब उन्हेँ रोजट का इंग्लिश थिसारस मिला – एक के बदले कई शब्द सुझाने वाला अनोखा कोश। अरविंद सोचते कि जल्दी ही कोई विद्वान हिंदी को भी वैसा अनोखा शब्दोँ का ख़ज़ाना देगा।

1963 मेँ टाइम्स आफ़ इंडिया समूह के संचालकोँ ने अरविंद को संपादक का पद देने की पेशकश की – मुंबई से फ़िल्मफ़ेअर जैसी हिंदी माधुरी आरंभ करना। उस के द्वारा अरविंद ने पहली बार किसी फ़िल्म पत्रिका को सामाजिक उद्देश्य दिया और नए उभरते हिंदी कला सिनेमा आंदोलन की मुखपत्रिका भी बना दिया। उस आंदोलन को भारतीय नाम समांतर सिनेमा अरविंद ने ही दिया।
1973 तक वह पत्रकारिता और अपनेआप से ऊब चुके थे। बार मन छटपटाता – मैँ कुछ और करने के लिए पैदा हुआ हूँ। तब 26-27 दिसंबर की रात अरविंद की अंतरात्मा ने पुकारा – वह जो तेरी हिंदी थिसारस की चाह थी, वह तो अभी तक पूरी नहीँ हुई। वह बना और जीवन सकारथ कर! यह थी क्रांति लाने वाली चिंगारी। इससे जो ज्वाला जागी जो अभी तक शांत नहीँ हुई है।
अगली सुबह हैंगिंग गार्डन मेँ सैर पर अरविंद और (पत्नी) कुसुम ने तय कर लिया कि वे अपना भावी जीवन इसी को समर्पित कर देँगे। तय हुआ कि माधुरी छोड़ने और तब दिल्ली वापस जाने का सही समय मार्च-अप्रैल 1978 के आसपास होगा। तब तक काफ़ी बचत हो चुकी होगी पर बच्चोँ की पढ़ाई पर भी बुरा असर नहीँ पड़ेगा।
ऐतिहासिक काम की औपचारिक ढंग से शुरूआत हुई 19 अप्रैल 1976 को नासिक के गोदावरी तट पर। शुरू मेँ स्वयं अरविंद और कुसुम इस काम मेँ लगे, बाद मेँ बड़े होने पर बेटा सुमीत और बेटी मीता भी इस शब्दयज्ञ मेँ सहभागी हो गए, और यह एक गृह उद्यम बन गया। तमाम आपदाओँ के बावजूद अरविंद परिवार की लगन कम नहीँ हुई। कुछ आपदाएँ प्राकृतिक थीँ – जैसे घर मेँ बाढ़ आ जाना (उनके शब्दोँ वाले कार्ड इससे बच निकले), अनेक शारीरिक संकट जैसे दिल का भारी दौरा (सौभाग्य से यह बेटे सुमीत कुमार के अस्पताल मेँ पड़ा और अरविंद को तत्काल सहायता मिल गई), अरविंद को ही पीलिए का प्रकोप (इन दोनोँ के कारण कई मास तक काम नहीँ हो सका). स्थान परिवर्तन की समस्या (माडल टाउन वाला मकान बिक जाने के बाद गाज़ियाबाद की नवविकसित कालोनी मेँ मकान बनवाना), आर्थिक संकट (इससे जूझने के लिए अरविंद ने पाँच साल तक रीडर्स डाइजेस्ट के हिंदी संस्करण सर्वोत्तम का प्रारंभ और संपादन स्वीकार कर लिया – सुबह शाम घर पर थिसारस का काम करते रहे)।

छपाई की उलझनेँ भी कम नहीँ थीँ – साठ हज़ार कार्डों पर भिन्न शब्दकोटियोँ के अनुसार लिखी दो लाख साठ हज़ार अभिव्यक्तियाँ छपेँगी कैसे! छप गईँ तो उन का इंडैक्स बनवाने संसाधन कहाँ से आएँगे? एकमात्र हल सुझाया बेटे डाक्टर सुमीत कुमार ने – सूचना प्रौद्योगिकी – यानी कंप्यूटर। दो लाख साठ हज़ार शब्दोँ को डाटाबेस मेँ टंकित करने मेँ ग्यारह महीने लगे। जितना काम चौदह सालोँ मेँ हुआ था – यानी लगभग इतने ही और शब्द संकलित करना – अब वह कुल तीन साल मेँ पूरा हो गया।
डाटा का मैनिपुलेशन करके आदेश देने पर कंप्यूटर ने डाटा मेँ से चयनित 1,68,000 शब्दोँ का आउटपुट करके समांतर कोश के संदर्भ खंड और अनुक्रम खंड तैयार कर दिए। कुल मिला कर अठारह सौ पेज। प्रकाशक के सामने न कंपोज़िंग की इल्लत, न प्रूफ़ रीडिंग का झंझट! कैमरा वर्क कराओ… और छाप दो। 24-25 सितंबर 1996 को दोनोँ खंडों के प्रिंटआउट नेशनल बुक ट्रस्ट के हवाले किए थे। 13 दिसंबर 1996 की पूर्वाह्न मेँ तत्कालीन राष्ट्रपति डाक्टर शंकरदयाल शर्मा के करकमलों मेँ दोनोँ खंड प्रस्तुत कर दिए गए!

अब एक और सपना जागा – हिंदी शब्दोँ वाले डाटा मेँ इंग्लिश शामिल की जाए, ताकि भारत को अपनी दृष्टि से बने थिसारस शैली के इंग्लिश हिंदी कोश मिल सकेँ। इस के लिए इंग्लिश कोश को ए से ज़ैड तक खँगालने और डाटाबेस मेँ अनेक अभारतीय कोटियोँ को सम्यक् स्थान पर सम्मिलित करने का काम छः सात साल चला।

और सितंबर 2007 में – अरविंद कुमार ने दिया विश्व में रिकार्ड क़ायम करने वाला ग्रंथ द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी। तीन विशाल खंडों वाला इस कोश ने पहली बार संसार की संस्कृतियों को बड़े कुशल ढंग हमारी संस्कृति से जोड़ दिया। यह न केवल यह दोनों भाषाओं के शब्दकोशों का काम देता है, बल्कि वैश्विक संस्कृतियोँ के बीच सेतु भी बन गया। इतने बड़े कैनवस वाला कोई द्विभाषी थिसारस इससे पहले पूरे संसार मेँ नहीं बना था। यह विश्वास करना कठिन हो जाता है कि विश्व में रिकार्ड बनाने वाला ऐसा समृद्ध थिसारस किसी भारतीय ने बनाया है।

अरविंद कुमार का आठवाँ कोश है — Arvind Word Power: English-Hindi जो छपते ही सुपरहिट हो गया। यह कोश न केवल शब्दोँ के अर्थ देता है, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर परिभाषाएँ भी, और एक ही शब्द के लिए कई इंग्लिश और हिंदी के पर्याय भी, जिस से किसी शब्द को उसके सही संदर्भों मेँ देखा और समझा जा सकता है. 1360 पेजोँ वाला यह कोश छोटीमोटी ऐनसाइक्लोपीड़िया है और भारतीयता का दर्पण। विख्यात कवि-निबंधकार-समीक्षक श्री अशोक वाजपेयी ने लिखा है कि अरविंद कुमार ने यह कोश बना कर हिंदी समाज को कृतज्ञ कर दिया है. कोश के प्रकाशक हैँ अरविंद लिंग्विस्टिक्स प्रा. लि, ई-28 प्रथम तल, कालिंदी कालोनी. नई दिल्ली 110065. मूल्य – रु 595.00. संपर्क सुश्री मीता लाल – 09810016568.)

अरविंद कुमार सवाल उठाते हैँ—
कब तक हमारी पीढ़ियाँ विदेशी दृष्टिकोण से बने इंग्लिश कोशोँ का इस्तेमाल करने के लिए विवश होती रहेँगी?
-मीता लाल,
ईमेल- [email protected]

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