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कोरोना के दंश से बेपटरी होता भीलवाड़ा का टेक्सटाइल उद्योग

विश्वव्यापी कोरोना के दंश से जहाँ अनेक क्षेत्र प्रभावित हुए हैं वहीं भीलवाड़ा का इंडिया फेम टेक्सटाइल उद्योग भी बुरी तरह से प्रभावित हो कर बेपटरी हो गया हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि करीब 40 हज़ार करोड़ सालाना टर्नओवर का यह उधोग इस कदर लड़खड़ाया कि औंधे मुंह गिर पड़ा और जमीन पर आ गया। कपड़ा बनना कम हो गया, कारखानों की मशीनें थम गई, प्रोसेस हाउस की गति धीमी हो गई, व्यापारी अपने को लूटा-पीटा महसूस कर रहे हैं। वस्त्र उद्योग के श्रमिकों के हालात और भी सोचनीय हैं।

करीब दो माह के लोक डाउन के बाद भी कई दिनों तक शहर को कर्फ्यू की मुसीबतें झेलनी पड़ी। जब उद्योगों को शुरू करने का समय आया तो नियमों की बाध्यताओं से इकाइयां खोलने एवं संचालन करने में एड़ी-पंजे का जोर लगाना पड़ा। खैर, समय आगे बढ़ा ,कुछ वस्त्र उद्योगों और इकाइयों ने धीमी गति से ही सही उत्पादन शुरू किया। देश में ख्यात वस्त्र उद्योग कारोबारियों को उम्मीद हैं कि आने वाले कुछ महिनों में शायद बेपटरी हुआ यह उद्योग पटरी पर आने की दिशा में गति पकड़ सके। व्यवसाय के जनकारों का कहना है कि करीब 30 फीसदी व्यापार ने गति पकड़ी है।

भीलवाड़ा टेक्सटाइल्स उद्योग की दशा और दिशा पर नज़र डालें तो यहाँ का वस्त्र उद्योग भीलवाड़ा का ही नहीं वरन् भारत का सबसे प्राचीन उद्योग है। राजस्थान राज्य की आर्थिक प्रगति में रीढ़ की हड्डी की तरह योगदान कर रहा है । इस उद्योग का वार्षिक टर्न ओवर एक वर्ष पूर्व के आंकड़ों के मुताबिक करीब 40 हज़ार करोड़ रुपये है। यह कृषि के बाद संगठित एवं असंगठित क्षैत्रों में सर्वाधिक रोजगार देने वाला उद्यम है। स्वतन्त्रता से पूर्व राजस्थान में दस टैक्सटाइल मिल कार्यरत् थी। उस समय के मेवाड़ राज्य में प्रथम टैक्सटाइल मिल मेवाड़ टैक्सटाइल मिल के नाम से भीलवाड़ा में 1935 में स्थपित की गई। भीलवाड़ा में गिनींग मिल की भी स्थापना की गई। वर्ष 1961 में भीलवाड़ा समूह के संस्थापक श्री लक्ष्मी निवास झूनझून वाला द्वारा एक स्पीनिंग मिल की स्थापना की गई। इस समूह द्वारा जिसका अब 4500 करोड़ का साम्राज्य है 2011 में अपनी स्थापना की स्वर्ण जंयती मनायी गई।

 

भीलवाड़ा जिले में इससे उद्योगों के विकास एवं उद्यमियों को प्रोत्साहन की भावना को बल मिला, जिससे भीलवाड़ा संसार के नक्शे पर उद्योंग के प्रकाश पुॅज की तरह उभर कर आया। वर्तमान में यह देश का एक प्रमुख औद्योगिक शहर है जिसका पी.वी सूटिंग्स के क्षेत्र में देश में अग्रणीय स्थान है।

भीलवाड़ा का पोलिस्टर विस्कोस मिश्रित यार्न के उत्पादन में भी अहम् योगदान है। यहां पुराने क्षेत्रों में 18 स्पिनिंग मिलों एवं 5 स्वतन्त्र स्पीनिंग मिलों से अनुमानित 2. 80 लाख टन पीवी एवं कॉटन यार्न का उत्पादन होता है। राज्य के कुल यार्न उत्पादन में अकेले भीलवाड़ा का सर्वाधिक योगदान है। वर्ष 2005 में मल्टी फाइबर एग्रीमेंट समाप्त होने के बाद स्पीनिंग इकाईयों का तीव्र गति से विस्तार हुआ। उस समय की 2.68 लाख इकाइयां थी जो दो वर्ष में बढ़कर 9.65 लाख तक पहुंच गई। स्पीनिंग सेक्टर के पास लगभग 21172 रोटर्स भी हैं । मिलों में लगभग 1552 लूमस एवं 58 बुनाई मशीनें हैं। इन मिलों का सालाना निर्यात् 2500 करोड़ रुपये के लगभग है।

विकेद्रित क्षेत्रों में 60वीं सदी में कुछ पावर लूम इकाईयां स्थापित की गई एवं करीब 200 सैंकड हैंड वीविंग लूम्स यहाँ कार्य कर रही थी। एक सीडिंग प्लान्ट इनकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये भी स्थापित किया गया। उस समय 3 वेस्ट कॉटन यार्न के उद्योग भी कार्यरत् थे। उस दौर में काटन निवार बनाने की मैन्यूफैक्चरिंग इकाईयां भी बड़ी संस्था में स्थापित की गई, जिन्होंने अन्य महतवपूर्ण नीवर बनाने वाली इकाईयों जो हाथरस, पानीपत एवं मथुरा में स्थापित थी के अधिपत्य को समाप्त कर दिया।

सन् 70 में भीलवाड़ा ग्रुप ने दुबारा पीवी शूटिंग्स में बढ़त हासिल की एवं 24 सिमको लूम्स की इकाईयां स्थापित की गई। वर्ष 1978 में रीको क्षेत्र में तीन इकाइयॉ और स्थापित की गई। सन् 80 में लूम्स इकाइयों को लगाने के लिये भारत सरकार से औद्योगिक लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य हो गया। इस दौरान व्यवसायिक क्षेत्रों में 5-6 इकाइयां एवं अन्य क्षेत्रों में 7-8 इकाइयों की स्थापना ही की जा सकी। आगे चल कर वर्ष 1988 में जब लाइसेंस की अनिवार्यता हटा दी गई तो औद्योगिक विकास में तेजी आई एवं 1988 से 1991 के मध्य 70-80 वीविंग इकाईयों की स्थापना की गई । सितंबर2020 में 460 वीविंग इकाईयां हैं, जिनमें लगभग 17,000 आधुनिक तकनीकी युक्त लूम्स लगी हैं। इन इकाईयों से सालाना 75-80 करोड़ मीटर पीवी सूटिंग्स का उत्पादन हो रहा हैं।

प्रोसेस सेक्टर
प्रोसेसिंग सेक्टर में भी भीलवाड़ा समूह द्वारा 1973 -74 में प्रथम् प्रोसेस हाउस भीलवाड़ा प्रोसेसर्स लिमिटेड़ की स्थापना कर नई पहल की गई। वर्तमान में भीलवाड़ा में आधुनिक तकनीकी युक्त 19 प्रोसेस हाउस स्थपित हैं, जिनकी क्षमता 90 करोड़ मीटर पीवी सूटिंग्स प्रोसेस करने की है। स्पीनिंग में राज्य की कुल 42 मिलों में से 18 मिलें भीलवाड़ा में स्थापित हैं। यहाँ 3.20 लाख टन यार्न का उत्पादन होता है जो राज्य के कुल यार्न उत्पादन का 45 फीसदी है। कुल स्पीनडलेज 11.00 लाख है। राज्य के कुल यार्न के निर्यात में भीलवाड़ा का 75 फीसदी योगदान है। भीलवाड़ा में कार्यरत 17,000 लूम्स में से आधुनिक टैक्नोलाजी से लैस 15,000 लूम्स हैं । लूम्स के आधुनिकीकरण में भीलवाड़ा की विकास दर 9.57 फीसदी है जबकि देश में यह 8 फीसदी है। टैक्सटाइल समूह से मिलते वाला कुल टर्नओवर 25000 करोड़ रुपये है। यार्न एवं फेब्रिक का कुल निर्यात् 3800 करोड़ है। टैक्सटइल उद्योग प्रत्यक्ष रूप से 85,000 व्यक्तियों एवं अप्रत्यक्ष तौर से 60, 000 व्यक्तियों को रोजगार उपलब्ध है।

स्पीनिंग सैक्टर
वर्ष 2005 में मल्टी फाइबर एग्रीमेन्ट समाप्त होने पर स्पीनिंग सैक्टर में भीलवाड़ा का तीव्र विकास हुआ तथा वर्ष 2018 तक 83,896 नई स्पीन्डलस स्थापित की गई , जिनकी कार्यक्षमता तुलनात्मक रूप से 75 प्रतिशत थी। वर्ष 2005 में राजस्थान में स्पीन्डल्स की संख्या 9,79,197 थी जबकि भीलवाड़ा में यह 2,68,56 थी। वर्ष 2018 में राजस्थान में स्पीन्डल्स की संख्या 22,31,408 थी जबकि अकेले भीलवाड़ा में 11,00,352 थी। ( राजस्थान में स्पींनिग इकाइयों में लगभग 37,648 रोटर्स लगे हुए हैं जिनमें से 31,352 भीलवाड़ा – बाँसवाड में स्थापित हैं जिनकी कार्य क्षमता 83.27 प्रतिशत है) ।

स्पीनिंग उद्योग में आधुनिक मशीनों का उपयोग भी किया जा रहा है, जिनमें मुख्य इकाई लक्ष्मी मशीन वर्क्स है। आयातित मशीनों में स्वीटजरलैण्ड से रिएक्टर एवं लूवा ,जर्मनी से त्रुजस्चले एवं सेवीयो, ईटली से लोपटेक्स एवं सवियो मशीनें लाई गई हैं। राजस्थान में भीलवाड़ा पहला केंद्र है जहाँ एयरजेट स्पिनिंग टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जा रहा है और सिल्क यार्न का उत्पादन होता है।

वीविंग सैक्टर
राजस्थान राज्य की कुल 22,000 पावर लूम्स में से करीब 17,000 पावर लूम्स भीलवाड़ा में हैं। जिनकी कार्यक्षमता तुलनात्मक रूप से 77 प्रतिशत है। यहाँ 440 से ज्यादा विवींग ईकाईयाँ है। भीलवाड़ा से 85 से 90 करोड़ मीटर पोलिएस्टर, वूल , मोडल पोलीएस्टर, विस्कोस, लाइका पोलीएस्टर , लाइक सिल्क फेब्रिक का उत्पादन होता है जिसकी कीमत 9000 करोड़ प्रति वर्ष है। यह देश में पीवी सूटिंग्स के कुल उत्पादन का 45 फीसदी है। यहाँ अच्छी गुणवत्ता युक्त कई स्थापित ब्रान्डेड जैसे बीएसएल, मयूर,बीडी सूटिंग्स एवं संगम आदि का उत्पादन होता है। यहाँ की सूटिंग्स की निर्यात बाजारों में अच्छी खासी मांग हैं। यहाँ से सालाना 7 – 8 करोड़ मीटर फेब्रिक का निर्यात जाता है जिसकी कीमत 550 करोड़ रुपये है। भीलवाड़ा देश का प्रमुख वस्त्र उद्योग केन्द्र होने के कारण बड़ी संख्या में व्यापारियों ने यहाँ अपना व्यापार जमाया है। इनमें से अनेक व्यापारी कार्यादेश पर अपनी आवश्यकता पूरी करवाते हैं एवं कई व्यापारियों ने स्वंय की लूम स्थापित कर मैन्यूफैक्चरिंग कर रहे हैंं। यहां सलजर इक्पोर्टेड शटललेस लूम्स, डोरनीयर एंड रेपीयर शटललेस लूम, पीकेनाल लूम, एयरजेट लूम, वाटरजेट लूम, एवं सीमकों लूम प्रमुख हैं।

डेनिम – फलोक फेब्रिक
कुछ इकाइयों ने डेनिम फैब्रिक्स का उत्पादन भी शुरू किया है। संगम इंडिया सालाना 6.50 करोड़ मीटर ,आर.एस. डब्लू एम.लिमिटिड 2.50 करोड़ मीटर, कंचन इंडिया लिमिटेड 12.00 करोड़ मीटर डेनिम का उत्पादन करती हैं। इनके अतिरिक्त मेनोमें टैक्स इंडिया, सुपर गोल्ड, बाँसवाड़ा सिंटेक्स लिमिटेड भी डेनिम उत्पादन में अगणी इकाइयाँ हैं।

संगम इंडिया लिमिटेड की ओटून इकाई से फ्लोक थर्मल कर्टेन , वेलोर फैब्रिक्स एवं अपहोलसट्री फैब्रिक का सालाना 40 लाख मीटर का उत्पादन होता है। संगम इंडिया लिमिटेड से सालाना 36 लाख मीटर सीमलेस गारर्मन्ट का उत्पादन किया जाता है।

निर्यात में अग्रणी जिला मेवाड़ वाणिज्य एवं उद्योग चैम्बर द्वारा 2006 से किये जा रहे अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप वाणिज्य मंत्री श्री कमल नाथ द्वारा भीलवाड़ा को “टाउन ऑफ एक्सपोर्ट एक्सीलेंसी” घोषित किया गया। इससे सम्बन्धित गजट नोटिफिकेशन 26 फरवरी 2009 को किया गया। इस घोषणा के साथ ही भीलवाड़ा में समान सेवारत् कर्मचारियों को इपीसीजी स्कीम का लाभ मिलने लगा। मार्केट ऐक्सेस इनिशिएटिव स्कीम के तहत केन्द्र सरकार द्वारा तकनीकि विकास के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की गई। स्किम के तहत आधारभूत ढाँचे के निर्माण में होने वाली परेशानियों से निपटने के लिए सहायतार्थ हेतु उपलब्ध करवाये जाएंगे।

संपर्क
शिखा अग्रवाल
1-F-6, ओल्ड हॉसिंग बोर्ड,
शास्त्री नगर,
भीलवाड़ा(राजस्थान)

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