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श्री भागवत परिवार की तीर्थ यात्रा में सुंदर कांड, भजनों और शास्त्रीय नृत्य की त्रिवेणी

मुंबई, दिल्ली, आगरा, मुंबई, नेपाल और अमरीका से श्री भागवत परिवार की उत्तर प्रदेश की तीर्थ दर्शन यात्रा ‘आओ मेरे राम’ की यात्रा पड़ाव-दर-पड़ाव बढ़ने के साथ हुई वाराणसी में गंगा आरती के बाद वाराणसी के धर्मनिष्ठ पाठक परिवार के शानदार होटल रामेश्वरम् वाटिका में सुंदर कांड के परायण के साथ विश्राम लिया। यात्रा में शामिल 150 से अधिक तीर्थयात्रियों के लिए ये यात्रा एक अद्भुत, रोमांचकारी, पवित्र और अध्यात्मिक स्नान से भरपूर रही।

यात्रा में पूरे समय श्री अजय याज्ञिक और श्री वीरेंद्र याज्ञिक का सानिध्य यात्रियों के लिए एक सुकूनदायक अनुभव था। नैमिशरण्य तीर्थ की यात्रा के बाद ये यात्रा अयोध्या की पावन धरती पर पहुँची तो मानस भवन के शानदार आवास में यात्रियों की जमकर आवभगत हुई। यहीं पर श्री अजय याज्ञिक जी द्वारा सुंदर कांड की प्रस्तुति के साथ ही बैंगलुरू से आए यात्रियों ने मुंबई के तीर्थ यात्रियों का बैंगलुरू की परंपरागत पगड़ी और शाल पहनाकर स्वागत किया। अयोध्या में बहती हुई सरयू नदी के अंदर जाकर स्नान लाभ और बहती नदी की धार में खड़े होकर भगवान राम के पावन स्पर्श को महसूस करना अपने आप में एक रोमांचक व यादगार अनुभव था।

यात्रियों ने पवित्र श्री राम जन्म भूमि पर राम लला के दर्शन, हनुमान गढ़ी पर हनुमानजी के दर्शन का लाभ लिया और कनक भवन में श्री राम दरबार की भव्य आरती में शामिल हुए।

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अयोध्या से यात्रा लखनऊ होकर चित्रकूट पहुँची, जहाँ दास हनुमान श्रीधर धाम के भव्य और सर्वसुविधायक्त परिसर में ठहरने के बाद सभी ने नावों में बैठकर संध्या के समय मंदाकिनी नदी की आरती का आनंद लिया। दूसरे दिन सुबह चार बजे से कामता पर्वत की परिक्रमा, विष्णु जी की दुर्लभ मूर्ति के दर्शन के बाद, उस स्फटिक शिला के दर्शन किए जिस पर बैठकर माता सीता सरयू नदी के दर्शन करती थी, उनके पग चिन्ह लाखों साल बाद आज भी उस शिला पर मौजूद हैं। हनुमान सहस्त्र धारा के दर्शन भी यात्रियों के लिए रोमांचकारी थे। देर रात को श्री धाम में श्री अजय याज्ञिक जी का सुंदर कांड परायण शुरु हुआ जिसका समापन रात्रि 2 बजे हुआ। सुबह सुबह मंदाकिनी के बहते पानी में स्नान का पुण्य लाभ लेकर मुंबई, बैंगलुरू, दिल्ली और नेपाल व अमरीका से आए तीर्थ यात्री प्रयागराज के लिए रवाना हुए।

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प्रयागराज में याज्ञिक परिवार के प्राचीन हाटकेश्वर मंदिर में संध्या के समय भगवान शंकर का परंपरागत रुद्राभिषेक में शामिल होना एक विलक्षण अनुभव था। इस प्राचीन मंदिर के गर्भगृह में धोती पहने व्यक्ति को ही प्रवेश दिया जाता है और रुद्राभिषेक का लाभ भी वही ले पाए जिन्होंने धोती पहनी थी।

इलाहबाद में लेटे हनुमानजी के दर्शन और गंगा तट पर त्रिवेणी की धारा के दर्शन के बाद यात्रा अपने अंतिम पड़ाव काशी के लिए रवाना हुई। इलाहबाद और काशी के बीच स्थित माँ विंध्यवासिनी का दर्शन होना यात्रियों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। माँ विंध्यवासिनी के पट दोपहर 12 बजे बंद होते हैं और यात्रियों से भरी तीन बसें 11-35 पर विंध्यवासिनी मंदिर के नीचे पहुँची। इसके बाद पहाड़ी पर पैदल चलकर माँ विंध्यवासिनी के दर्शन करना थे। लेकिन ये अपने आप में चमत्कार ही था कि सभी लोग मात्र दस मिनट में पहाड़ी पर स्थित माँ के मंदिर में पहुँच गए और माँ विंध्यवासिनी के अद्भुदत स्वरुप के दर्शन कर पट बंद होने तक वहाँ रुके रहे। कई बार तो ऐसा लगा कि जो लोग तेज नहीं चल पाते हैं वो माँ के दर्शन नहीं कर पाएंगे लेकिन ये चमत्कार ही था कि सभी लोग समय के पहले ही पहुँच गए।

संध्या के समय काशी पहुँचते ही गंगा तट पर सर्वसुविधायुक्त बजरे पर गादी तकियों के शाही आसनों पर बैठकर गंगा के घाटों का भ्रमण करते हुए दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती के विहंगम स्वरूप का साक्षी बनना एक अलौकिक अनुभव था। बजरे पर ही तीर्थ यात्रियों के लिए चाट पकौड़ी की व्यवस्था ने इस आनंद को कई गुना कर दिया। गंगा की लहरों से उठती शीतल हवा तीर्थ यात्रियों को ये संकल्प दिला रही थी कि अगली बार फिर अपने परिवारजनों और मित्रों के साथ इस अद्भुत आनंद का साक्षी बनने आना होगा।

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काशी के होटल हिन्दुस्तान इंटरनेशनल में रात्रि को आयोजित शास्त्रीय नृत्य, संगीत और भजन ने इस यात्रा को एक नया आयाम दिया। इस अवसर पर यात्रियों ने अपने खट्टे-मीठे अनुभवों की चर्चा कर यात्रा के आयोजन को लेकर कई उपयोगी सुझाव दिए। शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुति गणेश वंदना से हुई। इसके बाद भजन गायिका सुश्री गोपा गौतम ने राम भजन प्रस्तुत किए। सुश्री ऋचा पांडे, प्रियंका यादव और सुजाता कुमारी ने शास्त्रीय नृत्य के साथ गणेश और शिव वंदना प्रस्तुत की। श्रीमती कल्पना याज्ञिक, श्रीमती सुनीता गोयल और गीता याज्ञिक ने इनका स्वागत किया।

आगरा से यात्रियों के दल को लेकर यात्रा में शामिल हुए श्री किशनजी ने कहा कि यात्रा में कई बार प्रतिकूल स्थितियाँ पैदा होती रही, लेकिन याज्ञिक भाईयों (श्री वीरेंद्र एवँ अजय याज्ञिकन) ने हर प्रतिकूलता को इतनी आसानी से अनुकूलता में बदला कि यात्रा का आनंद बढ़ता ही रहा। बैंगलुरू के श्री गोविंद सेठ ने कहा कि इस यात्रा से ये बात गहराई से समझ में आई कि ईश्वर के प्रति श्रध्दा हो तो हर काम आसान हो जाता है। उन्होंने कहा कि दोनों याज्ञिक भाईयों की राम-लक्ष्मण की जोड़ी ने अपने पुरुषार्थ, प्रताप और संपर्कों की संपदा से यात्रा में कहीं कोई कमी नहीं होने दी। श्री सुरेंद्र विकल ने कहा कि यात्रा कई मामलों में यादगार और प्रेरक रही लेकिन हमें इस दौरान हुई कमियों से कई बातें सीखने को भी मिली।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए श्री वीरेंद्र याज्ञिक ने कहा कि जीवन भी एक यात्रा है। इस यात्रा का आयोजन जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए की भावना को जीवन में आत्मसात करने के लिए किया गया है, लेकिन हम अपने व्यावहारिक जीवन में प्रतिकूलता आते ही राम को भूल जाते हैं, अगर हम प्रतिकूलताओं में भी यही भावना रखें कि राम की जो मर्जी होगी वही ठीक होगा तो हमारी जीवन यात्रा में हर क्षण, हर जगह आनंद बरसेगा, लेकिन हम ऐसा कर नहीं पाते हैं, इसलिए असली आनंद से वंचित रह जाते हैं।

श्री नरेंद्र रस्तोगी ने कहा कि इस यात्रा से हमें अध्यात्मिक अनुभव के साथ ही जीवन जीने की कई व्यावहारिक बातें भी सीखने को मिली।

श्री वीरेंद्र याज्ञिक ने कहा कि इस यात्रा को इतने सफलतापूर्वक आयोजित करने में बैंगलुरू के श्री विजय बंसल, श्री नरेंद्र रस्तोगी श्री रवि बलगारिया व श्री विनय टिबड़ेवाल, चेन्नई के श्री रामअवतार मोहता, मुंबई के श्री एसपी गोयल, श्री सुनील सिंघल, श्री सरेंद्र विकल, श्री सुभाष चौधरी, श्री लक्ष्मीकांत सिंगरोड़िया, श्री मधुसूदन सिंगरोडिया, आगरा के श्री किशन अग्रवाल, दिल्ली के श्री योगेश अग्रवाल व श्री ओमप्रकाश रस्तोगी और रायपुर के श्री बीएल बानी ने चार माह तक योजना बनाने से लेकर उनके क्रियान्वयन को लेकर जो मेहनत की उसका प्रतिफल था कि ये यात्रा इतने आनंद के साथ होती रही। अमरीका से आए श्री सूर्यकांत घापेकर और नेपाल से आए श्री प्रभुदयाल जी के लिए ये यात्रा उनके जीवन का एक अप्रतिम अनुभव थी।

यात्रा में मुंबई के श्री महावीर प्रसाद नेवटिया व बनमाली चतुर्वेदी शारीरिक मुश्किलों के बावजूद इसमें मुंबई से लेकर अयोध्या, चित्रकूट तक शामिल हुए। श्री किशन लाल मृगलानी अस्वस्थ होने के बावजूद पूरे जोश के साथ यात्रा में पूरे समय साथ रहे। यात्रियों के लिए श्री विश्वनाथ चौधरी और श्रीमती सावित्री चौधरी की गरिमामयी मौजूदगी किसी ऊर्जा पुंज की तरह थी, यात्रियों में सबसे बुज़ुर्ग दंपति की सक्रियता और सहभागिता ने सिखाया कि विनम्रता और सहज स्वीकार्य की भावना कैसे आपको रुपांतरित कर सकती है।

यात्रा का अंतिम पड़ाव जहाँ यात्रियों के बिछुड़ने का भावुक क्षण था वहीं वाराणसी के धर्मनिष्ठ पाठक परिवार ने अपने होटल रामेश्वरम वाटिका में श्री अजय याज्ञिक के सुंदर कांड के परायण के ने इसे एक यादगार अनुभव था तो पाठक परिवार के 90 वर्षीय बुज़ुर्ग की सुंदर कांड परायण में मौजूदगी ने इस आनंद को कई गुना बढ़ा दिया।

इस पाठ में श्रोता के रूप में आए पूज्य श्री राजेश्वरानंद जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति और अपने भजनों के साथ ही रामचरित मानस के विविध प्रसंगों की रोचक व्याख्या कर भगवान राम, हनुमानजी और रावण के चरित्र को एक नए रूप में प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए श्री वीरेंद्र याज्ञिक ने कहा कि गोमती के तट से शुरु हुई यह यात्रा गंगा के तट पर भगवान विश्वनाथ के चरणों में विश्राम ले रही है और ये हमारा परम सौभाग्य है कि हमारी इस यात्रा के विश्राम के साक्षी बनने पूज्य राजेश्वारनांद जी खुद पधारे हैं। रामचरित मानस में गरुड़ जी और कागभुषुंडि जी के संवाद की चौपाई नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं॥ का उल्लेख करते हुए कहा, दरिद्रता से बड़ा कोई दुःख नहीं और संतों का सानिध्य मिलने से बड़ा कोई सुख नहीं, और आज हमें राजेश्वारनंदजी के सानिध्य से यही सुख मिला है।

इन अध्यात्मिक अनुभवों, धार्मिक आख्यानों के साथ मुंबई के श्री भागवत परिवार की इस यात्रा ने विश्राम लिया।

इस यात्रा के सफलतापूर्वक आयोजन में सागा हॉलीडे रिज़ॉर्ट्स के श्री नीरज कुमार और उनके साथियों ने जो योजनाबध्द प्रक्रिया अपनाई और समय को साधने से लेकर यात्रियों को सुविधा उपलब्ध कराने के लिए जो मेहनत की उसके लिए सभी यात्रियों ने इन्हें ह्रदय से साधुवाद दिया।

मैं भागवत परिवार , मुंबई , सेवा टृस्ट , दिल्ली और कथा समिति- बंगलुरूको धन्यवाल देना चाहता हूं, जिन्होंने तीर्थ यात्रा का आयोजन बहुत ही सुन्दर ढंग से किया। मुझे अगली यात्रा का बहुत ही उत्सुक्ता पूर्वक ईंतजार रहेगा।
रामावतार मोहता – चैन्नई।

कृतज्ञता प्रगट कर पाना मनुष्य स्वभाव अंग होना आवश्यक है और इस की सीख इस यात्रा में बार बार मिली । इसके लिए मैं अपने रायपुर ग्रूप की तरफ से परम आदरणीय वीरेन्द्र व अजय भाई के प्रति आभार व्यक्त करता हूं। हम सब इस यात्रा के आयोजकों एवम् संचालकों के आभारी हैं । हम सभी सहयात्रियों के सौहाद्रपूर्ण सहयोग के लिए धन्यवाद देते हैं अागामी मिलन की प्रतीक्षा अभी से करने लगे हैं ।

विनय टिबरेवाल.



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