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हिंदी कथा संसार में ब्रिटिश लेखन

किसी भाषा का उत्कर्ष तभी संभव है जब उसका साहित्य अपने देश की सीमा से परे भी सृजित हो. इन दिनों हिंदी में जिस क़िस्म कासाहित्य ब्रिटेन में रचा जा रहा है उसे पढ़ कर सहज ही कहा जा सकता है कि इसने अपनी एक विशिष्ट पहचान बनानी शुरू कर दी है . अब इसमें भारत को लेकर नोस्टेलजिया नहीं है वरन लेखकों के कथानकों में अपनी इस नई कर्मभूमि से जुड़े सरोकारों , यहाँ के रहनेवालों के सामाजिक अंतर्द्वंद , सामाजिक ताने बाने से जुड़ी समस्याओं की झलक देखने को मिलती है.

इसका अंदाज़ा आज स्थानीय नेहरू सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित कार्यक्रम से हुआ जहां नाटिंघम की हिंदी कथाकार सुश्री जय वर्माद्वारा सम्पादित पुस्तक “ब्रिटेन की प्रतिनिधि हिंदी कहानियाँ “ का लोकार्पण हुआ .

लोकार्पण नेहरू सांस्कृतिक केंद्र के निदेशक और लेखक अमीश त्रिपाठी के द्वारा संपन्न हुआ , कार्यक्रम में ब्रिटेन के जाने मानेसाहित्यकारों के साथ ही ब्रिटिश सांसद वीरेंद्र शर्मा भी मौजूद थे .

मुझे याद आता है महेंद्र भल्ला का उपन्यास “दूसरी तरफ़ “ जो साप्ताहिक हिंदुस्तान में धारावाहिक रूप से अब से कोई पचास वर्ष पूर्वप्रकाशित हुआ था उसमें ब्रिटेन के प्रवासी भारतीयों के संघर्ष की गाथा थी .

आज के कार्यक्रम में चर्चा से यह बात उभर कर आयी कि ब्रिटेन में हिंदी कथा लेखन की शुरुआत क़ायदे से नब्बे के दशक में हुई थी , पद्मेश गुप्त , दिव्या माथुर , तेजेंद्र शर्मा , जकिया जुबेरी , उषा राजे सक्सेना , नीना पाल , भारतेंदु बिमल, नरेश भारतीय कुछ ऐसेकथाकार हैं जिन्होंने ब्रिटेन में लिखी जा रही हिंदी कहानी को अपनी अलग पह-चान दी.

आज रिलीज़ हुए इस प्रतिनिधि संकलन की खूबी यह है कि इसमें ब्रिटेन के भिन्न भिन्न हिस्सों के 26 कथाकारों की कहानियाँ हैं औरप्रतिष्ठित नामों के साथ ही शिखा वार्ष्णेय , अभिषेक त्रिपाठी , हरमिंदर सिंह नागी जैसे नाम भी हैं जो अपेक्षाकृत नए हैं लेकिन आश्वस्तकरते हैं कि यह रचनात्मक सिलसिला जारी रहेगा.

कार्यक्रम का संचालन कथा यूके के सचिव और जाने माने कथाकार तेजेंद्र शर्मा ने किया .

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