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वो बड़ा खेल और भारत

उन्नीसवीं शताब्दी में और बीसवीं शताब्दी के शुरु में एशिया में अपना प्रभुत्त्व जमाने के लिए रूसी साम्राज्य और ब्रिटिश साम्राज्य के बीच खींचतान हुई। इस खींचतान को तब नाम दिया गया था – द ग्रेट गेम यानी वो बड़ा खेल।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विश्व राजनीति में रूसी और ब्रिटिश साम्राज्यों के बीच भारत विवाद के केन्द्र में आ गया था। भारत के चारों तरफ़ ही तब घटनाओं का ऐसा जाल बुन गया था, जिसमें मध्य एशिया में हुए बड़े-बड़े युद्धों से लेकर रूसी और ब्रिटिश गुप्तचर संगठनों की गोपनीय गतिविधियाँ तक बहुत-कुछ शामिल है। ये सभी घटनाएँ क़रीब आधी शताब्दी तक फ़ारस से लेकर तिब्बत तक एशिया के विशाल इलाके में घटीं। लन्दन में इन घटनाओं को नाम दिया गया — द ग्रेट गेम यानी वो बड़ा खेल और रूस की तत्कालीन राजधानी पितेरबुर्ग में इसे तब ‘छायाओं की प्रतियोगिता’ कहकर पुकारा गया था।

ब्रिटेन के लिए तब भारत उसके साम्राज्य का एक महत्त्वपूर्ण अंग था, बल्कि कहना चाहिए कि भारत की वज़ह से ही ब्रिटेन को साम्राज्य माना जाने लगा था। 1876 से महारानी विक्टोरिया को हर मेजेस्टी विक्टोरिया, बाय द ग्रेस ऑफ़ गॉड, ऑफ़ द यूनाईटिड किंगडम ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन एण्ड आयरलैण्ड क्वीन, डिफ़ेण्डर ऑफ़ फ़ेथ, ऐम्प्रेस ऑफ़ इण्डिया यानी ईश्वर की कृपापात्र, महामहिम विक्टोरिया महान् सँयुक्त ब्रिटेन राज्य और आयरलैण्ड की रानी, विश्वास की रक्षक, भारत की महारानी कहा जाने लगा।

एक उपनिवेश के रूप में भारत ब्रिटेन के लिए अपने प्राकृतिक संसाधनों की वज़ह से महत्त्वपूर्ण था। ब्रिटेन ने भारत को अपने नागरिकों की समृद्धि बढ़ाने के लिए तथा अपने शहरों के औद्योगिकरण के लिए एक वित्तीय स्रोत के रूप में देखा। इसके अलावा भारत ब्रिटिश माल, सबसे पहले ब्रिटिश कपड़े की बिक्री का एक असीमित बाज़ार था। और एशिया में ब्रिटेन के पैर जमाने के लिए एक रणनीतिक अड्डे के रूप में तो उसका महत्त्व था ही।

प्रसिद्ध रूसी गुप्तचर और विद्वान आन्द्रेय स्नेसारफ़ ने, जिन्हें उनके समकालीन सहयोगी उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी की सीमा पर एक बड़े भूराजनीतिक विश्लेषक की उपाधि से नवाजते थे, अपनी पुस्तक ‘मध्य एशिया के सवाल पर भारत एक मुख्य तत्त्व’ में अपने ऐतिहासिक विश्लेषण से जुड़े तथ्य प्रस्तुत किए हैं। 1757 में प्लासी के युद्ध में कर्नल राबर्ट क्लाइव ने बंगाल के नबाव की सेना को बुरी तरह से हरा दिया। इस युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद भारत की सम्पदा इंगलैण्ड की ओर बहने लगी।

आन्द्रेय स्नेसारफ़ अपनी पुस्तक में लिखते हैं — इस लड़ाई में जीत प्राप्त होने तक इंगलैण्ड एक ग़रीब और औद्योगिक रूप से पिछड़ा हुआ देश था, जिसके पास अपने कारख़ानों को चलाने के लिए पूँजी का अभाव था। छोटे-छोटे नगरों वाले इंगलैण्ड के निवासियों के घरों में तब तेल की ढिबरियाँ जला करती थीं। सम्पदा और औद्योगिक दृष्टि से इंगलैण्ड तब न केवल फ़्राँस और हालैण्ड जैसे यूरोप के बहुत से देशों से काफ़ी पिछड़ा हुआ था, बल्कि वह भारत से भी काफ़ी पिछड़ा हुआ था। इंगलैण्ड ने अट्ठारहवीं शताब्दी के मध्य में जो औद्योगिक पलटी खाई, उसमें भारत से इंगलैण्ड पहुँचने वाली धन-सम्पदा का बहुत बड़ा हाथ है। ठीक-ठीक कहा जाए तो इंगलैण्ड को अपनी सम्पन्नता के लिए भारत का कृतज्ञ होना चाहिए। अट्ठरहवीं सदी के साठ के दशक के बाद इंगलैण्ड समृद्ध होता चला गया और इंगलैण्ड की इस समृद्धि के लिए भी अप्रत्यक्ष तरीके से और मुख्य रूप से भारत ही ज़िम्मेदार था।

ख़ुद अँग्रेज़ लोग भी इस बात से ख़ूब अच्छी तरह से परिचित थे कि एक उपनिवेश के रूप में भारत उनके लिए कितना क़ीमती है और वे उसे ‘ब्रिटिश मुकुट का एक रत्न’ कहकर पुकारते थे। इसलिए इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि भूराजनीतिक स्तर पर या वास्तविक स्तर पर दूसरी महाशक्तियों की तरफ़ से भारत के लिए पैदा होने वाला कोई भी ख़तरा अँग्रेज़ों के लिए गहरी रात को देखे जाने वाले एक दुःस्वप्न में बदल जाता था। तभी तो किसी भी सम्भावित हमलावर से हिन्दुस्तान की सुरक्षा करना ब्रिटिश साम्राज्य के लिए बेहद ज़रूरी हो गया था।

इसलिए जब रूस ने मध्य-एशिया की तरफ़ अपने क़दम बढ़ाने शुरू किए तो ब्रिटिश साम्राज्य तुरन्त सचेत हो गया और उसके लिए रूस की यह रणनीति एक बड़ी चिन्ता का कारण बन गई।

1869 में अमरीकी समाचारपत्र द न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा था — ब्रिटेन काले सागर की घाटी से तुर्की और भूमध्यसागर की ओर रूस की बढ़त को बड़ी ईर्ष्या और संशय भरी दृष्टि से देख रहा है। लेकिन जब रूसी लोग कास्पियन सागर के पूर्वी तटवर्ती क्षेत्र से इसी तरह तुर्कमेनिस्तान के भीतर बुखारा की तरफ़ बढ़ते हैं तो उसे वह अपने भारतीय साम्राज्य की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर पैदा होने वाले ख़तरे के रूप में देखता है। इसीलिए हिन्दूकुश पर्वतमाला के क्षेत्र में बनी सीमा की पूरी-पूरी सुरक्षा की जा रही है।

रूस की विज्ञान अकादमी के प्राच्य अध्ययन संस्थान के भारतीय अनुसन्धान केन्द्र की विद्वान तत्याना जा-गरादनिकवा का कहना है कि भारत ब्रिटिश साम्राज्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होने के साथ-साथ बड़ा नाज़ुक हिस्सा भी था। तत्याना जा-गरादनिकवा ने कहा:

अँग्रेज़ों और रूस के बीच प्रतिद्वन्द्विता कई जगहों पर थी। जैसे तुर्की में भी और सुदूर-पूर्व में भी दोनों देश एक-दूसरे के विरोधी थे। लेकिन पता नहीं क्यों इन जगहों पर दो देशों के बीच दिखाई देने वाले पारस्परिक विरोध को ‘बड़ा खेल’ कहकर नहीं पुकारा गया। मध्य-एशिया में घटने वाली घटनाओं को ही ‘बड़ा खेल’ नाम दिया गया। दक्षिण एशिया में ब्रिटेन के इस साम्राज्य को छूने के लिए, ब्रिटेन के इस साम्राज्य तक पहुँचने के लिए रेगिस्तानों, स्तेपियों और बड़ी-बड़ी पर्वतमालाओं को पार करने की ज़रूरत थी। यही नहीं भारत के लिए ‘रूसी ख़तरे’ का यह हौवा लन्दन और कोलकाता में बैठे कुछ विशेष लोगों के लिए बेहद लाभप्रद भी था। इस हौवे का भय दिखाकर ये विशेष लोग सुरक्षा के नाम पर, सेना के नाम पर और सेना को हथियारों से लैस करने के नाम पर विशाल धनराशि पा रहे थे।

रूसी अभिलेखागारों में रखे दस्तावेज़ बताते हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक, क़रीब-क़रीब क्रीमिया की लड़ाई तक रूसी ज़ारों की रणनीति में भारत की पूरी तरह से उपेक्षा की जा रही थी। रूस के सताधारी वर्ग में ब्रिटेन की आलोचना या ब्रिटेन के प्रति नाराज़गी सिर्फ़ इस बात को लेकर ही प्रगट की जाती थी कि लन्दन तुर्की के सुल्तान का समर्थन कर रहा है या तेहरान में ऐसे षड़यन्त्र रच रहा है, ऐसी चालें चल रहा है, जिनसे रूस को नुक़सान होता है।

लेकिन 1853 से 1856 के दौरान जब ब्रिटेन, फ़्राँस और तुर्की ने एक साथ मिलकर रूस पर चढ़ाई कर दी, तो परिस्थिति पूरी तरह से बदल गई। उन्नीसवीं शताब्दी के नौवें दशक के शुरू में रूस के विदेशमन्त्री निकलाय गीर्स ने लन्दन स्थित रूसी राजदूत अरतूर मोरेनगेयम से बात करते हुए कहा था — क्रीमिया की लड़ाई ने अँग्रेज़ों के साथ हमारे सम्बन्धों को पूरी तरह से बदल दिया है। रूस को मज़बूरी में लन्दन के ख़िलाफ़ विदेशनीति के क्षेत्र में कोई और हथियार खोजने की ज़रूरत महसूस होने लगी।

सन् 1863 में ‘उस बड़े खेल’ के एक जाँबाज़ खिलाड़ी जनरल निकलाय इग्नातेफ़ ने लिखा था:

इंगलैण्ड के साथ सम्बन्ध टूटना रूस के लिए तकलीफ़देह होगा क्योंकि हमें निष्क्रिय रहते हुए भी हर हालत में अपनी सुरक्षा के लिए क़दम उठाने पड़ेंगे। हमें तुरन्त ही एक बड़ी सेना को तैयार करना पड़ेगा, सारे तटवर्ती केन्द्रों को मज़बूत बनाना पड़ेगा और लड़ाई होने से पहले ही लाखों-करोड़ों खर्च करने पड़ेंगे। हमारा समुद्री व्यापार उसी समय बिना कोई कोशिश किए अपने आप ही नष्ट हो जाएगा। अँग्रेज़ों के पास पूरी-पूरी सम्भावना है कि वे हमारी सभी तटवर्ती सीमाओं पर ख़तरा पैदा कर सकें, हमें पूरी तरह से बेदम और निर्बल कर दें या फिर हमारे ऊपर बड़ा हमला करने के लिए हमारी किसी भी कमज़ोरी का फ़ायदा उठा सकें।

1854 में रूसी सामरिक रणनीतिकारों ने मध्य एशिया के रास्ते भारत में ब्रिटिश साम्राज्य पर हमला करने की योजनाएँ बनानी शुरू कर दी थीं। अँग्रेज़ों के ख़िलाफ़ भारत में शुरू हुई 1857 की क्रान्ति ने ब्रिटिश साम्राज्य पर हमला करने की रूस की रणनीति को सुधारने में सहायता की। अब रूस के सैन्य मुख्यालय ने भारत पर हमले की अपनी योजना को सिर्फ़ तोड़फोड़ की ऐसी योजना के रूप में नहीं, जो यूरोप की घटनाओं से अँग्रेज़ों का ध्यान हटाए, बल्कि भारत में सामाजिक विस्फोट की ऐसी योजना के रूप में देखना शुरू कर दिया, जो भारत को अँग्रेज़ उपनिवेशवादियों से मुक्त कराए और ब्रिटिश साम्राज्य का विनाश करे।

1857 का साल ‘उस बड़े खेल’ की शुरूआत का साल माना जाता है। रूस ने योजनानुसार दक्षिण की तरफ़ बढ़ना शुरू कर दिया और एशियाई देशों को रूसी साम्राज्य में शामिल किया जाने लगा। इंगलैण्ड ने भारत से बहुत पहले ही, भारत की सीमाओं से दूर ही, कहीं ताक़त के बल पर तो कहीं चालाकी के बल पर रूस से भारत को बचाने की कोशिश शुरू कर दी और इसके लिए अफ़ग़ानिस्तान तथा हिमालय और पामीर पर्वतमाला पर बसी रियासतों के शासकों को अपने प्रभाव में लेना शुरू कर दिया। मध्यएशियाई रियासतों में अँग्रेज़ों ने अपने-अपने गुप्तचर बैठा दिए, जिनका काम इन रियासतों के शासकों को रूस के ख़िलाफ़ उकसा कर रूस के साथ युद्ध करने के लिए तैयार करना था।

साभार- http://hindi.sputniknews.com/ से

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