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आर्य वीर दल एक प्रेरक प्रसंग

हम यहाँ चर्चा उन दिनों की कर रहे हैं, जब सार्वदेशिक आर्य वीर दल के केन्द्रीय संचालक श्री ओमप्रकाश जी त्यागी हुआ करते थे| उन दिनों अरुणाचल प्रदेश में इसाई मिशनरी खुले आम लोगों को लालच और भय दोनों का ही प्रयोग करते हुए इसाई बनाने का कार्य कर रहे थे| वहाँ के हिन्दू लोग बुरी प्रकार से पद्दलित हो रहे थे| उनकी आय का भी कोई विशेष साधन नहीं था, तो भी वह सम्मान से अपना जीवन जीना चाहते थे किन्तु न तो सरकारी स्तर पर और न ही सामाजिक स्तर पर उनकी सुध लेने वाला भारत में कोई दिखाई देता था| एसी विपत्ति के समय में वहां के हिन्दुओं के पास इसाई बनने के अतिरिक्त कोई मार्ग शेष न रह जाता था| इन सब चर्चाओं को सुनकर सार्वदेशिक आर्य वीर दल के केन्द्रीय संचालक श्री ओम प्रकाश जी त्यागी अपने साथ कुछ आर्यवीर दल के कार्यकर्ताओं को लेकर अरुणाचल प्रदेश धर्म की रक्षा के लिए तडप रहे हिन्दू लोगों की सुध लेने गए| वह सब लोग वहां के विभिन्न क्षेत्रों में घूमते हुए लोगों से उनके कष्टों को जानते और तत्काल उन कष्टों का निवारण करने का प्रयास करते |

इस प्रकार के कार्य करते हुए यह सब लोग एक दिन वह सब एक वीरान पहाड़ी से जा रहे थे कि अकस्मात उनके बहुत आगे जा रहे एक इसाई पादरी ने निकट से ही जा रही एक हिन्दू महिला को पकड़ लिया और उसके साथ अभद्र व्यवहार करने लगा| महिला चीखने चिल्लाने लगी किन्तु उसकी सहायता के लिए कोई नहीं आ रहा था| इस सब को देख रहे आर्य वीर दल के इस समूह के युवकों में से कुछ युवकों के अन्दर से ऋषि दयानंद की शक्ति जाग उठी और वह दौड़े उस महिला की रक्षा के लिए| पहले तो उन्होंने उस पादरी को समझाने का यत्न किया किन्र्तु पादरी था कि मान ही नहीं रहा था| जब बहुत प्रयास करने पर भी वह पादरी नहीं माना तो एक आर्य युवक ने उसकी अच्छी धुनाई कर दी| इससे उस पादरी को बहुत चोटें आई| अंत में वह अपनी जान बचा कर भाग खड़ा हुआ|

महिला की रक्षा करने के पश्चात् जब वह युवक अपने दल के पास लौटकर आया तो त्यागी जी ने उस आर्य वीर से पूछ ही लिया कि आप मेरे साथ आये हो, मेरे नेत्रत्व में सब काम हो रहा है, फिर आप मेरे से आज्ञा लिए बिना वहां क्यो गए? आर्य वीर ने कहा कि उस महिला की रक्षा करना आवश्यक हो गया था| इस कारण जाना पडा| त्यागी जी ने कहा कि यह ठीक है कि महिलाओं की ईसाईयों से रक्षा करना हमारा कर्तव्य है किन्तु अनुशासन यह भी कहता है कि बिना आज्ञा के अथवा बिना आज्ञा लिए अपने दल से किसी भी अवस्था में अलग नहीं होना चाहिए| इस इसाई बहुल क्षेत्र में तो यह और भी आवश्यक हो जाता है| इसलिए आपने अनुशासन भंग किया है, इसका दंड आपको अवश्य ही मिलेगा|

इस प्रकार उसे दण्ड देकर त्यागी जी ने सब के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत किया कि जिसके नेतृत्व में आप काम कर रहे हो, उसकी आज्ञा के बिना आपने कुछ नहीं करना है| आर्य युवक को अच्छा काम करने पर भी हंसते हुए दंड स्वीकार करना पड़ा| इससे अन्य आर्य युवकों को भी इस बात का ज्ञान हो गया कि केवल उत्तम कार्य कार्य करना ही अच्छा नहीं होता, इस उत्तम कार्य के लिए अनुशासन उससे भी उत्तम होता है अत: अनुशासन को कभी नहीं छोड़ना चाहिए|

सन् १९७९-८० की बात है| उन दिनों पन्जाब-हरियाणा आर्य वीर दल के प्रांतीय संचालक प्रा राजेन्द्र जिज्ञासु जी होते थे और मैं मंत्री होता था| इस मध्य ही मैं बेचुलर इन लायब्रेरी साइंस की शिक्षा लेने कालेज से अवकाश लेकर पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ चला गया| उन दिनों हमारे पास आर्य वीर दल के एक शिक्षक होते थे| छोटे कद के, थोडा भारी शरीर के थे | उनका नाम श्री रामसिंह राणा जी था| उनका सम्बन्ध आर्य समाज घाटकोपर मुंबई से था| उनके वेतन तथा यात्रा सम्बन्धी बिल मेरे पास आया करते थे जिन पर मैं और प्रा राजेन्द्र जिज्ञासु जी हस्ताक्षर करके सार्वादेशिक आर्य वीर दल दिल्ली को भेज देते थे, जिससे उनको बिल का भुगतान मिल जाता था| चंडीगढ़ जाने के अनंतर मैं एक महीना उनका बिल समय पर न भेज सका| इस मध्य ही जम्मू काश्मीर की तत्कालीन सरकार ने सत्यार्थ प्रकाश पर रोक लगा दी| इस बात को सुनकर हमारे यह शिक्षक श्री रामसिह राणा जी कुछ आर्य वीरों को साथ लेकर मौत से लड़ने अर्थात् वहां जाकर सरकार के इस निर्णय के विरोध में सत्याग्रह करने के लिए गए| वहां की धर्मांध सरकार को इन सब के पहुँचने से पूर्व ही पता चल गया कि आर्य समाज की और से सत्याग्रह आन्दोलन आरम्भ हो रहा है ओर आर्यों के सत्याग्रहों का परिणाम तो भारत में बहुत पहले गुलामी के दिनों में ही देखा जा चुका था|

जो आर्य पराधीनता में भी नहीं डरे वह स्वाधीन भारत में कैसे काबू आवेंगे, इसका विचार आते ही इस दल के काश्मीर पहुँचने से पूर्व ही सत्यार्थ प्रकाश पर लगाईं गई रोक वापिस ले ली गई और राणा जी की यह विजेता टीम भी तत्काल वहां से वापिस लौट पड़ी| लौटते हुए यह लोग चंडीगढ़ में रुके| वहां यह सब डी ए वी कालेज में आये| मैं भी डी ए वी कालेज सेक्टर १० के छात्रावास के अतिथिगृह के एक कमरे में रहता था| उस समय कालेज के प्राचार्य श्री किशन सिंह जी आर्य थे| उन्होंने इन आर्य वीरों से मिलाने के लिए मुझे बुला भेजा| सायंकाल का समय था| कालेज के ग्राउंड में खड़े थे| प्राचार्य किशन सिंह जी ने कालेज के शस्त्रागार से तीर कमान मंगवाया| यह तीर और कमान दोनों ही इस प्रकार के थे जैसे हम महाभारत और रामायण देखते समय टी वी में देखते हैं| यह शिक्षक महोदय श्री रामसिंह राणा जीके हाथ में दिए गए और उन्होंने इस से निशाना साध कर दिखाया| जब उन्होंने मुझे देखा तो कहा कि हमारा वह बिल तो पास कर के भेज दो, मैंने तत्काल बिल निकाला और हस्ताक्षर करके उन्हें दे दिया ताकि वह जाते हुए दिल्ली कार्यालय से इसका भुगतान ले सकें| इन सब के उत्साह को देख कर बहुत आनंद आया|

डॉ.अशोक आर्य
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