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आशिष भरत राम ने एसआरएफ का किया कायाकल्प

1990 के दशक की शुरुआत में कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से एमबीए करने वाले आशिष भरत राम को कभी-कभी लगता था कि पारिवारिक कारोबार संभालने के लिए भारत आकर उन्होंने गलती की थी। इसके पीछे एक वजह थी। उनके पिता अरुण भरत राम का उस समय अपने भाइयों विनय और विवेक भरत राम के साथ विवाद चल रहा था। श्रीराम परिवार में 1989 में बंटवारा हुआ था और डॉ भरत राम के बेटों के बीच संपत्तियों के बंटवारे के लिए विवाद चल रहा था। अच्छी खबर यह थी कि 1999 में यह विवाद शांतिपूर्ण ढंग से सुलझ गया और एसआरएफ लिमिटेड (पहले श्री राम फाइबर के नाम से जानी जाती थी) का नियंत्रण अरुण भरत राम को मिल गया। उन्होंने आशीष को पांच साल तक एसआरएफ में कारोबार की बारीकियां सिखाई। 2007 में आशीष भरत राम कंपनी के प्रबंध निदेशक बन गए।

जल्दी ही आशिष भरत राम को अहसास हुआ कि कंपनी का 70 फीसदी से अधिक राजस्व नायलॉन टायर कॉर्ड से आ रहा है जिसका कारोबार बढ़ नहीं रहा है और इसका कोई भविष्य नहीं है। एसआरएफ को अपना अस्तित्व बचाने के लिए अपनी रणनीति बदलनी थी। उन्होंने कहा, ‘मैंने महसूस किया कि यह अच्छा कारोबारी मॉडल नहीं है। नायलॉन टायर कॉर्ड के सीमित खरीदार थे। केवल लागत ही इसे अलग करती थी और दुनिया में कॉरपोलेक्टम जैसे कच्चे माल के सीमित आपूर्तिकर्ता थे और कच्चे माल की कीमतों पर उनका नियंत्रण था। हमें एसआरएफ का कारोबारी मॉडल बदलने की जरूरत थी।’ 51 साल के आशिष भरत राम ने 12 साल पहले ठीक ऐसा ही किया।

बाजार पूंजीकरण के हिसाब से देखा जाए तो एसआरएफ बंटवारे के बाद श्रीराम समूह की सबसे सफल सूचीबद्ध कंपनी है। इसका बाजार पूंजीकरण 18,500 करोड़ रुपये है। पिछले एक साल में कंपनी का शेयर 56 फीसदी से अधिक बढ़त के साथ 3,220 रुपये पर पहुंच चुका है। आशिष भरत राम ने मुख्यत: नायलॉन टायर कॉर्ड बनाने वाली कंपनी को ऐसी कंपनी में बदल दिया है जिसका अब केवल 20 फीसदी राजस्व इससे आता है। कंपनी के बाकी राजस्व में केमिकल और पैकेजिंग फिल्म की बराबर हिस्सेदारी है।

निवेशक खुश हैं क्योंकि आशिष भरत राम ने इक्विटी पर लगातार 16 से 18 फीसदी का सालाना रिटर्न दिया है और सालाना आधार पर कंपनी की राजस्व वृद्घि करीब 15 फीसदी रही है। उनके मुताबिक उनकी सफलता का राज यह है कि उन्होंने हर साल 1,000 से 1,200 करोड़ रुपये का निवेश किया और कंपनी का आधा राजस्व निर्यात से हासिल किया।अगर थोड़ा इतिहास में जाएं तो कभी भारतीय कारोबारी समूहों में श्रीराम की तूती बोलती थी। कई लोगों का मानना है कि दिल्ली में उसका ऐसा ही रुतबा था जैसा मुंबई में टाटा का।

लाला श्रीराम ने 1909 में दिल्ली क्लॉथ ऐंड जनरल मिल्स के रूप में इसकी स्थापना की थी। 1980 के दशक में लंदन के कारोबारी स्वराज पॉल ने श्रीराम समूह का अधिग्रहण करने की कोशिश की लेकिन वह सफल नहीं हुए। 1989 में पारिवारिक कलह के कारण श्रीराम समूह भरत राम, चरत राम और मुरलीधर के बेटों बंसी धर और श्रीधर के बीच तीन हिस्सों में बंट गया। उस समय यह समूह देश के शीर्ष 30 औद्योगिक समूहों में 11वें स्थान पर था। इसकी परिसंपत्तियां रुइया, किर्लोस्कर, महिन्द्रा और वाडिया समूह से भी अधिक थीं।

बंटवारे का परिवार पर प्रतिकूल असर पड़ा। नौ साल बाद जब भरत राम के बेटों में बंटवारा हुआ तो बाजार पूंजीकरण के हिसाब से समूह का कोई भी धड़ा शीर्ष 50 कारोबारी घराने में शामिल नहीं था। समूह की कई प्रतिष्ठित कंपनियों को बेच दिया गया। इनमें वाहन क्षेत्र की डीसीएम-दायवू और होंडा-सिएल और बेनेटन के साथ 50-50 फीसदी वाला संयुक्त उपक्रम शामिल था। दिल्ली में जमीन बेचने के लिए श्रीराम समूह ने अपनी कपड़ा मिलें भी बंद कर दीं। श्रीराम समूह की कई कंपनियों का साम्राज्य सिमट गया लेकिन एसआरएफ और डीसीएम श्रीराम अपवाद रहीं।

अजय श्रीराम ने डीसीएम श्रीराम के चीनी कारोबार का काफी विस्तार किया। एसआरएफ का केमिकल कारोबार बहुत बढ़ा। इसकी वजह रही 400 लोगों की मजबूत आरऐंडडी टीम। इस टीम ने 48 प्रसंस्करण पेटेंट हासिल किए जिससे कंपनी ने अपना अलग मुकाम बनाया और बेहतर मार्जिन कमाया। साथ ही कंपनी ने मध्यस्थ कंपनियों को कम कीमतों पर उच्च गुणवत्ता वाले रसायन उत्पाद मुहैया कराए। कंपनी के 95 फीसदी उत्पाद निर्यात होते हैं।

आशिष भरत राम ने कहा, ‘इस कारोबार में नायलॉन टायर कॉर्ड से 10 फीसदी अधिक मार्जिन है लेकिन सबसे अहम बात यह है कि यह 15-20 फीसदी की दर से बढ़ रहा है जबकि नायनॉन टायर कॉर्ड की वृद्घि दर एक फीसदी है।’ टायर कॉर्ड कारोबार उनके लिए दुधारू गाय साबित हो रही है क्योंकि इसके लिए सीमित वृद्घिशील निवेश की जरूरत होती है। इसके बजाय इस पैसे को दो अन्य कारोबारों के विस्तार में निवेश किया जाता है। पैकेजिंग फिल्म कारोबार में भी एसआरएफ आरऐंडडी का काफी फायदा उठा रही है।

कंपनी ने थाईलैंड और दक्षिण अफ्रीका में अपने संयंत्र स्थापित कए हैं और हंगरी में भी संयंत्र स्थापित करने जा रही है। मार्च 2020 तक कंपनी की पैकेजिंग फिल्म की वार्षिक क्षमता 280,000 टन पहुंच जाएगी जो सितंबर 2003 की तुलना में 56 गुना अधिक है। आशीष भरत राम कहते हैं कि उन्हें भारत वापस आने का कोई मलाल नहीं है। कारोबार के बंटवारे के बावजूद श्रीराम परिवार त्योहार और दूसरे विशेष आयोजन साथ मनाते हैं। आशीष भरत राम कहते हैं कि एसआरएफ में उनकी रणनीति की सफलता का प्रमाण यह है कि निवेश बैंकर अक्सर उन्हें फोन करके कंपनी के बारे में पूछते हैं।

साभार- https://hindi.business-standard.com/ से

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