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प्रेम जन्मेजय
 

  • प्याज प्रभु की आरती

    प्याज प्रभु की आरती

    मंहगा प्याज हर युग में, बिना धर्म की हानि हुए, अवतरित होता रहा है। सन् 2003 में मैंने अपनी व्यंग्य रचना ‘ सुन बे प्याज’ में एक आरती लिखी थी।

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