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सुदर्शना द्विवेदी
 

  • पूरा मोहल्ला शामिल होता था धर्मवीर भारती जी की होली में

    पूरा मोहल्ला शामिल होता था धर्मवीर भारती जी की होली में

    प्रेम की बात हो तो कैसे एक और प्रेमी युगल की बात याद न आए, जो काल और समय की सीमाएं तोड़ चुका है। 83 वर्षीय पुष्पा भारती जी आज भी साहित्य सहवास में शाकुंतलम के अपने घर में उसी तरह रहती हैं जैसे 68-69 से रहती आई हैं धर्मवीर भारती जी के साथ। भारती जी ने देह भले ही त्याग दी, पर उन्होंने ना पुष्पा जी को छोड़ा है ना पुष्पा जी ने उन्हें। इसलिए आज भी भरपूर सुहाग का मान उनके सौम्य, गौर, सुंदर मुख पर झलकता है। उनकी हर बात में, हर सांस में परिलक्षित होता है। चाहे दरवाजे के बाहर लगी धर्मवीर भारती, पुष्पा भारती की नेम प्लेट्स हों, चाहे पूरे घर में खासकर अध्ययन कक्ष में जगह-जगह लगी उनकी तस्वीरों, फाइलों और यादों का अहसास- उस घर में भारती जी आपको घूमते, ठहाके लगाते, त्रिभंगी छवि में खड़े मुस्कुराते, किस्से-कहानियां सुनाते नजर आयेंगे। ‘प्रेम गली अति सांकरी, या में दुइ न समाएं’ को चरितार्थ करते हुए वे पुष्पा जी में समा गये हैं। उन्हीं की सांसों में स्पंदित होते हैं, उन्हीं के होठों से बोलते हैं।

  • ऐसी होली तो अब इतिहास हो गई

    ऐसी होली तो अब इतिहास हो गई

    प्रसिद्ध लेखक उपन्यासकार अमृतलाल नागर की सुपुत्री श्रीमती अचला नागर, जो स्वयं भी निकाह, बाबुल, आखिर क्यों, बागबां जैसी चर्चित फिल्मों और साथिया जैसे सुपरहिट धारावाहिक की लेखिका हैं, से इस बारे में बात की, तो वे हंसते हुए बोलीं, ‘जिस घर में हर दिन होली मनती हो, उस घर के बारे में क्या बताऊं। बाबू जी (नागर जी) हर सुबह शाम ठंडाई बनाते थे। वह भी पूरे समारंभ के साथ। खुद सिल पर भांग, बादाम, मुनक्के और केसर डालकर पीसते थे। फिर बा (उनकी पत्नी) उनके सामने बड़ा सा छन्ना लेकर बैठती थीं और वे दोनों मिलकर कभी दूध और कभी आम के रस में छानते थे। शाम का समय हुआ तो बाबू जी के कोई ना कोई साहित्यिक मित्र भी इस आयोजन का भाग बन जाते थे। होली पर तो लखनऊ की साहित्यिक बिरादरी जमा होती थी। बा उस दिन स्वयं श्रीखंड बना

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