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मनोज कुमार
 

  • वृद्धाश्रम नहीं तीर्थयात्रा कराती शिवराजसिंह सरकार

    विश्व वृद्धजन दिवस पर विशेष

  • संजय प्रयोगधर्मी रंग साधक हैंः संतोष चौबे

    संजय प्रयोगधर्मी रंग साधक हैंः संतोष चौबे

    भोपाल। संजय प्रयोगधर्मी रंग साधक हैं। उनकी पूरी यात्रा विविधता से पूर्ण है। यह बात शिक्षाविद संतोष चौबे ने श्री मेहता की नवीन नाट्य कृति "मरघटा खुला है" के विमोचन करते हुए कहा। श्री चौबे ने कहा कि संजय की यह कृति आध्यात्म से परिपूर्ण है।

  • यह फैसला देश के लिए नजीर बनेगा

    मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान मध्यप्रदेश से अपराधों को जड़ से समाप्त करने के लिए कृत-संकल्पित हैं लेकिन इतने बड़े प्रदेश से अपराधों को नेस्तनाबूद करना थोड़ा मुश्किल है लेकिन जब ठान लिया जाए तो कोई रास्ता मुश्किल नहीं होता है.

  • खादी से खरी हुई आजादी का ओज

    आजादी के दीवानों के लिए खादी महज एक वस्त्र नहीं था बल्कि वह उनके स्वाभिमान का प्रतीक भी था। जब हम हिन्दुस्तान कहते हैं तो खादी का खाका हमारे सामने खींच जाता है। इतिहास साक्षी है कि स्वदेशी, स्वराज, सत्याग्रह के साथ चरखे और खादी ने भारत की आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभायी है।

  • अमृतकाल और युवा भारत की चुनौतियां

    आज क्या हो गया है? दरअसल, मिशनरी पत्रकारिता ने व्यवसाय को ध्येय बना लिया है और जब अखबारों में यह सूचना दी जाती है कि उसके प्रकाशन का लाभ-हानि का आंकड़ा यह रहा तो बची-खुची उम्मीद भी तिरोहित हो जाती है. यह अमृतकाल के हिन्दुस्तान का सच है. यह सच एक चुनौती बनकर हमारे सामने खड़ा है.

  • संवाद से संवेदना जगाइए

    संवाद से संवेदना जगाइए

    इस सब कड़ुवे सच के बीच एक सच यह भी है कि सबकुछ खत्म नहीं हुआ है. अभी बहुत कुछ बाकि है. संवेदना भी, आंसू भी और दूसरों के लिए दर्द भी. यह बाकि रह जाएगा. संवेदनायें बची रहेंगी लेकिन शर्त है कि आप संवाद करें.

  • अग्निपथ : कुछ अनुत्तरित सवाल

    अग्निपथ : कुछ अनुत्तरित सवाल

    चार वर्ष की अवधि में वह सेना की कार्यवाही देखने के बाद युवाओं में देश के प्रति प्रेम का संचार होगा. वह सेना की चुनौतियों को समझ सकेंगे. साथ में चार वर्ष की अवधि में उन्हें ओपन स्कूल और ओपन यूनिवर्सिटी से शिक्षा हासिल करने की सुविधा भी होगी.

  • आओ, थोड़ा-थोड़ा भोपाली हो जाएं

    आओ, थोड़ा-थोड़ा भोपाली हो जाएं

    हालांकि सोहबत अच्छी हो तो परम्परा आगे बढ़ जाती है और सोहबत खराब हो तो परम्परा दम तोड़ने लगती है। पुराने भोपाल के नौजवान पीढ़ी के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। नए भोपाल के लोगों को साथ में पीकदान रखने के लिए कहने का मतलब बेवजह समय खराब करना है।

  • सवालों में पत्रकारिता और पत्रकारिता पर सवाल…

    सवालों में पत्रकारिता और पत्रकारिता पर सवाल…

    सुविधाभोगी पत्रकारों की बड़ी फौज के कारण पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहा है. ये वो लोग हैं जिन्होंने कभी पराडक़र जी की पत्रकारिता की कक्षा में नहीं गए, ये वो लोग हैं जो नहीं जानते कि माखनलाल चतुर्वेदी जेल के सींखचों में बंद होने के बाद भी पत्रकारिता का धर्म निभाते रहे.

  • गीतांजलि को बूकर पुरस्कार ः एक नजरिया ये भी

    गीतांजलि को बूकर पुरस्कार ः एक नजरिया ये भी

    साहित्य हो या सिनेमा आखिर हम विदेशी पुरस्कारों के लिए इतने उतावले क्यों होते हैं? क्या कोई इस बात की जानकारी देगा कि बुकर सम्मान प्राप्त गीताजी की किताब की कितनी लाख प्रतियां प्रकाशक प्रकाशित कर रहे हैं और कितने लाख उसके खरीददार होंगे?

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