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बसंत पंचमी प्रकृति व् पुरुष के मिलन का उत्सव : एक विमर्श

माघ शुक्ल पंचमी को बसंत पंचमी के नाम से भी जाना जाता है। यह सरस्वती पूजन के लिए भी प्रसिद्द है साथ ही बृज के मंदिरो में बसंत पंचमी से 40 दिन के लिए मंदिरो में बसंत उत्सव का प्रारम्भ हो जाता है, इसे मदनोत्सव भी कहा जाता है।

मदन (कामदेव) और रति के पुत्र का जन्म इसीदिन हुआ था जिसका नाम था “बसंत” इसलिए भी इसे बसंत पंचमी कहते है और इस जन्म के उपलक्ष में होने वाले उत्सव को “बसन्तोत्सव”कहते है।

बसंत ऋतु राज है क्योकि इसमे सभी शेष 5 ऋतुओ का आगमन अवश्य होता है। बसंत ऋतु को रति का, काम का सर्वोत्तम समय माना जाता है।

महाकवि बाण, कालिदास वात्स्यायन इत्यादि अनेक कवियों ने बसंत का बहुत ही श्रृंगारिक वर्णन किया है।

काम सृजन का आधार है किन्तु इसके तीन अलग अलग तल है।

1 पहला है शारीरिक स्तर पर जिसे “यौन सुख” कह सकते है यह बहुत उथला है और इस तल पर पशु और मनुष्य में कोई भेद नहीं है। यह मैथुन वासना के दायरे में आता है और इसका सुख भी क्षणिक है।

2 काम का दूसरा तल है मन के स्तर पर, यह भाव प्रधान है इसमे केवल शरीर सुख हेतु नहीं है इसे आप “प्रेम” कह सकते है।

3 काम का तीसरा तल है “रति का” यह आध्यात्मिक है, इसे ही भारतीय मनीषा ने पुरुषार्थ चतुष्टय में मान्य किया है। समस्त सृष्टि के मूल में यह रति ही है। परमात्मा ने कामना की और वह इसी रति के द्वारा एक से अनेक होकर अभिव्यक्त हुआ।
मनुष्य जब संतति के हेतु से न कि शारीरक सुख के लिए सम्भोग करता है तब वह रति का अनुसरण करता है और यह गर्हित नहीं है, प्रशस्त है।

बसंतोत्सव प्रकृति और पुरुष की इस रति के उत्सव का ही नाम है, यह सृजन की शक्ति की अभिव्यक्ति है। यह रति के सौंदर्य का प्रकटीकरण है जो प्रकृति में प्रत्यक्ष दृष्टगत होता है।

बसंतोत्सव पुरुष और प्रकृति के एकीकृत स्वरूप का भी प्रतिनिधित्व करता है।

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