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दोस्त हो तो इज़राईल जैसा

निसंदेह आज भारत और इजराइल के सम्बन्धों में परस्पर बढ़ते सहयोग के लिये किये जा रहें समझौतो से दोनों ही देशों के लाभ निहित है। इस्लामिक आतंकवाद से सर्वाधिक उत्पीड़ित दोनों राष्ट्रों की अनेक समस्यायें समान होने पर भी कुछ युद्धकालीन परिस्थितियों को छोड़ कर परस्पर सहयोग न लेना व देने की पिछले 70 वर्षों की त्रुटि को सुधार कर मोदी जी ने संभवत सार्थक पहल करी है। अब देखना यह है कि अनेक मुस्लिम देशों द्वारा पोषित इस्लामिक आतंकवाद (जिहाद) की विश्व्यापी मानवीय समस्या का विनाश किस प्रकार होगा ? क्या कुछ इस्लामिक देशो द्वारा बनाई गई सेना जिसके मुख्य अधिकारी पाकिस्तानी सेना के पूर्व जनरल राहेल शरीफ को बनाया गया है, के विरुद्ध भारत व इजराइल मिलकर उनके समांतर कोई सैनिक गठबंधन का गठन करके उनकी चुनौती स्वीकार करेंगे ? वैसे दोनों देश कट्टरपन और आतंकवाद के विरुद्ध हर संभव सहयोग करने के लिये पूर्णतः वचनबद्ध है। भारत-इजराइल की बढ़ती मित्रता से इस्लामिक देशों के समूह ओ.आई.सी. (आर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कंट्रीज ) की बैचेनी अवश्य बढ़ेगी और वे अपने महत्वपूर्ण सदस्य पाकिस्तान की चिंताओं से विचलित हो रहें होंगे । क्योंकि सामान्यतः उनको भारतीय हितों की रक्षार्थ आतंकी पाकिस्तान का किसी भी प्रकार का विरोध स्वीकार नही ? परंतु अब कुछ मुस्लिम राष्ट्र को मोदी जी के प्रयास के कारण संभवतः पाकिस्तान का प्रत्यक्ष विरोध अवश्य करना चाहिये।

जिस प्रकार से इजराइल के प्रधानमंत्री श्रीमान बेंजामिन नेतन्याहू ने सामान्य प्रोटोकॉल से हटकर अपने पूर्ण मंत्रिमंडल सहित मोदी जी का अपनी धरती पर स्वागत किया है, वह हम भारतवासियों के लिए बहुत गर्व की बात है | भारत-इजराइल संबधों को स्वर्ग से जोड़कर देखने वाले इजराइली प्रधानमंत्री ने भारतीय संस्कृति के प्रति अपने भावनात्मक उदगार से सभी भारतवासियों को अभिभूत कर दिया है। जबकि आलोचना करने वाले भारत विरोधी बुद्धिजीवी व “भारत की बर्बादी” के दुःसाहसी नारे लगाने वाला वर्ग यह अवश्य कह सकता है कि केवल 85 लाख की जनसँख्या वाला छोटा सा देश जिसका कुल क्षेत्रफल ही 20770 वर्ग किलोमीटर ही है, के द्वारा ऐसी औपचारिकता का कोई महत्व नहीं समझना चाहिए |

यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि जिस प्रकार मुंह के अंदर जीभ अपने चारों ओर कटीले दांतों से घिरी रहती है उसी प्रकार इस देश को चारों ओर से कट्टर मुस्लिम शत्रु देशों ने घेर रखा है। फिर भी यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि इजराइल छोटा अवश्य है परंतु अपने स्वाभिमान और अस्तित्व की रक्षार्थ उसके विराट रुप का संभवतः विश्व में कोई तोड़ नही है। अनेक क्षेत्रों में आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकियों से दक्ष यह राष्ट्र हमारे अतिरिक्त अन्य देशों को भी युद्ध सामग्रियों सहित ऊर्जा, कृषि,जल सरंक्षण आदि क्षेत्रो की तकनीकी भी निर्यात करता है। लगभग एक सौ वर्ष पुरानी एक ऐतिहासिक घटना भी हमें इजराइल से जोडती है। जब 22-23 सितंबर 1918 में प्रथम विश्व युद्ध के समय इजराइल के सबसे बडे बंदरगाह वाला नगर “हाइफा” की रक्षा में भारत के 44 सैनिको का बलिदान हुआ था। इन बलिदानियों की स्मृति में वहां ‘हाइफा शहीद स्मारक’ बना हुआ है तथा वहां के स्कूलों में इन भारतीय सैनिकों की वीरगाथाओं को भी पढ़ाया जाता है । नई दिल्ली में भी तीन मूर्ति चौक (अब हाइफा चौक ) इन्ही सैनिको की स्मृति में 1922 में बनाया गया था जहां तीन मूर्तियां जोधपुर, मैसूर व हैदराबाद की सेनाओं की प्रतीक है।

सदियों से अत्याचारों से पीड़ित हो रहें यहूदी धर्म को मानने वाले यहूदियों ने अपने लिये 1948 में एक अलग राष्ट्र “इजराइल” की स्थापना करके वास्तव में अपनी कर्मठता का अभूतपूर्व परिचय विश्व को कराया था जो आज भी प्रगति पथ पर तीव्र गति से अग्रसर है। यह कहना भी सार्वधिक उचित है कि भारत ने सदियों से पीड़ित यहूदी समाज को अपने यहां ससम्मान शरण देकर बसाया और उनको भारतीय समाज का एक अभिन्न अंग बनाने में सम्पूर्ण सहयोग किया। परिणामस्वरुप अनेक यहूदी भारत राष्ट्र की अभूतपूर्व सेवा करके भारत के प्रति अपनी विराट सह्रदयता का परिचय देते आ रहें है।

इसी संदर्भ में कुछ अलिखित पंक्तियां जिसका ज्ञान मुझे कुछ वर्ष पूर्व एक वरिष्ठ राष्ट्रवादी नेता से बातचीत में हुआ था, का भी उल्लेख यहां आवश्यक है , हो सकता है भविष्य में यह कभी उजागर ही न हो पायें और प्रमाणित भी न हो सकें…… * 1971 के भारत-पाक युद्ध में जब हमारी सेनायें ढाका की ओर बढ़ रही थी तब रुस व अमरीका आदि के दबाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने जनरल मानेकशा को उन्हें रोकने के लिए कहा और जनरल मानेकशा ने तत्काल उस क्षेत्र के कमांडर इन चीफ ले.जनरल जैकब को फोन करा परंतु “किसी कारणवश फोन अनसुना रहा ” ….और इस प्रकार हमने ढाका पर ऐतिहासिक विजय प्राप्त कर ली । यह एक ऐतिहासिक तथ्य है और इस युद्ध के समय पूर्वी पाकिस्तान (अब बंग्ला देश) को पाकिस्तान के अत्याचारों से मुक्त कराने वाले भारतीय सेना के एक यहूदी महानायक ले.जनरल जे.एफ.आर. जैकब को भुलाया नही जा सकता । इस जीत का श्रेय जाता तो ले. जनरल जैकव को था परंतु मिल गया जनरल मानेकशा को….अतः इतिहास में ऐसी बहुत सी घटनायें होती रहती है जो राष्ट्रभक्तो को नींव का पत्थर बनाती है। इसके साथ ही हमें यह नही भूलना चाहिये कि 1971 के युद्ध के समय जब अमरीकी राष्ट्रपति निक्सन भारत विरोध के लिये सक्रिय थे तब इजराइल की तत्कालीन प्रधानमंत्री गोल्डा मायर ने भी भारत को गुप्तरुप से आवश्यक युद्ध सामग्री उपलब्ध करवाई थी।

इस पर भी हम अपने दोस्त और दुश्मन की पहचान को रहस्यमय बनातें रहें। मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के वशीभूत इंदिरा गाँधी ने इजराइल के सबसे बड़े शत्रु फिलिस्तीन को सबसे पहले मान्यता दी और उसके “फिलिस्तीन मुक्ति संगठन” के अध्यक्ष यासिर अराफात को करोड़ों रुपये का ‘नेहरु शांति पुरस्कार’ 1980 में दिया था। इसके बाद राजीव गाँधी ने भी अपने कार्यकाल में उसको ‘इंदिरा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय शांति पुरस्कार’ दिया था।जब के समाचारो से ज्ञात हुआ था कि राजीव गाँधी ने तो उसको पूरे विश्व में घूमने के लिए एक बोईंग 747 विमान भी उपहार में दिया था। मुस्लिम परस्ती भारत के नेताओं में उस समय इतनी अधिक छायी हुई थी कि यासिर अराफात को छींक भी आती थी तब वो भागकर दिल्ली चला आता था और हमारे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा और राजीव गांधी आदि उसके लिए पलकें बिछाए रहते थे। यह वही यासिर अराफात था जिसकी इजराइल के सर्वविनाश की इच्छा उसके जीवन काल में भी पूरी न हो सकीं।

अतः आज भारत व इजराइल की अटूट मित्रता को धरती से स्वर्ग तक बनाये रखने व भविष्य में अनेक संभावित योजनाओं की सफलता में और अधिक सौहार्द बनाने के लिए भविष्य में “भारत रत्न” से स्व.जनरल जे.एफ.आर. जैकब को सम्मानित किया जाय तो इजराइलियों के साथ साथ भारत का राष्ट्रवादी समाज भी रोमांचित होकर झूम उठेगा।

विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक एवं लेखक)
गाज़ियाबाद



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