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कांग्रेस हिम्मत नहीं कर पाई मगर मोदी सरकार संघ के विरोध के बावजूद ला रही है इस्लामिक बैंक

विवादित इस्लामी बैंकिंग व्यवस्था के लिए देश के दरवाजे खुल गए हैं। महाराष्ट्र के सोलापुर नगर में पहले इस्लामी बैंक का विधिवत उदघाटन कर दिया गया है। इस बैंक का नाम लोकमंगल बैंक रखा गया है। खास बात यह है कि इस बैंक में धनराशि जमा करवाने वाले लोगों को न तो कोई ब्याज दिया जाएगा और न ही कर्ज लेने वालों से कोई ब्याज वसूल किया जायेगा। इस बैंक से एक दर्जन लोगों को कर्ज दिया गया जो कि सभी मुसलमान है।

इस्लाम में क्योंकि ब्याज को हराम बताया गया है इसलिए इस्लामी बैंकिंग व्यवस्था में किसी को न तो ब्याज लेना होगा और न ही देना होगा। नियमों के अनुसार इस्लामी बैंकों की धनराशि गैर-इस्लामी कामों जैसे शराब के धंधे, जुआघरों की स्थापना, सूअर के मांस का कारोबार, अस्त्र-शस्त्र बनाने के कारोबार में नहीं लगाई जा सकती। इस्लामिक बैंकिंग व्यवस्था को चलाने के लिए मुस्लिम विद्वानों की एक कमेटी होती है जो यह तय करती है कि इन बैंकों में जमा होने वाली धनराशि से किसे कर्ज दिया जाये और इन बैंकों को जो लाभ होता है उसे कैसे खर्च किया जाए?

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने देश में इस्लामिक बैंकिंग व्यवस्था लागू करने की अनुमति पिछले महीने चुपके-चुपक दी। इसके दूरगामी परिणाम होंगे मगर न तो मीडिया में इसकी चर्चा हुई और न ही राजनीतिक दलों ने इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की। सेक्युलर दलों और वाम दलों का मूक रहना तो समझ में आता है मगर कथित राष्ट्रवादी संगठनों की चुप्पी वास्तव में चौंकाने वाली हैं। जहां तक संघ परिवार का संबंध है वह शुरु से ही देश में इस्लामी बैंकिंग व्यवस्था को लागू करने का विरोध करता आ रहा है। सवाल यह पैदा होता है कि जो नीति कांग्रेस के शासनकाल में संघ परिवार के नेताओं की नजर में राष्ट्रहितों के खिलाफ थी वहीं नरेंद्र मोदी के शासनकाल में देशहितों में कैसे बदल गई?

संघ परिवार के एक संगठन विश्व हिन्दू परिषद ने इस बैंकिंग व्यवस्था का विरोध जरुर किया था। विश्व हिन्दू परिषद के संयुक्त महामंत्री डा. सुरेन्द्र कुमार जैन का कहना था कि इस्लामी बैंक इस्लाम की शिक्षाओं का पालन नहीं करते। इस्लामिक बैंक यह दावा करते हैं कि वह न तो ब्याज लेते हैं और न ही बचत राशि पर ब्याज देते हैं। ये बैंक अपनी आय का स्त्रोत संपत्तियों की खरीद और बिक्री को बताते हैं। जैन के अनुसार यह सरासर सट्टेबाजी है जो कि इस्लाम के खिलाफ है। जैन के मुताबिक इस्लामिक बैंक की संकल्पना भारत में अवैधानिक और राष्ट्रविरोधी है। इस तरह के बैंक स्थापित करने का प्रयास सबसे पहले केरल में शुरु हुआ था। इस बैंकिंग व्यवस्था को लागू करने के लिए वहां एक निगम बनाया गया था। जिसमें केरल सरकार मुसलमानों की एक निगम और कुछ प्रवासी मुस्लिम पूंजीपति हिस्सेदार थे।

इसका विरोध डा. सुब्रमण्यम स्वामी ने किया था और केरल हाईकोर्ट ने इस बैकिंग व्यवस्था को भारतीय संविधान के विपरीत बताते हुए इस पर प्रतिबंध लगा दिया था। जैन ने यह भी आरोप लगाया था कि जिन देशों में इस्लामी बैंक व्यवस्था चलन में है उनका इतिहास बताता है कि ये बैंक किसी न किसी रुप से आतंकवादी संगठनों को फंड उपलब्ध कराते हैं। ऐसे में पहले ही इस्लामी आतंकवाद से जूझ रहे भारत में इस्लामी बैंक की अनुमति देना आतंकी गतिविधियों को प्रोत्साहन देना होगा। सवाल यह है कि हिन्दू संगठनों के विरोध के बावजूद किस दबाव में आकर नरेंद्र मोदी की सरकार ने रिजर्व बैंक के नियमों में आमूल परिवर्तन करके इस देश के दरवाजे इस्लामी बैकिंग व्यवस्था के लिए खोल दिए हैं।

मोदी समर्थक यह तर्क भी देते हैं कि इन इस्लामी बैंक पर रिजर्व बैंक का नियंत्रण होगा। मगर वो एक तथ्य को छुपा देते हैं कि यह इस्लामी बैंक अल्पसंख्यक संस्थान होंगे और भारतीय संविधान की अनुच्छेद 40 के तहत इनके कामकाज में सरकार या न्यायालय का हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं होगा। देश के मुस्लिम संगठन कम से कम दो दशकों से सरकार पर देश में इस्लामिक बैंकिंग व्यवस्था लागू करने का दबाव डाल रहे थे। इनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री ए आर रहमान खान, असुद्दीन ओवैसी, सलमान खुर्शीद आदि प्रमुख थे।

देश में इस्लामिक बैंकिंग व्यवस्था लागू करने की पृष्ठभूमि काफी चौंकाने वाली है। बताया जाता है कि नरेंद्र मोदी के एक विशेष चहेते जफर सरेशवाला के माध्यम से सउदी अरब के शासक भारत सरकार पर इस बात के लिए दबाव डाल रहे थे कि देश में इस्लामी बैंकिंग व्यवस्था को लागू करने की अनुमति दी जाए। अंग्रेजी समाचारपत्र ‘द टाइम्स आफ इंडिया’ के अनुसार जब अप्रैल 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सउदी अरब के दौरे पर गए थे तो इस दौरे के दौरान भारत के सरकारी बैंक एमैक्स और सउदी अरब के इस्लामिक विकास बैंक के बीच एक समझौता हुआ था जिसके तहत भारत में इस्लामी बैंकों की शाखाएं खोलने का फैसला किया गया था।

जफर सरेशवाला ने यह दावा किया था कि देश में इस्लामी बैंकिंग व्यवस्था लागू होने से अरब पूंजीपति भारी मात्रा में पूंजी का निवेश करेंगे जिससे भारत में औद्योगिक विकास की गति तेज होगी। हालांकि उनके इस दावे का खोखलापन इसी से प्रकट है कि सउदी अरब और अन्य अरब देश इन दिनों भीषण आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। विश्व के बाजार में पेट्रोल के मूल्य में जो भीषण गिरावट आई हैं उसके कारण अरब देशों की सारी अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है। सभी पुननिर्माण की योजनाएं ठप्प कर दी गई है। अकेले सउदी अरब में ही 15 लाख मजदूरों की छुट्टी कर दी गई है क्योंकि आर्थिक संकट के कारण सभी ठेके रद्द कर दिए गए हैं। ऐसी विकट स्थिति में सउदी अरब या अन्य अरब देश भारत की इस्लामी बैंक व्यवस्था में पूंजी निवेश कर पायेंगे ऐसा संभव दिखाई नहीं देता।

इस वक्त इस्लामी बैंकिग व्यवस्था विश्व के 83 देशों में लागू हैं। भारत पहला ऐसा गैर-मुस्लिम देश जिसने इस्लामी बैंकिंग व्यवस्था लागू करने की अनुमति प्रदान की है। इस्लामिक विकास बैंक के लाभांश का अधिकांश भाग इस्लाम के प्रचार-प्रसार और लोगों को मुस्लिम धर्म दीक्षित करने के लिए खर्च किया जाता है। एक दशक पूर्व इस्लामिक विकास बैंक के प्रबंधक मंडल की एक बैठक कुवैत में हुई थी जिसमें यह तय किया गया था कि भारत में धर्मातंरण की सबसे ज्यादा गुंजाइश है इसलिए भारत में गैर-मुसलमानों को इस्लाम धर्म में कबूल करने के लिए विशेष अभियान शुरु किया जाना चाहिए।

साभार- http://www.nayaindia.com/ से



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