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भारती जी ने कहा, ‘सुबह जब चिरैया बोलन लागी’ ऐसा लिखो, और ये नाटक अमर हो गया

मुंबई की भाग-दौड़ की ज़िंदगी में महीने का एक रविवार ऐसा भी होता है जब मुंबई में साहित्य, संस्कृति, संगीत, नाटक, कला और सृजनात्मकता कि तमाम विधाओं से जुड़े लोग एक साथ इकठ्ठे होकर दुनिया के तमाम विषयों पर बात करते हैं, लेकिन वाद-विवाद नहीं होता। चौपाल में हर बार एक नया विषय होता है और उस विषय पर उस क्षेत्र का विशेषज्ञ खुले मन से अपनी बात ऱखकर श्रोताओं को त-तृप्त कर देता है।

इस बार चौपाल का आयोजन 25 दिसबर को था और इस अवसर पर जाने माने साहित्यकार, और धर्मयुग जैसी कालजयी पत्रिका से संपादक स्व. धर्मवीर भारती और भारतीय राजनीति के निर्विवाद व सर्वमान्य नेता श्री अटलबिहारी जी के जन्म दिन पर कई रोमांचक, अनसुने और उनके व्यक्तित्व को एक नया आयाम देने वाले संस्मरण श्रोताओँ के लिए एक अद्भुत अनुभव था। इसके साथ ही नोटबंदी के इस दौर में सिक्कों का रोमांचक इतिहास भारतीय अभिलेखागार के डॉ.संजय गर्ग ने जब रोचक अंदाज़ में पेश किया तो तालियाँ और वाह वाह की दाद बार बार गूँजती रही। संगीतकार आलोक भट्ट ने स्व. भारतीजी के अमर नाटक अंधायुग के गीतों को अपने साथियों के साथ संगीत के अद्भुत प्रयोगों से प्रस्तुत कर एक अलग ही समाँ बाँध दिया।

जाने माने फिल्म पटाकथा लेखक, समीक्षक, शोधकर्ता एवँ नाट्यकर्मी, अभिनेता श्री अतुल तिवारी ने अटलजी के पैतृक गाँव से लेकर उनकी शिक्षा दीक्षा और प्रधान मंत्री बनने तक के सफर को कई नई और रोमांचक जानकारियों के साथ प्रस्तुत किया। अतुल जी राष्ट्रीय अभिलेखागार से अटल जी 1946 में अभ्युदय में प्रकाशित वो कविता भी खोज लाए जो अटलजी की पहली कविता तो है ही, इसके बारे में अभी तक किसी को कुछ पता ही नहीं है। अभ्युदय के प्रकाशन की शुरुआत 1909 में स्व. मदन मोहन मालवीय ने की थी और उनके निधन के बाद उनके परिवार के लेग इसका प्रकाशन कर रहे थे। अटलजी ने 1857 की क्रांति से उपजे भारतीयों के रोष को इस कविता में जिस ओज, राष्ट्रभक्ति से कलमबध्द किया था उसे सुनना एक दुर्लभ अनुभव था। इस कविता को स्वर दिया जाने माने अभिनेता श्री विष्णु शर्मा ने, जिन्हें हाल ही में अपनी रौबदार आवाज़ के लिए दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

अटलजी की इस दुर्लभ कविता का पाठ करते हुए श्री विष्णु शर्मा ने एक जोरदार संस्मरण पेश किया। उन्होंने बताया कि 80 के दशक की बात है मैं तब दिल्ली में नाटक और वॉईस ओवर के क्षेत्र में स्थापित हो चुका था। तब एक दिन अटलजी से मिलना हुआ। उन्होंने मेरा परिचय गजरात के नरेंद्र नाम के एक युवक से कराते हए कहा, यार तुम तो यहाँ अच्छा खासा कमा रहे हो अगर तुम्हारे पास थोड़े पैसे हों तो नरेंद्र को एक दो कुरते पायजामा दिलवा दो। मैंने उस युवक को दिल्ली के खादी भवन से कुरते पायजामे दिलवा दिए। बात आई गई हो गई। एक बार मैं बीबीसी की ओर से एक इंटरव्यू के लिए अहमदाबाद में मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी से मिलने गया, जब उन्होंने मुझे देखा तो देखते ही कहा, मुझे वो कुरते पायजामे आज भी याद है।

श्री विष्णु शर्मा ने बताया कि हिंदी में मेरी जो आज पहचान बनी है वो अटलजी की वजह से ही है। एक बार अटलजी मेरे स्कूल में वाद-विवाद प्रतियोगिता में आए थे और मैने एक अंग्रेजी वाद-विवाद में प्रतियोगिता में मुझे प्रथम पुरस्कार मिला था। मेरे भाषण के बाद अटलजी ने मुझे बुलाया और कहा, तुम बहुत अच्छा बोलते हो हिंदी में क्यों नहीं बोलते हो। इसके बाद से मैने हिंदी ओर ध्यान दिया और आज हिंदी की वजह से ही मेरी अभिनय से लेकर वाईस ओवर के क्षेत्र में पहचान बनी।

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चौपाल हो और अगर बिंदलजी, अतुलजी और शेखर जी (शेखर सेन) न हों तो चौपाल अधूरी अधूरी सी ही लगती है। इस बार शेखर जी ने चौपाल में स्वर्गीय धर्मवीर भारती से जुड़े संस्मरणों को जिस अंदाज़ में पेश किया वो शायद शेखरजी ही कर सकते हैं। स्व. भारतीजी से पहली मुलाकात की द करते हुए शेखर दा ने बताया कि 1984 में मैने मुंबई में स्व. दुष्यंत कुमार पर पहला कार्यक्रम किया किया तो कार्यक्रम के बाद भारती जी ने मुझसे कहा कि तुम मध्ययुगीन कवियों पर कुछ काम करो। उन्होंने मुझे रसखान की पुस्तकक भी दी। 1989-92 के बीच भारती जी मुंबई के बाँबे अस्पताल में भर्ती रहे थे तब पुष्पा भारती जी ने 24 घंटे लगातार उनकी जिस तरह सेवा की वो एक अविस्मरणीय अनुभव है। एक दिन आईसीयू में ही भारती जी ने मुझे बुलाया और अपना मास्क हटाकर कहा कि पद्माकार का छंद और गंग की कविताएँ देते हुए कहा, इन्हें कोई नहीं गाता है तुम इनको गाओ। भारती जी ने मुझे उस समय बुलाकर ये बात कही जब वे 6 हर्ट अटैक के बाद आईसीयू में ज़िंदगी और मौत से संघर्ष कर रहे थे।

शेखर सेन ने बाताया कि नियती कैसे रिश्तों को निकटता में बदल कर हमें बुहत कुछ सोचने को मजबूर कर देती है। उन्होंने कहा कि मेरे 6 माह के बेटे का अन्नप्राशन करवाने के लिए मुझे रायपुर जाना था। इसके बाद भारजी जी से मिलना हुआ तो उन्होंने कहा कि हम भी इसका अन्न प्राशन करेंगे। हमारे परिवार में अन्नप्राशन 1912 में पूर्वजों द्वारा खरीदी गई चादी की कटोरी और चम्मच से ही होता है, लेकिन ये चम्मच और कटोरी मेरी बहन के घर थे। संयोगवश मुझे अपनी बहन के यहाँ से इस कटोरी और चम्मच का कोरियर तभी आया जब मुझे भारती जी के घर अपने बेटे को अन्नप्राशन केलिए लेकर जाना था। पुष्पा भारती जी ने खीर बनाई और भारतीजी ने खीर खिलाकर मेरे बेटे का अन्नप्राशन करवाया।

शेखर जी बोलते जा रहे थे और चौपाली सुध-बुध खोकर उनके एक एक शब्द को मानो पी रहे थे। शेखरजी ने बताया कि 1997 में मैने पहला नाटक तुलसी दास पर लिखा और ये आधा ही लिखा था। मैं इस आधे लिखे नाटक को भारती जी को सुनाकर इसके आगे लिखना चाहता था। एक दिन भारतीजी को घर जाकर ये नाटक सुनाया तो पुष्पाजी और भारती जी की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने कहा कि साहित्य जब तक कागजड पर नहीं उतर जाए वह कृति नहीं बनता। इसे पूरा लिखो और मुझे फिर से सुनाना।

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मैने पूरा नाटक लिखा और दोबारा उन्हें सुनाने गया तो एक जगह टोककर नाटक के एक दृश्य में उन्होंने मुझे सुझाव दिया कि इसमें प्रातःकाल पक्षियों में कलरव हुआ की जगह अवधी में इस तरह लिखो सुबह चिरैया बोलन लागी तो यह दृश्य ज्यादा जीवंत लगेगा। शेखरजी ने कहा, आज मैं अनुभव करता हूँ कि इस छोटी सी पंक्ति से पूरा दृश्य संगीत से भर गया है।

शेखर सेन कहते जा रहे थे। उन्होंने कहा कि मैं चाहता था कि ये नाटक किसी प्रसिध्द निर्देशक के निर्देशन में और किसी स्थापित कलाकार के अभिनय से खेला जाए। इस संबंध में भारती जी का कहना था कि इसका निर्देशक कौन होगा ये तुम्हें मैं बताउंगा। भारतजी का नाटक अंधा युग देश के जाने माने निर्देशकों ने कई मंचों पर प्रस्तुत किया था और मुझे लगा कि वो किसी ऐसे स्थापित निर्देशक का नाम देंगे कि मेरा नाटक सफल हो जाएगा। लेकिन एक दिन भारती जी ने मुझसे कहा कि इसमें अभिनय भी तुम करोगे और निर्देशन भी तुम ही करोगे। मैने उनके सामने अन्नू कपूर और रघुवीर यादव का नाम लेते हुए कहा कि इन दोनों में से किसी को ले सकते हैं। तो उन्होंने कहा कि इसमें भक्ति का भाव होना चाहिए, और ये तुम ही कर सकते हो।

शेखर दा ने बताया कि इस नाटक को तैयार करने में मुझे एक साल लगा, लेकिन इसी बीच भारती जी इस दुनिया में नहीं रहे। लेकिन जब इस नाटक की पहली प्रस्तुति भाईदास हाल में हुई तो पुष्पाजी खुद नाटक देखने आई और उनके बगल में जिस मेहमान के लिए सीट रखी थी, वो मेहमान किसी वजह से नहीं आए और सीट खाली ही रही। इस नाटक की हर प्रस्तुति में ऐसा संयोग बना कि जिस मेहमान के लिए पुष्पाजी के बगल वाली सीट खाली रखी जाती वो नहीं आ पाता था। तब मुझे एहसास हुआ कि मेरा नाटक देखने खुद भारती जी आते हैं और यही वजह है कि वो मेहमान नहीं पहुँच पाता है जिसके लिए ये कुर्सी रखी जाती है। मैं इसे अंधविश्वास न मानकर अपने जीवन का सबसे कीमती अनुभव मानता हूँ कि रिश्ते ऐसे होते हैं कि रिश्ते पालने वाला अपनी मौत के बाद भी आपको छोड़कर नहीं जाता, बल्कि हर समय आपको प्रोत्साहित करता रहता है।

भावनाओं का ये पवित्र एहसास शेखर सेन जैसे लोग ही कर पाते हैं।

शेखर जी जब बोलते हैं तो ऐसा लगता है मानो शब्दों का कोई मीठा समंदर अपनी लहरों से बार बार हमें भिगो रहा है। एक और घटना सुनाते हुए शेखरजी ने कहा, बीमारी के बाद भारती जी बहुत कमजोर हो गए थे। तब मैने उनके साथ काम कर रहे सुमन सरीन, कैलाश सेंगर, अवधेश व्यास से चर्चा कर ये तय किया कि हम ऐसा कुछ करें कि भारती जी को जीवन जीने की उर्जा मिले। इसके बाद हमने एक कार्यक्रम किया मेर वाणी जिसमे उनके गीतों को गाया गया। इस कार्यक्रम में शरद जोशी से लेकर इस्मत चुगताई जैसे लोग आए। जब भारती जी ने अपनी रचनाओं का गायन सुना तो उनके चेहरे पर किसी बच्चे जैसी प्रफुल्लता थी, हमने महसूस किया कि जो हमने सोचा था वो हो गया। भारती जी अब एक मरीज नहीं उर्जा और जोश से भरे हुए लग रहे थे। शेखर दा ने कहा कि किसी भी रचनाकार की सबसे बड़ी पूँजी उसकी रचना ही होती है और वह रचना जब मंच पर अवतरित होती है तो रचनाकार को एक नई उर्जा देती है।

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उन्होंने कहा कि भारती जी ने धर्मयुग जैसी कालजयी पत्रिका के माध्यम से देश के साहित्य, कला, संस्कृति, परंपरा, मूल्यों, जीवन दर्शन, धर्म सहित कई गूढ़ विषयों से आम पाठकों से परिचित कराया और इसके साथ ही उन्होंने सबसे बड़ा काम किया हिंदी और उर्दू को जोड़ने का।

शेखर जी ने भारती जी की रचना दीदी के धूल भरे पाँव प्रस्तुत की तो अपना गाँव घर छोड़कर मुंबई की भाग-दौड़ की दुनिया में फाँफते भागते चौपालियों के बचपन और गाँव क मधुर स्मृतियाँ जीवंत हो उठी।
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दीदी के धूल भरे पाँव
बरसों के बाद आज
फिर यह मन लौटा है क्यों अपने गाँव;
अगहन की कोहरीली भोर:
हाय कहीं अब तक क्यों
दूख दूख जाती है मन की कोर!

एक लाख मोती, दो लाख जवाहरवाला,
यह झिलमिल करता महानगर
होते ही शाम कहाँ जाने बुझ जाता है-
उग आता है मन में
जाने कब का छूटा एक पुराना गँवई का कच्चा घर
जब जीवन में केवल इतना ही सच था:
कोकाबेली की लड़, इमली की छाँव

शेखर सेन तुलसी, सूरदास, कबीर, विवेकानंद जैसे कालजयी व्यक्तित्वों पर दुनिया भर में 1500 से अधिक एकल नाटक प्रस्तुत कर चुके है, जिसमें लेखन और निर्देशन से लेकर अभिनय भी शेखर सेन का ही है।

कार्यक्रम में जब संगीतकार आमोद भट्ट ने भारती जी की रचनाओँ को संगीत में प्रस्तुत कर इस आयोजन को एक नई ऊँचाई प्रदान की। श्री आमोद भट्ट देश के ऐसे संगीतकार हैं जो नाटकों को संगीत देने के लिए ही नहीं जाने जाते हैं बल्कि भारती जी के अंधा युग को 1983 से लेकर जितने भी निर्देशकों ने प्रस्तुत किया है, उन सब में संगीत उन्होंने ही दिया है।

और ऐसा नहीं है कि इस पूरी रिपोर्ट में चौपाल का पूरा किस्सा बयान हो गया है ये तो जो मुझे याद रहा वो लिख दिया, छूट तो वह गया जो इससे भी ज्यादा अनमोल था। एक एहसास, एक संस्कार और सबसे बड़ी चीज मुंबई जैसे शहर में बगैर किसी स्वार्थ और अपेक्षा के साहित्य, कला, संस्कृति से जुड़े ऐसे श्रोता जो अपनी सुनाने नहीं मात्र सुनने आते हैं।

चौपाल में डॉ. संजय गर्ग सिक्कों की एक ऐसी दुनिया लेकर आए थे जिस पर अलग से एक लेख लिखना होगा।

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