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भाजपा की अब बंगाल फतह की तैयारी

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा बंगाल फतह की तैयारी कर रही है। इसके लिए भाजपा आक्रामक तेवर में चुनावी तैयारी कर रही है। चुनाव की पटकथा 19 दिसंबर को मिदनापुर कॉलेज मैदान में लिखी जा चुकी है। अमित शाह की इस जनसभा में उमड़े जन-सैलाब और हजारों की संख्या में विभिन्न पार्टियों के कार्यकर्ताओं ने जिस तरह भाजपा की सदस्यता ग्रहण की वह बंगालकी बदलती फिजां का संकेत है।

19 दिसंबर, 2020। पश्चिम बंगाल का मिदनापुर कॉलेज मैदान। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की विशाल जनसभा में उमड़े जन-सैलाब बंगाल की बदलती फिजां की गवाही दे रहे थे। वहीं ‘भारत माता की जय’ और ‘जय श्रीराम’ के नारों के उद्घोष के बीच अमित शाह की मौजूदगी में सुवेंदु अधिकारी सहित एक सांसद, नौ विधायक, एक पूर्व मंत्री, एक राज्यमंत्र, 15 काउंसलर, 45 चेयरमैन और दो जिला पंचायत अध्यक्ष सहित हजारों की संख्या में विभिन्न पार्टी के कार्यकर्ता जिस तरह भाजपा की सदस्यता ग्रहण की वह बंगाल की बदलती फिजां का सबूत दे रहे थे।

यह दृश्य देख लग रहा था मानो आसमान का रंग भी गहरा नीला से बदलकर केसरिया हो गया हो। यही कारण था कि इस सभा में अमित शाह ने कहा कि आज की सभा में उमड़े जन-सैलाब और पार्टी को मिल रहे अपार समर्थन से स्पष्ट है कि भारतीय जनता पार्टी इस बार के विधानसभा चुनाव में 200 से अधिक सीटों पर विजय के साथ राज्य में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जा रही है। अमित शाह यह दावा ऐसे ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी का बढ़ता जनाधार इसका आधार है। क्योंकि पिछले आठ सालों में भाजपा के वोट शेयर में जबरदस्त वृद्धि हुई है। 2011 में भाजपा का वोट शेयर लगभग 4 प्रतिशत था जो 2019 में बढ़कर 40.3 प्रतिशत हो गई है। 2011 में बंगाल में भाजपा का खाता भी नहीं खुल सका था लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में 128 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली है।

दूसरी तरफ भाजपा में जिस तरह समूह में दूसरे दलों के नेता और कार्यकर्ता शामिल हो रहे हैं, यह भी अमित शाह के दावे को पुख्ता कर रहे हैं। क्योंकि हमारे नेता चुनाव के सबसे बड़े मौसम वैज्ञानिक हैं, क्योंकि इन्हें पहले ही आभास हो जाता है कि सूबे में सत्ता बदलने वाली है। इसलिए सुवेंदु अधिकारी सहित तृणमूल के बड़े नेताओं का पाला बदलना आम बात नहीं है।

सुवेंदु अधिकारी ममता बनर्जी की वर्तमान सरकार में परिवहन, सिचाई और जन संसाधन मंत्री हुआ करते थे। वे पूर्व मिदनापुर जिले में राजनैतिक रूप से प्रभाव रखने वाले परिवार से हैं। उनके पिता शिशिर अधिकारी और छोटे भाई दिव्येंदु अधिकारी तामलुक और कांती सीट से तृणमूल कांग्रेस के सांसद हैं। उनके पिता शिशिर अधिकारी मनमोहन सरकार में ग्रामीण विकास राज्यमंत्री भी रह चुके हैं। खुद सुवेंदु अधिकारी दो बार लोकसभा के सदस्य भी रह चुके हैं। वर्तमान में नंदीग्राम के विधायक भी थे। नंदीग्राम से तृणमूल कांग्रेस के 2007 के नंदीग्राम आंदोलन की याद आती है। यही वह जगह है जहां भूमि अधिग्रह के खिलाफ आंदोलन की नींव रखी गई थी। इसी आंदोलन ने ममता बनर्जी के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल में दशकों से चले आ रहे वाम दलों के राज को उखाड़ फेंका था। और बंगाल की जनता ने ममता बनर्जी को बंगाल की सत्ता सौंपी थी। इस आंदोलन की रूपरेखा सुवेंदु अधिकारी ने ही तैयार किया था। या यों कहिए कि सुवेंदु ने दीदी के लिए सत्ता का मार्ग प्रशस्त किया था। कहते हैं कि इसी आंदोलन ने सुवेंदु को ममता बनर्जी का करीबी बनाया था। अब वही सुवेंदु अधिकारी अगर ममता बनर्जी से अपना नाता तोड़ रहे हैं तो स्पष्ट है कि बंगाल में सत्ता पलटने वाली है।

दरअसल, 2014 में केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद से ही भाजपा की नजर पश्चिम बंगाल पर है। सूबे में पार्टी को मजबूत करने के लिए स्वयं अमित शाह ने कमर कसी हुई है। गौरतलब है कि भाजपा अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने 2019 में 42 लोकसभा सीटों में से 22 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा था और 18 सीटें जीतने में सफल भी रहे। सूबे में पार्टी पार्टी की साख और बर्चस्व बढ़ाने के लिए भाजपा लगातार कुछ न कुछ कर रही है। ममता सरकार के खिलाफ भाजपा कार्यकर्ता सड़क पर उतरने का एक भी मौका नहीं छोड़ते। भाजपा बंगाल पर राज करना चाहती है इसलिए पहले तृणमूल कांग्रेस के दिग्गज नेता मुकुल राय को अपने साथ मिलाया। और अब तृणमूल कांग्रेस में नंबर दो के दो माने जाने वाले सुवेंदु अधिकारी को मिलाया है।

बिहार चुनाव के बाद आत्मविश्वास से भरी भाजपा बंगाल फतह करना चाहती है। इसलिए बंगाल में भाजपा के तेवर आक्रामक हैं। भाजपा के इस आक्रामक तेवर से तृणमूल कांग्रेस बौखलायी हुई है। इसी बौखलाहट में तृणमूल कांग्रेस भाजपा के नेता और कार्यकर्ता पर हिंसक हमले कर रही है। दूसरी तरफ सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस सहित अन्य दलों के नेताओं में भाजपा में शामिल होने की होड़ मची है। पश्चिम बंगाल के भाजपा प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय का कहना है कि विपक्षी दलों के सैकड़ों कार्यकर्ता भाजपा में शामिल होना चाहते हैं। इनमें तृणमूल कांग्रेस, सीपीएम, सीपीआई और कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारी भी शामिल हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अब सभी को पता है कि बंगाल में भाजपा सरकार बनाने जा रही है इसलिए सब लोग साथ आना चाहते हैं।

दूसरी तरफ सत्ताधारी दल के कई कद्दावर नेताओं के पार्टी छोड़ने पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक्शन मोड में आ गई हैं। हालांकि पार्टी छोड़कर जाने वाले नेताओं को लेकर ममता बनर्जी ने खास हैरानी नहीं जताई। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ मीटिंग में कहा कि भगोड़े लोगों के जाने तृणमूल कांग्रेस और मजबूत होगी। जो लोग पार्टी छोड़कर भाजपा में गए हैं, हम उन्हें शुभकामनाएं देते हैं और दिलाते हैं कि बंगाल के लोग धोखेबाजों से नफरत करते हैं। वहीं मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो ममता बनर्जी इस बाबत पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के सहयोगी के रूप में काम कर रहे रणनीतिकार प्रशांत किशोर से नाराजगी जाहिर की है।

शायद यही वजह है कि भाजपा के आक्रामक चुनावी तैयारियों के दौरान प्रशांत किशोर ने ट्वीट कर कहा, ‘मीडिया ने भाजपा को लेकर जरूरत से ज्यादा ही प्रचार-प्रसार किया हुआ है। लेकिन वास्तविकता यह है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा को दहाई के नंबर पार करने में ही संघर्ष करना पड़ेगा।’ प्रशांत किशोर इतने पर ही नहीं रूके, उन्होंने लोगों से अपने ट्वीट को सेव करने की अपील करते हुए कहा कि ‘अगर भाजपा का प्रदर्शन इससे बेहतर रहता है तो वह इस जगह को छोड़ देंगे।’ प्रशांत के इस ट्वीट का जवाब देते हुए भाजपा के महासचिव और पश्चिम बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने भी ट्वीट करते हुए कहा, ‘पश्चिम बंगाल में भाजपा की जो सुनामी चल रही है, सरकार बनने के बाद इस देश को एक चुनावी रणनीतिकार खोना पड़ेगा।’ दरअसल आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के मद्देनजर प्रशांत किशोर के साथ करार किया हुआ है। ममता के भतीजे सांसद अभिषेक बनर्जी के साथ प्रशांत किशोर तृणमूल कांग्रेस के लिए सक्रिय रूप चुनावी तैयारियों को लेकर काम कर रहे हैं। लेकिन तृणमूल के कई पुराने और वरिष्ठ नेताओं को पीके के तौर-तरीके पसंद नहीं आ रहे हैं। तृणमूल के कुछ बागी नेताओं ने तो स्पष्ट रूप से अभिषेक बनर्जी और प्रशांत किशोर के हस्तक्षेप को ही पार्टी छोड़ने का वजह करार दिया है।

बहरहाल, भाजपा को पश्चिम बंगाल में अपना केसरिया परचम लहराने के लिए दक्षिण बंगाल पर कब्जा जरूरी है। क्योंकि दक्षिण बंगाल अब तक तृणमूल के प्रभुत्व वाला क्षेत्र रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में 42 सीटों में से 18 सीटें जीतकर भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस को हैरान जरूर दिया था। लेकिन ममता का यह किला भाजपा नहीं भेद पाई थी। दक्षिण बंगाल सूबे का सबसे बड़ा उपक्षेत्र है। इसमें ग्रेटर कोलकाता भी शामिल है। आबादी के हिसाब से भी दक्षिण बंगाल काफी घनत्व वाला क्षेत्र है। दक्षिण बंगाल के कुल 19 जिलों में से 8 जिलों में पूरे राज्य की 57 फीसदी विधानसभा सीटें आती हैं। कहने की आवश्यकता नहीं है कि पश्चिम बंगाल के सत्ता की चाबी दक्षिण बंगाल के पास है।

पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के पास अब सिर्फ उनका कोर वोटर है जो भाजपा के साथ कभी नहीं जाएगा। क्योंकि वे वैचारिक रूप से वाम दलों के साथ हैं। दक्षिण और मध्य बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की शक्ति हिंदू-मुस्लिम के समर्थन की वजह से है। ऐसे स्थिति में दक्षिण बंगाल में भाजपा को तृणमूल कांग्रेस के हिंदू वोटरों में सेंध मारनी पड़ेगी। सुवेंदु अधिकारी जैसे नेता भाजपा को इस काम में मदद करेंगे। दूसरी तरफ भाजपा यह जान चुकी है कि बंगाल में अगर अपनी ताकत बढ़ानी है तो मुसलमानों को भी अपने साथ लेना होगा। यही वजह है कि भाजपा ने मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने के लिए राज्म में मुस्लिम सम्मेलन किया।

पश्चिम बंगाल की जनता कट-कमीशन और करप्शन से पहले से ही परेशान हैं। इसलिए वे इस बार सत्ता बदलने के मूड में हैं। क्योंकि दशकों तक सियासी हिंसा और अन्याय के खिलाफ चुप रहने वाला बंगाली समाज अब मुखर होने लगा है। हिंसा और लूट के खिलाफ उठ रही आवाजें तृणमूल कांग्रेस की चूलें हिला दी हैं। पार्टी पर परिवारवाद थोपे जाने के कारण पार्टी के अंदर भी विरोध और विद्रोह चरम पर है। इस बाबत पूछे जाने पर बंगाल के एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि बंगाल की जनता भाजपा का राजतिलक करने के लिए थाल सजाये हुए है। लेकिन यह राजतिलक तभी हो पाएगा जब गृहमंत्री अमित शाह बंगाल चुनाव के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था मुहैया कराएंगे। अन्यथा भाजपा का राजतिलक शायद ही हो पाए!

स्पष्ट है कि बंगाल में भाजपा का जनाधार बढ़ रहा है। लेकिन इस बढ़ते हुए जनाधार को विधानसभा चुनाव में वोटों में बदलने के लिए हर मोर्चे पर तैयार रहने की जरूरत है। बाकी काम ममता सरकार से त्रस्त बंगाल की जनता खुद करेगी।

भाजपा की बंगाल में बढ़ती ताकत
भाजपा बंगाल में एक बढ़ती हुई ताकत है। 2011 के बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा का खाता तक नहीं खुला था और वोट शेयर लगभग 4 प्रतिशत था। वहीं 2016 के विधानसभा चुनावों में भाजपा का वोट शेयर 10.3 प्रतिशत बढ़ा जो कांग्रेस के वोट शेयर 12.4 प्रतिशत के करीब था। वहीं सीटों के हिसाब से भाजपा ने 294 सीटों में से तीन सीट जीत कर बंगाल में अपना खाता खोला। किसी दूसरे राज्य में अपनी जमीन तलाशने वाली भाजपा के लिए यह शुभ संकेत था। इतना ही नहीं वोट शेयर में भीभाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में भी शानदार प्रदर्शन किया। लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को जहां 43.3 प्रतिशत वोट शेयर हासिल हुआ वहीं भाजपा को 40.3 प्रतिशत वोट मिले। भाजपा को कुल 2 करोड़ 30 लाख 28 हजार 343 वोट मिले, जबकि तृणमूल कांग्रेस को 2 करोड़ 47 लाख 56 हजार 985 मत मिले हैं। गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को मात्र 28 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली थी जबकि 2019 के चुनाव में 128 क्षेत्रों में बढ़त मिली है। दूसरी तरफ साल 2014 में 214 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल करने वाली तृणमूल कांग्रेस अब सिर्फ 158 विधानसभा क्षेत्रों में सिमटकर रह गई है।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि बंगाल में भाजपा की जैसे-जैसे ताकत बढ़ी, वैसे-वैसे इसका सबसे अधिक नुकसान सीपीएम को हुआ। तीन दशकों तक सूबे की सत्ता पर एकछत्र राज करने वाली सीपीएम हाशिए पर चली गई है। बताते चलें कि 2014 के लोकसभा चुनाव और 2016 के विधानसभा चुनावों में सीपीएम का वोट शेयर 10 प्रतिशत से भी अधिक कम हुआ था। वहीं भाजपा का प्रदर्शन बाद के चुनावों में और बेहतर हुआ। धीरे-धीरे भाजपा का प्रदर्शन सीपीएम और कांग्रेस के संयुक्त प्रदर्शन से भी बेहतर हुआ। भाजपा बंगाल में कई अन्य सीटों पर अपनी स्थिति मजबूत करने और तृणमूल कांग्रेस की तरह संगठनात्मक क्षमता हासिल करने के लिए खूब खून-पसीना एक किया है। यही वजह है भाजपा ने लेफ्ट और कांग्रेस के वोट बैंक को पूरी तरह तबाह कर दिया है लेकिन तृणमूल कांग्रेस के वोट शेयर में अभीभी सेंध नहीं लगा पाई है। निस्संदेह पश्चिम बंगाल में चुनाव दर चुनाव भाजपा अपने प्रदर्शन में सुधार कर रही है और सीपीएम व कांग्रेस को पीछे धकेलती हुई दिख रही है लेकिन बंगाल में उसका असली मुकाबला ममता की तृणमूल कांग्रेस से ही है। वर्तमान में सूबे की 42 लोकसभा सीटों में से तृणमूल कांग्रेस के खाते में 24 सीटें और विधानसभा की 294 सीटों में से 211 सीटों पर उसका कब्जा है।

दूसरी तरफ 2018 के पंचायत चुनावों में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने जीत का परचम लहराया लेकिन भाजपा सूबे में दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी। बंगाल के कुल 31,802 ग्राम पंचायत सीटों में से तृणमूल कांग्रेस ने 20,848 पंचायत सीटों पर कब्जा किया था जबकि भाजपा के खाते में 5,657 सीटें आईं। सीपीएम ने 1,415 सीटें और कांग्रेस ने सिर्फ 993 ग्राम पंचायत सीटें ही जीत सकी। दिलचस्प बात यह है कि इन दोनों पार्टियों से ज्यादा निर्दलीय उम्मीदवारों ने 1,741 पंचायत सीटों पर जीत हासिल की। स्पष्ट है कि बंगाल में भाजपा का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में भाजपा अगर आगामी विधानसभा चुनाव के लिए 292 सीटों में से 200 सीटें का जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है तो इसे असंभव नहीं माना जा सकता।

भाजपा में कौन-कौन शामिल हुआ
विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बंगाल में सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की एक बड़ी खेप भाजपा में शामिल हो गई है। ममता बनर्जी के लिए यह एक बड़ा झटका है। इससे बंगाल में तृणमूल कांग्रेस कमजोर हुई है, तो भाजपा पहले से ज्यादा मजबूत हुई है। 19 दिसंबर को अमित शाह की जनसभा में सुवेंदु अधिकारी समेत 7 टीएमसी विधायक, एक सांसद और एक पूर्व सांसद ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की। तृणमूल नेताओं के अलावा एक-एक सीपीआई, सीपीएम, सीएमसी और कांग्रेस के विधायक भीभाजपा में शामिल हुए। यहां बड़े नेताओं के अलावा बड़ी संख्या में जिला स्तर के नेता और पार्षदों ने भीभाजपा ज्वाइन किया। तृणमूल कांग्रेस ने इन बागियों को वायरस की संज्ञा देते हुए पार्टी को इनसे छुटकारा मिलने की बात कही तो अमित शाह ने कहा कि एक दिन ममता बनर्जी टीएमसी में अकेली रह जाएंगी। आइए जानते हैं भाजपा में कौन-कौन शामिल हुआ है-

सुवेंदु अधिकारी, तृणमूल कांग्रेस विधायक/पूर्व सांसद
सुवेंदु अधिकारी नंदीग्राम से विधायक और ममता बनर्जी सरकार में नंबर दो के नेता माने जाते थे। 1996 में मिदनापुर में लगभग 20 साल की उम्र में सुवेंदु अधिकारी ने कांग्रेस छात्र परिषद के नेता के रूप में कोऑपरेटिव आंदोलन में शामिल हुए। तीन साल बाद वह तृणमूल कांग्रेस से जुड़े। नंदीग्राम आंदोलन के दौरान ममता बनर्जी के विश्वासपात्र बने। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने 2011 विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी सरकार बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वह 2009 और 2014 में तामलुक से सांसद रहे। 2016 में उन्होंने संसद की सदस्यता से इस्तीफा दिया और नंदीग्राम से विधायक चुने गए।

सुनील कुमार मंडल, तृणमूल कांग्रेस सांसद
सुनील कुमार मंडल बर्धमान पूर्व से दो बार लोकसभा सांसद रहे। वह मुकुल रॉय के करीबी माने जाते हैं। इन्होंने लेफ्ट मोर्चे के सहयोगी फॉरवर्ड ब्लॉक से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया। 2011 में वह गल्सी से विधायक बने। फॉरवर्ड ब्लॉक के विधायक रहते हुए उन्होंने फरवरी 2014 में हुए राज्यसभा चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार को वोट दिया। इसके बाद वे तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए।

शीलभद्र दत्ता, तृणमूल कांग्रेस विधायक
शीलभद्र दत्ता बैरकपुर से लगातार दो बार (2011, 2016) विधायक चुने गए। इन्होंने कांग्रेस छात्र परिषद से नेता के रूप में अपना करियर शुरू किया। बाद में वह कांग्रेस में शामिल हुए। उसके बाद 2006 में वह दल बदलकर तृणमूल कांग्रेस से जुड़ गए।

बनश्री दत्ता, तृणमूल कांग्रेस विधायक
बनश्री दत्ता पूर्वी मिदनापुर की कांथी उत्तर सीट से विधायक हैं। वह 2011 और 2016 में कांथी सीट से विधायक चुनी गईं। बनश्री दत्ता सुवेंदु अधिकारी की करीबी भी मानी जाती हैं।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पूर्व तृणमूल विधायक
श्यामा प्रसाद मुखर्जी बांकुरा की बिश्नुपुर सीट से विधायक थे। वे 2016 के विधानसभा चुनाव में बिश्नुपुर से हार गए थे। ममता बनर्जी की पहली कैबिनेट में ये मंत्री भी रह चुके हैं। चिटफंड घोटाले में नाम आने के बाद उन्हें मंत्री पद से हटा दिया गया था।

दिपाली बिस्वास, तृणमूल कांग्रेस विधायक
दिपाली बिस्वास 2016 के विधानसभा चुनाव में गजोले निर्वाचन क्षेत्र से सीपीएम उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था। मालदा में पार्टी पर्यवेक्षक बनने के बाद सुवेंदु अधिकारी ने दिपाली बिस्वास को जुलाई 2016 में तृणमूल कांग्रेस में शामिल कराया।

सुक्र मुंडा, तृणमूल कांग्रेस विधायक
सुक्र मुंडा अलीपुरद्वार जिले की नगराकटा सीट से विधायक हैं। 2011 में तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था और नगराकटा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी जोसेफ मुंडा को जीत मिली थी लेकिन 2016 में तृणमूल ने सुक्र मुंडा को अपना प्रत्याशी बनाया और वह जीते।

बिस्वजीत कुंडु, तृणमूल कांग्रेस विधायक
बिस्वजीत कुंडु कालना से लगातार दो बार (2011, 2016) विधायक चुने गए हैं। ये सुवेंदु अधिकारी के करीबी माने जाते हैं। सुवेंदु अधिकारी के इस्तीफा देने के बाद सुनील मंडल के घर पर हुई बैठक में बिस्वजीत भी शामिल थे।

दसरथ टिर्के, पूर्व तृणमूल कांग्रेस सांसद
दसरथ टिर्के 2014 में अलीपुरद्वार से लोकसभा सांसद चुने गए थे। 2019 में वह भाजपा के जॉन बरला से चुनाव हार गए। इससे पहले वह कुमारग्राम से तीन बार (2001, 2006 और 2011) में आरएसपी विधायक भी रह चुके हैं। 2014 में दसरथ टिर्के आरएसपी से तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए थे।

सुदीप मुखर्जी, कांग्रेस विधायक
सुदीप मुखर्जी 2016 के विधानसभा चुनाव में पुरुलिया से विधायक चुने गए। ये लंबे समय से कांग्रेस से जुड़े रहे हैं।

सैकत पंजा, सीएमसी विधायक
सैकत 2016 के उपचुनाव में मंटेश्वर से विधायक चुने गए। सैकत पंजा के पिता संजल पंजा के निधन के बाद यह सीट खाली हुई थी। पिछले तीन-चार महीने से सैकत पंजा के तेवर बागी हो गए थे।

तापसी मंडल, सीपीएम विधायक
तापसी मंडल 2016 के विधानसभा चुनाव में पूर्वी मेदिनीपुर जिले की हल्दिया सीट से विधायक चुनी गई हैं। सीपीएम नेता तापसी मंडल हल्दिया सीट से लेफ्ट मोर्चे की प्रत्याशी थीं।

अशोक डिंडा, सीपीआई विधायक
अशोक डिंडा 2016 के चुनाव में पूर्व मेदिनीपुर के तामलुक से विधायक चुने गए। ये पूर्व मेदिनीपुर जिले में सीपीआई का चेहरा थे।

साभार- https://samvadnews.in/ से

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