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लंदन में बैठे आशीष का दिल धड़का इन्दौर के मासूम बच्चों के लिए!

कौन बनेगा करोड़पति में कर्मवीर के रूप में प्रतिभागी बनकर आए इन्दौर के दंपत्ति ज्ञानेन्द्र पुरोहित और मोनिका पुरोहित अपने काम में लगे थे। कौन बनेगा करोड़पति में आने के बाद उनके काम की चर्चा तो ऐसे भारत सहित पूरी दुनिया में हो रही थी, उन्हें हर जगह से खूब बधाईयाँ भी मिल रही थी। लेकिन अचानक उन्हें लंदन से एक फोन आया तो उन्हें लगा जैसे उनकी तपस्या और उनके काम को एक सच्चा सम्मान मिला है। लंदन से फोन करने वाले थे आशीष गोयल, जो खुद नैत्रहीन हैं और पुरोहित दंपती के काम के बारे में जानकर इतने द्रवित हुए कि उन्होंने मुंबई में अपने पिता श्री अशोक गोयल को फोन करके पुरोहित दंपती से संपर्क कर उनके बैंक एकाउंट की जानकारी देने को कहा। एकाउंट नंबर मिलते ही आशीष गोयल ने उनके खाते में तत्काल चार लाख रुपये की राशि मूक-बधिर बच्चों के लिए भेज दी। पुरोहित दंपती लंदन से एक नैत्रहीन दानदाता से आई इस दान राशि को पाकर समझ ही नहीं पा रहे थे कि ईश्वर को किस रूप में धन्यवाद दें।

आशीष गोयल एक ऐसे शख्स हैं जिनके शब्दकोष में असंभव शब्द है ही नहीं। मासूम सा चेहरा और बंद आँखों में ढेरों सपने लिए हुए आशीष गोयल की अपनी एक अलग दुनिया है। आशीष की जिंदगी में इतने उतार-चढ़ाव आए लेकिन उन्होनें कभी हार नहीं मानी। लोग उन्हें नैत्रहीन समझते रहे वे अपने आपको समान्य व्यक्ति से भी बेहतर और सक्षम सिध्द करते रहे।

आशीष गोयल के महत्वपूर्ण वीडियो लिंक

https://www.youtube.com/watch?v=cgUT4RW_lqI&t=5s

आशीष दुनिया के पहले ब्लाईंड ट्रेडर हैं। आशीष जिस तरह से अपना काम करते हैं उसे देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता है कि आशीष नैत्रहीन हैं।

बचपन से आशीष की खेलकूद में काफी दिलचस्पी थी। उसने मात्र महज़ पाँच साल की उम्र में तैरना, साइकिल चलाना, निशाना लगाना और घोड़े के सवारी करना सीख लिया था। आशीष को क्रिकेट में भी काफी दिलचस्पी थी। लेकिन, उसका सपना था टेनिस का चैंपियन खिलाड़ी बनना। लेकिन, दुर्भाग्य से आशीष ९ साल के हुए तब अचानक सब कुछ बदलने लगा। सब कुछ असामान्य होने लगा। आशीष को आँखों की एक ऐसी बीमारी हो गयी थी, जिससे धीरे-धीरे उसके आँखों की रोशनी जा रही थी। टेनिस कोर्ट पर अब उसे दूसरे पाले की गेंद नहीं दिखाई देती थी। किताबों की लकीरें भी धुंधली होने लगी। धीरे-धीरे उसे पास खड़े किसी व्यक्ति को नहीं देख पाते थे। घर के लोग भी नहीं समझ पा रहे थे कि आशीष को ये क्या हो गया है।

आँखों पर मोटे-मोटे चश्मों के बावजूद उसे बहुत ही कम दिखाई देता था। दिखाई नहीं देने की वजह से आशीष को खेल का मैदान भी छोड़ना पड़ा। एक बच्चा जो खेलकूद से लेकर पढ़ाई तक में अपने तमाम दोस्तों से अव्वल आता था, वो अब अपने दोस्तों के साथ न खेल पा रहा था न उनके साथ किसी भी गतिविधि में शामिल हो पाता था।

लेकिन इसके बावजूद न तो आशीष ने और न उनके माता-पिता ने हार मानी। आशीष जी जान से पढ़ाई में जुट गए। माता-पिता ने भी आशीष को हर कदम पर हौसला दिया और उसे कभी निराश या हताश नहीं होने दिया।

स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद जब आशीष गोयल कॉलेज में पहुँचे तो उन्होंने महसूस किया कि उनके सारे दोस्त कैरियर की नई ऊँचाईयों पर पहुँचने के सपने देख रहे हैं। आशीष को लगा कि वे अपनी कमजोर दृष्टि के कारण कैसे अपने सपने को पूरा करेंगे। लेकिन आशीष ने हार नहीं मानी, और उनको हौसला व आशीर्वाद दिया उनके गुरूजी डॉ. श्री बालाजी तांबे ने। मुंबई के पास लोनावाला में आत्मसंतुलन विलेज के नाम से आयुर्वेदिक व अध्यात्मिक आश्रम का संचालन करते हैं।

डॉ. श्री बालाजी तांबे

बालाजी ने आशीष को समझाया कि समस्या को समस्या मत समझो इसमें से हल निकालने की कोशिश करो, इसी से तुम कामयाबी की उड़ान पर जा सकोगे। बालाजी ने कहा कि तुम्हारे शरीर के एक ही अंग ने काम करना बंद किया है, शरीर के बाकी सारे अंग बिलकुल ठीक हैं। बालाजी के इन शब्दों ने आशीष पर जादुई असर किया और आशीष ने फिर कभी पीछे पलट कर नहीं देखा। आशीष ने तय कर लिया कि वो अपने हर सपने को पूरा करेगा।

ये आशीष की मेहनत और लगन का ही नतीजा था कि उन्होंने मुंबई के नरसी मोंजी इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट स्टडीज़ की अपनी कक्षा में दूसरा नंबर हासिल किया। आशीष को उसके शानदार प्रदर्शन के लिए डन एंड ब्रैडस्ट्रीट बेस्ट स्टूडेंट अवार्ड भी दिया गया। लेकिन, नरसी मोनजी इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट स्टडीज में प्लेसमेंट के दौरान कोई भी कॉर्पोरेट कंपनी आशीष की नैत्रहीनता की वजह से उन्हें नौकरी देने की पहल नहीं करती।

कॉर्पोरेट जगत के लोग उनको सलाह देते कि वे सरकारी नौकरी ही कर सकते हैं। लेकिन आशीष न निराश हुए न हताश। आखिरकार, उनकी प्रतिभा के दम पर आईएनजी वैश्य बैंक ने उन्हें नौकरी दी। लेकिन आशीष इससे भी आगे जाना चाहते थे। यहाँ काम करते हुए अपने सभी सहयोगियों के प्रशंसापात्र बनकर आशीष के सपनों को पंख लग चुके थे और आत्मविश्वास से लबरेज हो चुके थे।

आगे की पढ़ााई के लिए आशीष ने नौकरी छोड़ दी। उन्हें अमेरिका के व्हार्टन स्कूल ऑफ बिजनेस में प्रवेश मिल गया। इस संस्थान में दुनिया भर के कॉर्पोरेट जगत के लोगों के बच्चे पढ़ने आते हैं। आशीष का आत्मविश्वास और प्रतिभा देखकर व्हार्टन में प्रवेश के लिए उनका साक्षात्कार लेने वाले पैनलिसट भी दंग रह गए। उन्हें आखरी दम तक ये पता नहीं चला कि आशीष नैत्रहीन हैं।

इस संस्थान से आशीष ने एमबीए की पढ़ाई की। व्हार्टन स्कूल ऑफ बिजनेस में किसी को प्रवेश मिल जाना ही बड़ी बात होती है। आशीष गोयल फिलाडेल्फिया में व्हार्टन बिजनेस स्कूल में पहले नैत्रहीन छात्र थे। उन्होंने 2008 में एमबीए किया और उन्हें संस्थान की ओर से जोसेफ पी व्हार्टन पुरस्कार से भी सम्मानित किया, ये पुरस्कार प्रतिवर्ष उस छात्र को दिया जाता है जो संस्थान में पढ़ते हुए इस संस्थान को अपनी विशिष्ट उपलब्धियों से गौरव प्रदान करते हुए इसका प्रतीक बन जाता है।

इस संस्थान से एमबीए की डिग्री हासिल करने के बाद आशीष को दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित बैंकिंग संस्थानों में एक जेपी मोर्गन के लंदन ऑफिस में नौकरी मिल गयी। आशीष जेपी मोर्गन में काम करते हुए दुनिया के पहले दृष्टिहीन ट्रेडर बन गए। ये एक बड़ी कामयाबी थी। इस कामयाबी की वजह से आशीष का नाम दुनिया-भर में पहले दृष्टिहीन ट्रेडर का रूप में मशहूर हो गया। आशीष गोयल इस संस्थान में करोड़ों-अरबों रुपयों के ट्रांजिक्शन की जानकारी रखते, और मजाल है कि कभी किसी तरह की चूक भी हो जाए।

आशीष को कई संस्थाओं ने भी सम्मान और पुरस्कार दिए। आज आशीष खुद एक उदाहरण बन चुके हैं, दुनिया के कई मंचों पर प्रतिष्ठित हस्तियाँ जब भाषण देती है तो उनके नाम का उदाहरण दिया जाता है।

आशीष गोयल को 3 दिसंबर 2010 में भारत की तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने के विकलांग व्यक्तियों के सशक्तिकरण के लिए भारत के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया। 2015 में, उन्हें विश्व आर्थिक मंच द्वारा यंग ग्लोबल लीडर के रूप में नामांकित किया गया। आशीष गोयल की उपलब्धियों पर कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ चैनल कार्यक्रम बना चुके हैं। टाईम्स नाउ ने तो लंदन जाकर उन पर डॉक्यूमेंट्री बनाई थी।

2013 के बाद से, उन्होंने लंदन स्थित ब्लूक्रस्ट कैपिटल मैनेजमेंट में एक पोर्टफोलियो मैनेजर के रूप में काम किया।

आशीष गोयल स्क्रीन-रीडिंग सॉफ़्टवेयर के माध्यम से अपने ई-मेल, अनुसंधान रिपोर्ट पढ़ते हैं। आशीष को जब किसी ग्राफ को समझना होता है तो इस सॉफ्टवेअर से उसे कोई मदद नहीं मिल पाती लेकिन आशीष को जब किसी ग्राफ़ पढ़ने की ज़रूरत होती है, तो वे तमाम आँकड़ों को अपने मस्तिष्क में बिठाकर उनको कल्पना में ग्राफ में ढालकर ग्राफ को समझने की कोशिश करते हैं।

आशीष गोयल का जन्म मुंबई के मारवाड़ी परिवार में हुआ उनके पिता अशोक गोयल एक बिल्डर हैं। आशीष को जन्म के समय तो किसी तरह की कोई समस्या नहीं थी लेकिन जैसे जैसे वे बड़े होते गए रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा बीमारी के कारण उनकी दृष्टि कम होती गई। 9 वर्ष की उम्र में उन्हें कम दिखना शुरु हुआ और 22 साल की उम्र तक आते आते उन्हें पूरी तरह से दिखना बंद हो गया।

उन्होंने २००६ में अमरीका के व्हार्टन में प्रवेश लेने से पहले तीन साल के लिए बैंगलोर में ए आईएनजी वैश्य बैंक में काम किया। आशीष ने २००९ में मेट्रो लंदन स्पोर्ट्स क्लब का प्रतिनिधित्व किया और उनकी टीम ने यूके घरेलू नेत्रहीन क्रिकेट टूर्नामेंट भी जीता।

आशीष गोयल भारत में कमजोर बच्चों के लिए विकलांगता अनुसंधान और शिक्षा के मुद्दों के पैरोकार हैं और अपने स्तर पर प्रयास करके विकलांग बच्चों व छात्रों को हर तरह से मदद पहुँचाते हैं। आशीष ने इस तरह $ 50,000 से अधिक की राशि दूसरों की मदद के लिए जुटाई है। वर्ष 2014 में उनका विवाह हुआ और वे लंदन में अपनी पत्नी के साथ रहते हैं। फुर्सत के समय में आशीष दूसरे दृष्टिहीन लोगों के साथ क्रिकेट खेलते हैं और टैंगो भी बजाते हैं। अपने कुछ दोस्तों के साथ वे क्लब जाकर पार्टी भी करते हैं। आशीष ने २००९ में मेट्रो लंदन स्पोर्ट्स क्लब का प्रतिनिधित्व किया और उनकी टीम ने यूके घरेलू नेत्रहीन क्रिकेट टूर्नामेंट भी जीता।

इन्दौर के कर्मवीर पुरोहित दंपती के साईन लैंग्लवेज के संस्थान की वेब साईट

डॉ. श्री बालाजी तांबे की वेबसाईट

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