काला मुख झूठों का, सच्चों का बोलबाला है

आर्य समाज में अनेक कवि हुए जिन्होंने अपनी रचनाओं को अपने ही मुख मंडल से जन जन तक पहुंचाया | कवि नाथूराम शंकर इस श्रेणी के कवियों के मुखिया रहे | कुंवर सुखपाल आर्य मुसाफिर ने भी अपनिराचानाओं को जन जन को वैदिक सिधान्तों का परिचय लोगों तक पहुंचाया | कुछ इस प्रकार के ही कवि रहे हमारे कथानायक कवियों के रत्न कविरत्न प्रकाश जी | प्रकाश जी की रचनाओं में विचित्र ओज मिलता है | आप ने जिस विषय पर भी कलम उठाई कमाल ही कर दिया | जहाँ तक लोकोक्तियों का सम्बन्ध है , आप ने लोकोक्तियों को भी अपनी रचना का माध्यम बना कर अपने काव्य को उत्कृष्टता दी |

एक लोकोक्ति युक्त रचना इस प्रकार है जो “ काला मुख झूठों का , सच्चों का बोलबाला है ” नामक लोकोक्ति पर आधारित है | रचना में बताया गया है झूठा व्यक्ति कहीं भी यश नहीं प्राप्त करता| जहां भी जाता है , उसकी बुराई ही लोगों के सामने आती है | इस कारण उसके लिए काला मुंह माना गया है और सच्चे व्यक्ति सब सभाओं में आदर पाते हैं | रचना इस प्रकार है |

बोले युधिष्ठिर , माना मेरा , दुर्योधन शत्रु
प्रबल प्रपंची पातकी से पड़ा पाला है |
जिसके सेनानी द्रोण , दुशासन,कृप,भीष्म
साथ मित्र कर्ण सा महारथी निराला है |
तदपि न चिंता ,भय ,रंच मेरे मानस में
परम हितैषी धर्म मेरा रखवाला है |
होगी समरांगन में जित हमारी ही अंतत:
काला मुख झूठों का,सच्चों का बोलबाला है
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इन पंक्तियों के माध्यम से इस कहावत को चरितार्थ करने के लिए महाभारत के एक प्रसंग का वर्णन करते हुए कवि कह रहे हैं कि युधिष्ठिर इस बात से किंचित भी चिंता अनुभव नहीं करते कि उनका पाला एक इस प्रकार के शत्रु के साथ पडा है जिसके साथ गुरु द्रोणाचार्य ,प्रपंची दुशासन, कृपाचार्य , हमारे भीष्म पितामह आदि के साथ ही साथ महारथी कर्ण भी है| यह सब लोग अपने अपने विषय के शास्त्रों में अदिव्तीय योद्धा हैं | इन का सैन्य संचालन विश्व विख्यात है किन्तु युधिष्ठिर जी अनुभव कराते हैं कि शत्रु की इस विशाल व् वीरों से भरी हियो सेना के सामने होते हुयी भी मुझे किसी प्रकार का भय नहीं है |

दुर्योधन की इतनी विशाल व् वीरों की भरी सेना से लोहा लेने के लिए सामने खड़े युधिष्ठिर केमुख मंडल पर किस प्रकार की चिंता नहीं दिखाई देती | उनके ललाट पर भय का रंच मात्र भी दिखाई नहीं देता | युधिष्ठिर कह रहे हैं कि मेरे गुरदेव मेरे शत्रु के सेनापति मेरे पितामह भीष्म शत्रु की और से लड़ रहे हैं | दुशासन और कृपाचार्य जैसे शूरवीर योद्धा भी सह्त्रू सेना में खड़े दिखाई दे रहे हैं | यहाँ तक कि महारथी कर्ण जैसा महान धनुर्धर भी मेरे सामने युधाभूमि में खडा है | इतनी विस्व्हाल व शक्तिशाली सेना सामने हिते हुए भी मुझे न तो कोई चिंता है और न ही मैं किसी पोरकार के भय का नौभाव कराताक हूँ |

युधिष्ठिर को इतनी शक्ति कहाँ से मिली ?, जो वह सामने अपने से कहीं संख्या में अधिक तथा गुणों में अपने से श्रेष्ठ सेनाको सामने पाकर भी भय अथवा चिंता अनुभव नहीं हो रही, एसा क्यों ? कवि ने इसका कारण भी अगली पंक्ति में स्पष्ट कर दिया है | इस पंक्ति ने युधिष्टिर जी से कहलवाय है कि धर्म ही सब से बड़ा हित चाहने वाला होता है | धर्म ही सब और से रक्षा करने वाला होता है | धर्म ही सब संकटों से पार ले जाने वाला होता है | जिसका आश्रय धर्म से होता है , जिसे धर्म पर विशवास करने वाला होता है | अत: युधिष्ठिर जी कह रहे हैं कि धर्म मेरे लिए मेरा परम हितैषी है , यह मेरा सदा हित चाहने वाला है और यह धर्म ही एरा रखवाला है | धर्म के होते मुझे किसी प्रकार की चिंता नहीं , किसी प्रकार का भय नहीं | मेरे साथ धर्म है तो निश्चय ही मैं अधर्मी पर , पापी पर विजय पाने में सग्फल हो पाउँगा |

धर्म का आश्रय लेने वाले युधिष्ठिर आशावादी है | वह धर्म पार चलते हुए आगे कहते हैं कि धर्म पर आधारित होने के कारण निश्चय ही अंत में युद्ध के मैदान में हमारी विजय होगी | हम इस युद्ध को जित पाने में सफल होंगे | युधिष्ठिर की इस सफलता के सपने का आधार धर्म ही है | इस ल्किये ही कवी कहते हैं कि धर्म पर चलने वाले व्यक्ति का सदा ही बोलबाला रहता है | उसे सब क्षेत्रों में सफलता मिअलाती है | वह चाहे किसी भी संकट में हो , उसमें से धर्म उसे निकाल कर ले ही जाता है जबकि अधर्म पर चलने वाला मार्ग में ही डूब जाता है | साधन संपन्न होते हुए भी वह सफल नहीं हो पाता | इस निमित्त कहा भी है “काला मुख झूठों का , सच्चों का बोलबाला है” |

डॉ. अशोक आर्य
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