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ज्ञान चतुर्वेदी
 

  • मूर्खता बड़ी कि होशियारीः एक संक्षिप्त शोध प्रबंध

    मूर्खता बड़ी कि होशियारीः एक संक्षिप्त शोध प्रबंध

    मूर्खता बहुत चिंतन नहीं माँगती। थोड़ा-सा कर लो, यही बहुत है। न भी करो तो चलता है। तो फिर मैं क्यों कर रहा हूँ? यों ही मूर्खतावश तो करने नहीं बैठ गया? नहीं साहब। हमसे बाकायदा कहा गया है कि करके दीजिए। इसीलिए कर रहे हैं। संपादक ने तो यहाँ तक कहा कि यह काम आपसे बेहतर कोई नहीं कर सकता और मूर्खता की बात चलते ही सबसे पहले आपका ही खयाल आया था।

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