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मंजुल भारद्वाज
 

  • समता,बंधुता और शांति का पैरोकार हो रंगमंच !

    समता,बंधुता और शांति का पैरोकार हो रंगमंच !

    समता,बंधुता और शांति का पैरोकार हो रंगमंच, पर ऐसा हो नहीं रहा. रंगमंच सत्ता के वर्चस्व का माध्यम भर रह गया है और रंगकर्मी उसकी कठपुतलियाँ जो रंगकर्म के मूल उद्गम के ख़िलाफ़ है.

  • संविधान के मूल तत्वों को बचाने का संकल्प है धनंजय कुमार का शाहकार नाटक ‘सम्राट अशोक’

    संविधान के मूल तत्वों को बचाने का संकल्प है धनंजय कुमार का शाहकार नाटक ‘सम्राट अशोक’

    आज इस प्रलयकाल में थिएटर ऑफ़ रेलेवंस ‘सांस्कृतिक सृजनकार’ गढ़ने का बीड़ा उठा रहा है! सत्य-असत्य के भान से परे निरंतर झूठ परोसकर देश की सत्ता और समाज के मानस पर कब्ज़ा

  • लव यू ज़िंदगी !

    लव यू ज़िंदगी !

    यही हमारे लोकप्रिय नेता का हश्र होने वाला है उसने देश को आत्महत्या की कग़ार पर खड़ा कर दिया है ..पर हैं वो लोकप्रिय बिल्कुल हिट लर की तरह हैं

  • कला एक क्रांति है !

    कला एक क्रांति है !

    राजनैतिक सत्ता समय समय पर सभ्यताओं को नष्ट करती है पर कला सांस्कृतिक चेतना को जगा सभ्यताओं का निर्माण करती रही है. कला को समझना है तो मानव की उत्क्रांति को समझना अनिवार्य है.

  • पाँच कविताएँ

    पाँच कविताएँ

    आग़ जलती रहे! - मंजुल भारद्वाज आग़ जलती रहे घर के चूल्हे में पृथ्वी के गर्भ में

    • By: मंजुल भारद्वाज
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    • In: कविता
  • जीवन सत्व है ‘बारिश’!

    जीवन सत्व है ‘बारिश’!

    बारिश विज्ञान का एक बेहद जादुई,मनमोहक,सार्वभौमिक प्रयोग है. इसमें पानी,हवा,आग और धरती का अद्भुत खेल है. सूर्य धरती को तपाता है,धरती विरह की आग में तपने लगती है. उस पर हवा का दवाब कम होने लगता है.

  • मानवीय विष को निष्क्रिय करना ही कला का मकसद और साध्य है !

    मानवीय विष को निष्क्रिय करना ही कला का मकसद और साध्य है !

    नाटक “अनहद नाद – Unheard Sounds of Universe” नाटक होते हुए भी “जीवन” है और जीवन में घटित “नाटक” को हर पल उखाड़ फैंकता है .. कलाकार की कला , कलात्मकता और कला सत्व है ..उनका सृजन नाद है .. व्यक्तिगत सृजन दायरे को तोड़कर उसे यूनिवर्सल , ब्रह्मांडीय सृजन से जोड़ता है और कलाकार को देश , काल ,भाषा , धर्म से उन्मुक्त कर एक सृजनकार , एक क्रिएटर के रूप में घडता है.

  • मानवता की सृजनात्मक हुंकार है “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस”!

    मानवता की सृजनात्मक हुंकार है “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस”!

    नब्बे का दशक देश,दुनिया और मानवता के लिए आमूल बदलाव का दौर है.”औद्योगिक क्रांति” के पहिये पर सवार होकर मानवता ने सामन्तवाद की दासता से निकलने का ख्वाब देखा.पर नब्बे के दशक तक आते आते साम्यवाद के किले ढह गए और ”औद्योगिक क्रांति” सर्वहारा की मुक्ति का मसीहा होने की बजाय पूंजीवाद का खतरनाक,घोर शोषणवादी और अमानवीय उपक्रम निकला जिसने सामन्ती सोच को ना केवल मजबूती दी अपितु विज्ञान के आविष्कार को तकनीक देकर भूमंडलीकरण के जरिये दुनिया को एक शोषित ‘गाँव’ में बदल दिया. ऐसे समय में भारत भी इन वैश्विक प्रक्रियाओं से अछुता नहीं था.

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